हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा खंडपीठ ने अपने एक फैसले में कहा कि दो लोगों के बीच ‘गहरे प्रेम’ के चलते बने शारीरिक संबंधों को बलात्कार नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने कहा कि अगर ‘गहरे प्रेम संबंध’ के सबूत मौजूद हों तो तथ्यों की ‘गलत व्याख्या’ के आधार पर पुरुष को बलात्कार का दोषी नहीं ठहराया जा सकता. कोर्ट ने 2013 के एक मामले में निचली अदालत द्वारा दिए गए आदेश को खारिज करते हुए यह बात कही. इसमें एक व्यक्ति को एक महिला से शादी का वादा कर उससे बलात्कार करने का दोषी ठहराया गया था.

हालांकि बलात्कार के झूठे केसों का पता लगाना काफी मुश्किल है, लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि ऐसे मामलों की संख्या बढ़ रही है. 2012 में हुए निर्भया कांड के बाद बलात्कार के मामलों की रिपोर्टिंग में तेज वृद्धि देखी गई है. दिल्ली महिला आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2013 में दिल्ली में बलात्कार के जो मामले दर्ज किये गये थे उनमें 53 प्रतिशत झूठे थे. बलात्कार के कुल दर्ज हुए केसों में लगभग 25 फीसदी ऐसे थे जिनमें आरोप था कि पुरुष ने शादी करने के नाम पर महिला से यौन संबंध बनाए और फिर बाद में शादी नहीं की.

बलात्कार की झूठी रिपोर्टिंग के पीछे जानकार कई कारणों को जिम्मेदार मानते हैं. एक तो किसी से बदला लेने के लिए उसके खिलाफ बलात्कार की झूठी रिपोर्ट करना अब आम होता जा रहा है. शहर से लेकर गांव तक, साक्षरों से लेकर निरक्षरों तक हर जाति, धर्म और वर्ग में किसी पुरानी रंजिश का बदला लेने के लिए बलात्कार की झूठी रिपोर्टिंग करने को सबसे प्रभावी हथियार की तरह प्रयोग किया जाने लगा है. इसके पीछे कारण यह है कि ऐसे केस में सख्ती से कार्रवाई की गुंजाइश बन जाती है. सजा न भी हो तो भी आरोपित की सामाजिक प्रतिष्ठा को इतनी ठेस तो पहुंच ही जाती है कि उससे रंजिश का हिसाब-किताब आसानी से चुकता हो जाता है.

जानकारों के मुताबिक कई बार आर्थिक फायदे के लिए भी बलात्कार की झूठी रिपोर्टिंग कर दी जाती है. लड़कियों द्वारा अपने प्रेम संबंधों का खुलासा होने पर अक्सर ही खुद को बचाने के लिए प्रेमी पर बलात्कार का आरोप लगाने की घटनाएं भी बेहद आम हैं. ऐसा इसलिए कि भारतीय परिवारों में लड़की द्वारा अपने प्रेमी से यौन संबंध बनाने को अभी भी बलात्कार से ज्यादा कलंकित करने वाला काम माना जाता है. परिवार वालों के लिए बेटी का सेक्स पार्टनर या लाइफ पार्टनर चुनना, आज भी बहुत ज्यादा शर्म का विषय है. वे एक बार को इस बात को तो बर्दाश्त कर लेंगे कि उनकी बेटी का बलात्कार हुआ है, लेकिन उनकी बेटी ने परिवार वालों की सहमति या जानकारी के बिना स्वेच्छा से किसी लड़के संबंध बनाए, यह बात उनकी प्रतिष्ठा को सबसे ठेस पहुंचाती है. खासतौर से अंतरर्जीय और अंतरधार्मिक प्रेम संबंधों में तो इसकी संभावना बहुत ही ज्यादा होती है. यही कारण है कि अचानक से प्रेमी के साथ संबंधों का खुलासा होने पर अक्सर ही लड़कियां सच कहने का साहस नहीं जुटा पातीं और प्रेमी के खिलाफ परिवार वालों के दबाव में झूठी रिपोर्ट दर्ज करा देती हैं.

लड़की के प्रेम संबंधों को परिवार वालों द्वारा स्वीकार न करने का परिणाम यह होता है कि अक्सर ही जिन लड़कों को बलात्कार के झूठे आरोप में फंसाया जाता है उनका पूरा जीवन तबाह हो जाता है. एक तरफ वे प्रेम संबंध खत्म होने के कारण भावनात्मक टूटन का शिकार होते हैं. दूसरी तरफ बलात्कार के केस के कारण उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा खराब होती है. साथ ही कोर्ट की लंबी कार्रवाई उनके करियर को भी तबाह कर देती है. उधर, लड़कियां भी प्रेमी पर झूठे केस करने के अपराधबोध में जीती हैं और लंबे अवसाद का शिकार होती हैं.

लड़कियों द्वारा प्रेमी के खिलाफ बलात्कारी के रूप् में रिपोर्ट दर्ज करना बताता है कि कैसे समाज की झूठी नैतिकता अनजाने में ही लड़कियों को अपराधी बना देती है या फिर जानबूझकर उन्हें अपराध करने को विवश करती है. बलात्कार के झूठे केसों से लड़कों/पुरुषों का जीवन तो तबाह होता ही है, साथ ही बलात्कार के सच्चे केसों के प्रति भी समाज का रवैया अविश्वसनीय होता जाता है. इसका पीड़िता और उसके परिवार वालों पर बहुत नकारात्मक असर पड़ता है.

बलात्कार के झूठे मामलों की जांच करने वाली पत्रकार नित्या नागरत्नम एक साक्षात्कार में कहती हैं, ‘ऐसे ज्यादातर केसों की रिपोर्टिंग लगभग एक ही तरह से होती है. जिसमें कहीं न कहीं इस बात का जिक्र जरूर होता है कि लड़की को धोखे से या जबरदस्ती सिडेटिव ड्रिंक (बेहोश करने वाला) पिलाया गया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि लड़की होश में नहीं थी और यौन संबंधों में उसकी सहमति नहीं थी.’ नित्या आगे कहती हैं, ‘दिल्ली में दर्ज होने वाले बलात्कार के झूठे मामलों का प्रतिशत अंतरर्राष्ट्रीय मानकों से कहीं ज्यादा है. हालांकि बलात्कार की झूठी रिपोर्टिंग काफी बढ़ गई है. इसके बावजूद असली बलात्कार के ज्यादातर केसों की अभी भी रिर्पोट नहीं की जाती.’

दिल्ली में बलात्कार के झूठे मामलों की बढ़ती रिपोर्टिंग देखकर दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली महिला आयोग को निर्देश दिया है, कि वह सभी थानों में ऐसे प्रशिक्षित काउंसिलरों को नियुक्त करे जो बलात्कार की पीड़ित के साथ तो सहानुभूति बरतें, लेकिन बलात्कार के झूठे केस दर्ज करने वालों को हतोत्साहित करें. कुछ जानकारों का मानना है कि बलात्कार के झूठे केस दर्ज करने वाली लड़कियों/महिलाओं पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए. तभी इस तरह की झूठी रेप रिपोर्टिंग को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. उनका यह भी कहना है कि समाज द्वारा लड़कियों के प्रेम संबंधों को स्वीकार करके बलात्कार की झूठी रिपोर्टिंग की एक वजह तो कम की ही जा सकती है.