जम्मू-कश्मीर पुलिस ने कठुआ जिले में आठ साल की एक लड़की के अपहरण, सामूहिक बलात्कार और फिर उसकी हत्या के मामले में 15 पेज की चार्जशीट दाखिल कर दी है. यह चार्जशीट बताती है कि कैसे इस छोटी सी बच्ची के साथ बर्बरता की गई थी. वहीं इस मामले पर जिस तरह से सांप्रदायिक राजनीति हावी हुई है, उसने बक्करवाल समुदाय में असुरक्षा की भावना को खतरनाक तरीके से बढ़ा दिया होगा. संबंधित पीड़िता इसी समुदाय से आती थी.

यह बच्ची 10 जनवरी से अपने गांव रसाना से लापता थी. 17 जनवरी को उसका क्षत-विक्षत शव पास के जंगलों में मिला था और इस बात के सबूत भी मिले थे कि इस बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ है. इस हफ्ते स्थानीय वकीलों ने पुलिस को मामले की चार्जशीट दाखिल करने से रोकने की कोशिश की थी. वहीं जम्मू उच्च न्यायालय की बार एसोसिएशन ने बुधवार को यह मांग करते हुए बंद आयोजित किया था कि इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी जाए. हर लिहाज से यह मांग सीबीआई पर भरोसा जताने से ज्यादा पुलिस जांच को प्रभावित करने के लिए उठाई गई लगती है. अब तक की पुलिस जांच में आठ लोगों की गिरफ्तारी हुई है. इनमें चार पुलिसवाले भी शामिल हैं जिन्हें सबूत मिटाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है.

चार्जशीट के मुताबिक मुख्य आरोपित रसाना के देवस्थान मंदिर का केयरटेकर है. अपहरण के बाद बच्ची को इसी मंदिर में रखा गया था. इस मामले पर जो राजनीति हो रही है उससे यह संकेत जा रहा है कि एक बहुधार्मिक राज्य की स्थानीय पुलिस को वैसे मामले नहीं सौंपे जा सकते जहां पीड़ित मुसलमान हो और आरोपित हिंदू. ऐसी राजनीति और प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाली तमाम कोशिशों का मजबूती से विरोध होना चाहिए. यहां यह भी निहायत ही शर्मनाक है कि पीडीपी-भाजपा गठबंधन की सरकार इस मामले को सांप्रदायिक बनाने की कोशिश की आलोचना करने में सुस्त दिखती रही है.

पुलिस पर निर्दोष लोगों को फंसाने का आरोप लगाते हुए कठुआ में एक महीने से प्रदर्शन चल रहे हैं. प्रदर्शनकारियों की यह भी मांग है कि हिरासत में लिए गए पुलिसकर्मियों को तुरंत रिहा किया जाए. इन प्रदर्शनों में एक संगठन हिंदू एकता मंच की अग्रणी भूमिका रही है और आरोपितों के समर्थन में हुई रैली में जम्मू-कश्मीर सरकार में शामिल भाजपा के दो मंत्री भी मौजूद रहे थे.

अभी तक की जांच का एक पहलू यह कहता है कि गुज्जर-बक्करवाला समुदाय को डराने के लिए बच्ची का अपहरण करके उसकी बर्बरता से हत्या की गई है. यह घुमंतू जनजाति परंपरागत रूप से जंगलों में घूमती-फिरती है और उसके आसपास ही अपने रहने के ठिकाने बनाती है. जांच में कहा जा रहा है कि वन संसाधनों पर इस समुदाय के अधिकार को खारिज करने की कोशिश के तहत इन्हें डराने के लिए इस अपराध को अंजाम दिया गया है.

अब स्वाभाविक है कि इस घटना के बाद इस घुमंतू जनजाति में एक तरह का डर होगा. यह डर इनकी आजीविका और जीवन के अधिकार से जुड़ा है जिसे दूर करने की जरूरत है. लेकिन फिलहाल वन संसाधनों की इस लड़ाई को इस बच्ची के साथ हुए अपराध के ऊपर नहीं रखा जा सकता. यह मामला जातीय हिंसा का है और जांच इसी दिशा में होनी चाहिए. इस बच्ची की जनजाति के सामुदायिक अधिकारों से नहीं जोड़ा जा सकता. (स्रोत)