यह 11 अप्रैल की बात है जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्वीट करके धमकी दी थी, ‘...रूस तैयार हो जाओ... सीरिया में अमेेरिका की मिसाइलें आ रही हैं...’ और फिर 14 अप्रैल यानी बीते शनिवार को ट्रंप ने सीरिया पर हमले का आदेश दे दिया. अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस ने मिलकर यह हमला सीरिया की राजधानी दमिश्क के पास स्थित सरकार के कथित रासायनिक हथियार केंद्रों पर किया है. बीते साल भी अमेरिका ने एक ऐसा ही हमला सीरिया के इदलिब प्रांत में हुए एक रासायनिक हमले के जवाब में किया था.

ताजा हमले से पहले डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि निर्दोष नागरिकों पर दूसरी बार रासायनिक हमला करके सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद ने इंसानियत की गरिमा तार-तार करते हुए सारी हदें पार कर दी हैं इसलिए असद को सबक सिखाना जरूरी है. हालांकि, सीरिया सरकार और उसके सैन्य सहयोगी रूस ने इन आरोपों से इनकार करते हुए रासायनिक हमले के लिए सरकार विरोधी समूहों (विद्रोहियों) को जिम्मेदार ठहराया है.

इन सभी घटनाक्रमों के बीच एक सवाल यह उठता है कि अमेरिका सीरिया पर बार-बार ये छिटपुट हमले क्यों करता है. इस सवाल को यूं भी रखा जा सकता है कि जब डोनाल्ड ट्रंप को विश्वास है कि इन रासायनिक हमलों के लिए बशर अल-असद ही जिम्मेदार हैं तो फिर वे अफगानिस्तान, इराक और लीबिया की तरह सीरिया पर भी कोई बड़ी सैन्य कार्रवाई क्यों नहीं करते. क्यों अमेरिका हर बार चंद मिसाइलें दागने के बाद चुप होकर बैठ जाता है. सीरिया पर नजर रखने वाले कई जानकार कहते हैं कि भले ही लग रहा हो कि अमेरिका ऐसा रूस की वजह से नहीं कर रहा, लेकिन उसके ऐसा न करने के पीछे केवल यही एक कारण नहीं है.

नैतिक रूप से अमेरिका का पक्ष कमजोर है

अमेरिकी पत्रकार फ्रेडरिक कू कहते हैं कि अमेरिका सीरिया में कोई बड़ी सैन्य कार्रवाई इसलिए नहीं कर सकता क्योंकि उसका पक्ष नैतिक रूप से कमजोर है. उनके मुताबिक इससे पहले भी सीरिया में 2013 और 2017 में आम लोगों पर दो बड़े रासायनिक हमले हुए थे जिनके आरोप भी असद सरकार पर लगे थे. लेकिन, कई महीने चली संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की जांच में नतीजे कुछ और ही निकले. जांच में पता चला कि ये हमले खुद विद्रोहियों ने ही कराये थे जिनका मकसद असद सरकार को बदनाम कर पश्चिमी देशों की मदद लेना था.

कुछ जानकार एक और तथ्य की तरफ इशारा करते हैं. इनके मुताबिक पिछले सालों में असद की सेना ने रूस के साथ मिलकर लगभग पूरे सीरिया से विद्रोहियों को खदेड़ दिया है. देश के पूर्व हिस्से में स्थित डूमा और इसके आसपास ही अब विद्रोहियों का कब्जा बचा है. इस बात पूरी संभावना है कि डूमा पर भी जल्द ही असद की सेना का कब्जा हो जाएगा. जानकार कहते हैं कि जब असद का इस आखिरी बचे क्षेत्र पर जल्द ही कब्जा होने वाला है तो वे यहां के आम लोगों पर रासायनिक हमलाकर पश्चिमी देशों से बुराई क्यों मोल लेना चाहेंगे. ऐसा करना तो उनके लिए अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा.

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनावी प्रचार के दौरान सीरिया में कोई भी बड़ी सैन्य कार्रवाई न करने की बात कही थी

नवंबर, 2016 में हुए राष्ट्रपति चुनाव के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने सीरिया संकट को अपने प्रमुख मुद्दों में शामिल किया था. उन्होंने अपनी लगभग हर रैली में लोगों को सचेत किया था कि अगर डेमोक्रेट प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन जीतीं तो तीसरे विश्व युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए. चुनाव प्रचार में हिलेरी ने ओबामा के पद चिन्हों पर चलते हुए सीरिया में बशर अल-असद को सत्ता से हटाने का वादा किया था. वहीं ट्रंप का कहना था कि वे सीरिया से अमेरिकी सेना को वापस बुलाएंगे.

