निर्देशक : शूजीत सरकार

लेखक : जूही चतुर्वेदी

कलाकार : वरुण धवन, बनिता संधु, गीतांजलि राव, प्रतीक कपूर

रेटिंग : 4/5

साइंस कहता है कि ईश्वर नहीं होता. कभी सोचा है, अगर उसने कभी प्रूव कर दिया कि प्यार जैसा भी कुछ नहीं होता, बल्कि इश्क-मोहब्बत-लव वगैरह फितूर हैं हमारे, तब आप क्या करेंगे?

हमारे हिसाब से, अक्टूबर जैसी फिल्में ही तब साइंस को जवाब देंगी. क्योंकि वो प्रमाण की तलाश में हमेशा रहता है, और अगर हम उससे कहेंगे कि देखो प्यार हमारा देखो, कितना पवित्र है ये, तो वो मानेगा ही नहीं. उसे हर चीज डॉक्यूमेंटिड चाहिए, साक्ष्य चाहिए और अक्टूबर तो जैसे असल जिंदगी के ही किसी महान प्रेम को इतनी सटीकता से परदे पर रचती है कि एक प्रामाणिक साक्ष्य होने के भी काम आ सकती है.

इसके अलावा वो वेदना, त्याग और प्रेम को मिलाकर रचा गया एक महाकाव्य भी है, इसका बोध आपको धीमी गति के इस उत्कृष्ट सिनेमा को देखते वक्त हरदम होता है.

अक्टूबर की कहानी, फिल्मों की समीक्षा वाली भाषा में कहें तो साधारण सी है. जैसे हमारा जीवन असाधारण नहीं है, वैसे ही छोटी-छोटी घटनाओं के बड़ा बनने से उपजा संसार है इसका. पांच सितारा होटल में बेमन से होटल मैनेजमेंट का काम करने वाला डैन (वरुण) सबसे छितरा-छितरा सा रहता है. उसे कभी-कभी निहार लेने वाली नायिका शिउली (बनिता संधू) एक दिन दुर्घटनाग्रस्त होकर कोमा में चली जाती है लेकिन जाने से पहले उसके बारे में पूछती है - ‘व्हेयर इज डैन?’. इस एक सवाल का जवाब तलाशने से डैन की जिंदगी बदल जाती है और इसी दौरान उसे प्यार के असल मायने समझ आते हैं (हमारे खयाल से सुधी दर्शकों को सबसे ज्यादा समझ आने वाले हैं). क्योंकि फिल्म जूही चतुर्वेदी ने लिखी है जो हमेशा ही एक केंद्रीय विचार के आसपास कथा बुनती हैं - विकी डोनर स्पर्म डोनेट करने वाले एक शख्स की कहानी थी, तो पीकू कब्जियत से परेशान एक बूढ़े आदमी की - इसलिए अक्टूबर भी डैन द्वारा इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने की कहानी है कि एक अजनबी लड़की ने कोमा में जाने से पहले क्यों उसका नाम लिया.

जब आप फिल्म में उस सीन को देखेंगे जिसमें शिउली ऐसा पूछती है, तो एक तो उस वक्त आपको रुमानियत का पर्याय बन चुकी ‘ओस’ का एक दूसरा ही पक्ष देखने को मिलेगा, और साथ ही यह भी समझ आएगा कि नाटकीय हिंदी फिल्मों की ग्रामर के इतर जूही चतुर्वेदी ने आम जीवन की एक बेहद छोटी और लापरवाह बात को अपने हुनर के दम पर क्या कमाल अंदाज में फिल्म का केंद्रीय विचार बनाया है. आगे चलकर और बेहतर समझ आएगा कि जीवन की सूक्ष्मतम घटनाओं को, जिन्हें हम नजरअंदाज करने के आदी हैं क्योंकि वे बेहद सामान्य व बोरिंग हैं, जूही व शूजीत की जोड़ी ने अव्वल दर्जे की प्रवीणता से अक्टूबर में शामिल किया है.

अक्टूबर को एप्रीशिएट करने के लिए एक खास बात यह भी समझने की जरूरत है कि आपको धीमी गति के सिनेमा को समझना आना चाहिए. अगर आप वन्स अपॉन अ टाइम इन एनातोलिया जैसी अति की धीमी मगर बेहद उत्कृष्ट तुर्की फिल्म के प्रशंसक हैं तो आपको हमारे चार स्टार्स (पांच में से) की वास्तविक चमक अक्टूबर में नजर आएगी. लेकिन अगर आप टीवी पर हिंदी में डब हुईं साउथ इंडियन एक्शन फिल्में देखने के शौकीन हैं, और थियेटरों में जाकर देखने के लिए ज्यादातर वक्त घोर मसाला फिल्मों के तलबगार रहते हैं, तो आपको सिनेमा के एक क्रैश-कोर्स की सख्त आवश्यकता है. उसके लिए ‘धीमी गति की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों’ का अंग्रेजी में तर्जुमा करके गूगल कीजिए और ऐसी कुछ फिल्में देखकर अक्टूबर के लिए पहले खुद को तैयार कीजिए. हर जिम्मेदारी सिनेमा की नहीं होती, कुछ दर्शकों को भी उठानी होती है.

अक्टूबर का क्राफ्ट भी ज्यादातर हिंदी फिल्मों से बेहद मुख्तलिफ है. अविक मुखोपाध्याय का कैमरा हरसिंगार के फूलों और पहाड़ों की खूबसूरती से लेकर उदासी से लबालब भरे हुए दृश्यों तक को कैप्चर करते वक्त ये एहतियात बरतता है कि वो कहीं भी फिल्मी न लगें. पूरी फिल्म का टैक्स्चर फिल्मी न होकर आपके आसपास टहलती उस जिंदगी सा यथार्थवादी है, जिसमें बिस्तर पर लंबे वक्त तक बीमार पड़े शख्स के आसपास के लोगों का संघर्ष दिखाई देता है. कई लोगों की असंवेदनशीलता के बीच एक-आध लोगों के उस त्याग को समझने का मौका मिलता है जो कभी-कभी अपनी सारी उम्र बिस्तर को घर बना चुके मरीज की सेवा करने में गुजार देते हैं. यह वर्णन सिर्फ नायक-नायिका शिउली और डैन के बारे में नहीं है, बल्कि फिल्म में शिउली की मां गीतांजलि थापा और डैन के बीच भी धीरे-धीरे पनपता रिश्ता आपकी आंखें नम करता है. और दो घंटे से कम की इस फिल्म में वेदना तो इस वेग से बहती है कि कुछ सुधी दर्शकों को यह डर सताएगा ही सताएगा कि कहीं वे आंसुओं का सरोवर न तैयार कर दें.

अक्टूबर में वरुण धवन के किरदार के मुख्तलिफ मिजाज को समझने में उसका कड़क मिजाज बॉस दर्शकों की बेहद मदद करता है. डैन ऐसा सिरफिरा क्यों है कि वह कर जाता है जो कोई समझ नहीं पाता. इस रोल में प्रतीक कपूर ने बेहद सधा काम किया है और दिल्ली तरफ की हिंदी बोलकर खुद को विश्वसनीय बनाया है.

नायिका बनिता संधू की यह पहली फिल्म है और उनके इस हौसले को सलाम कि उन्होंने ऐसी नायिका होना स्वीकारा जो ज्यादातर वक्त अस्पताल के बिस्तर तक सीमित रहती है. उनके पास सिर्फ आंखों से खुद को अभिव्यक्त करने के अवसर थे और यकीन मानिए मृतप्राय चेहरे और केवल आंखों से उन्होंने बेहद प्रभावी अभिनय किया है.

उनसे निष्छल प्रेम करने वाला, और उनके अस्पताल के बैड पर अपनी तस्वीर लगाते वक्त, वह भी पासपोर्ट साइज की चार लगाने वाले नायक डैन की भूमिका वरुण धवन ने अभिनीत की है. जहां उनकी पिछली ‘हटके’ फिल्मों में उन्हें अभिनय के सारे जौहर दिखाने के मौके मिलते रहे थे – ऐसे जौहर जो आसानी से दिख जाते हैं और वाह-वाही तुरंत मिलती है – वहीं अक्टूबर में उन्होंने अविश्वसनीय रूप से बेहद नियंत्रित अभिनय किया है. सहज-सरल होने के अलावा एक सुपरस्टार जब इस दर्जे का अभिनय करता है कि जाना-पहचाना सुपरस्टार लगता ही नहीं, तो वो बहुत बड़ी बात होती है. अक्टूबर देखकर केवल डैन याद रहता है, वरुण नहीं, और आज से कई साल बाद जब इस फिल्म को हम देख रहे होंगे तो शर्तिया उनके इस अभिनय के प्यार में फिर से पड़ेंगे. फिर कहेंगे कि ये तो आलिया भट्ट के स्तर का अभिनय है.

उनके लिए और वेदना, त्याग व प्यार की एक सिनेमाई कविता की मार्मिकता को महसूस करने के लिए अक्टूबर हर हाल में देखिए.