तब ट्रंप का यह भी कहना था कि अमेरिका ने सीरिया और इराक में बहुत पैसा बरबाद किया है, लेकिन इससे उसे कोई फायदा नहीं हुआ. ऐसे में वे ‘अमेरिका प्रथम’ की नीति पर चलते हुए इस गलती को नहीं दोहराएंगे. ट्रंप का साफ़ कहना था कि उनका मकसद अमेरिकी कर दाताओं के पैसे को बचाकर अमेरिका में ही लगाना है. ट्रंप ने मध्यपूर्व को लेकर न सिर्फ बराक ओबामा बल्कि अपनी ही पार्टी के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश की भी नीतियों पर कई बार निशाना साधा था. एक बहस में उन्होंने कहा था, ‘इराक का युद्ध जार्ज डब्ल्यू बुश की सबसे बड़ी गलती थी जिसका खामियाजा अमेरिका सहित पूरी दुनिया को भुगतना पड़ा. मैं ऐसी गलती नहीं करूंगा.’

अमेरिका में नवंबर 2018 में यानी छह महीने बाद ही मध्यावधि चुनाव होने हैं. संसद के निचले सदन ‘हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स’ की सभी 435 और सीनेट की 33 सीटों के लिए यह चुनाव होगा. जाहिर है कि इस चुनाव में रिपब्लिकन की हार या जीत का श्रेय भी वर्तमान राष्ट्रपति को ही दिया जाएगा. जानकार कहते हैं कि इस चुनाव से पहले अपने अधिकांश वादे पूरे करने में लगे अमेरिकी राष्ट्रपति सीरिया मामले में अपने वादे से पलटकर जनता की नाराजगी मोल लेना नहीं चाहेंगे.

अमेरिकी जनता भी सीरिया में सैन्य दखल के पक्ष में नहीं है

अमेरिका में पिछले सालों में हुए कई सर्वेक्षणों से पता चलता है कि वहां के अधिकांश लोग सीरिया में अमेरिकी दखल के खिलाफ हैं. लोगों का कहना है कि अमेरिका के सीरिया में दोबारा सक्रिय होने से न तो अमेरिका का ही भला होगा और न ही किसी और का. ये लोग कहते हैं कि अमेरिका का कुल वार्षिक बजट केवल एक खरब डॉलर के करीब रहता है जबकि इराक युद्ध में अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने छह खरब डॉलर खर्च कर दिए. इनके मुताबिक अगर यह पैसा अमेरिका में लगाया जाता तो देश की अर्थव्यवस्था की तस्वीर ही बदल जाती.

इसके अलावा ज्यादातर अमेरिकियों का यह भी तर्क है कि अब सीरिया में अमेरिका के दखल का मतलब दुनिया को एक बार फिर बड़े खतरे में डालना होगा. इन लोगों के मुताबिक सीरिया में रूस के दखल के बाद अब वहां जो स्थिति है उससे साफ है कि असद जल्द ही विद्रोहियों को खत्म कर देंगे. लेकिन, अगर अमेरिका ने फिर असद को हटाने के लिए सक्रियता दिखाई तो इससे वहां की स्थिति बदल जायेगी. अमेरिकियों का कहना है कि इससे दुनियाभर में शरणार्थियों की संख्या बढ़ेगी, साथ ही कट्टरता और आतंकवाद के लिए नए अवसर पैदा होंगे.

अमेरिकियों का यही युद्ध विरोधी रुख शनिवार को सीरिया पर किये गए मिसाइल हमलों के बाद भी देखने को मिला. इन हमलों के विरोध में अमेरिका के शिकागो और पेनसिल्वानिया सहित कई शहरों में लोगों ने मार्च निकालकर प्रदर्शन किया था.

भारी-भरकम खर्च का डर

डोनाल्ड ट्रंप के सीरिया में सक्रिय लड़ाई न लड़ने की एक वजह और भी बताई जाती है. जानकारों की मानें तो ट्रंप जब से राष्ट्रपति बने हैं उनकी सोच किसी तरह अमेरिकी पैसे को बचाने की है. पाकिस्तान और फिलस्तीन सहित कई देशों के साथ-साथ यूएन को दी जाने वाली आर्थिक मदद में कटौती करना, साथ ही चीनी सामान पर भारी आयात शुल्क लगाना इसके उदाहरण हैं. ये लोग कहते हैं कि ऐसे में अपने पूर्ववर्तियों को इराक युद्ध में अरबों डॉलर खर्च करने को लेकर कोसने वाले ट्रंप कभी सीरिया में सक्रिय लड़ाई लड़ना नहीं चाहेंगे.

डोनाल्ड ट्रंप के कई पूर्व करीबी बताते है कि ट्रंप का शुरू से मानना रहा है कि सीरिया में दोबारा लड़ने का मतलब एक ऐसी जंग की शुरुआत करना होगा जो अनिश्चित समय तक खिंच सकती है. इसका कारण यह है कि अमेरिका सीरिया में बशर अल-असद को सत्ता से हटाने के लिए लड़ेगा जबकि रूस ऐसा होने नहीं देगा. यानी अमेरिका को रूस और ईरान की सैन्य ताकत से सीधा मुकाबला करना पड़ेगा. इस स्थिति में यह युद्ध अमेरिका के लिए बहुत ज्यादा खर्चीला साबित होगा.