शिवराज जी, आपकी सरकार ने पांच संत-बाबाओं को राज्य मंत्री का दर्जा क्यों दिया है?

कमाल है, क्या इस देश में सिर्फ अपराधी और भ्रष्टाचारी ही मंत्री बन सकते हैं, संत नहीं! मेरे कहने का मतलब है कि जब कभी कोई अपराधी मंत्री बनता है तो कोई इतने सवाल नहीं करता. लेकिन संतों के मंत्री बनते ही सवालों की झड़ी लग गई है. मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या अपराधी ज्यादा बड़े संत हो गए हैं या फिर संत अपराधियों से भी बुरे हैं!

मध्य प्रदेश में तो हजारों संत-बाबा हैं, फिर आपने किस आधार पर इन संतों का चुनाव किया?

ये सवाल बिलकुल ठीक है. इतने सारे संतों में से पांच का चुनाव करना सच में बड़ी चुनौती हो सकती थी. लेकिन इस काम को उन संतों ने ही आसान कर दिया. मैंने सिर्फ उन्हीं संतों को मंत्री बनाया जो नर्मदा घोटाला रथ यात्रा की योजना बना रहे थे. मंत्री बनते ही उन लोगों ने तेजी से अपनी जिम्मेदारी संभालते हुए, सबसे पहले बेमतलब की इस रथ यात्रा का कार्यक्रम रद्द कर दिया है.

आपने सिर्फ नर्मदा घोटाला रथ यात्रा निकालने वाले संतो को ही क्यों मंत्री बनाया?

देखिये, सरकारों में घोटाला हो या न हो, लेकिन अगर कोई उन्हें उजागर करने की कोशिश करता है तो सरकार की फालतू में बदनामी होती है. यानी घोटाला उजागर करने वाले, घोटाला करने वालों से ज्यादा हानिकारक होते हैं. हमें इन हानिकारक तत्वों से किसी न किसी तरह तो निपटना ही था. पर ये लोग ठहरे संत, तो इनसे निपटने का हमें यही सबसे अच्छा रास्ता लगा.

क्या आपने संतों को मंत्री बनाने के लिए कोई पात्रता भी निर्धारित की है?

हां बिलकुल. हमारी सरकार सिर्फ उन्हीं संतों को मंत्री बनाने पर विचार करेगी जिनके पास किसी भी किस्म के घोटाले उजागर करने, सरकारी योजनाओं की पोल खोलने या बुनियादी अधिकारों से जुड़ा कोई आंदोलन खड़ा करने की कोई ठोस योजना होगी.

क्या कोई ऐसा भी संत था जिसे मंत्री बनाने का आपके ऊपर सबसे ज्यादा दबाव हो?

हां था न, संत गुरमीत राम रहीम को! जैसे ही यह खबर फैली कि हम कुछ संतों को राज्य मंत्री का दर्जा देने जा रहे हैं, राम रहीम के समर्थकों ने इसके लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया. लेकिन मुझे अफसोस है कि बदनामी में इतना ज्यादा नाम कमाने के बाद भी वे मंत्री बनने की पात्रता पूरी नहीं कर पाये. क्योंकि वे अपने ही बड़े-बड़े कांड छिपाने में इतने ज्यादा व्यस्त रहे कि किसी मंत्री के घोटालों को उजागर करने का उन्हें होश ही नहीं था. इस कारण वे मंत्री बनने की रेस में पिछड़ गए.

इन संत-बाबाओं को मंत्री का दर्जा दिए जाने पर हाई कोर्ट ने आपकी सरकार को नोटिस भेजा है. इस बारे में आपका क्या कहना है?

देखिये यह सिर्फ विपक्ष की चाल है. वैसे भी मंत्रियों को अदालतों में घसीटना तो आज की राजनीतिक रस्म है. लेकिन वे भूल रहे हैं कि जिसे अदालत के चक्कर कटवाने का वे सोच रहे हैं, वह भाजपा अपने विरोधी नेताओं को अदालत के चक्कर कटवा-कटवा के जान सुखा दे रही है. अदालत के चक्कर कटवाने में वे हमसे नहीं जीत सकते!

विपक्ष ने आपको ‘घोषणावीर मुख्यमंत्री’ का तमगा दिया है. इस पर आपका क्या कहना है?

इससे कई गुना बेहतर तमगे मैं पप्पुओं के सरताज को दे सकता हूं, पर वे इस लायक भी नहीं हैं!

प्रदेश कांग्रेस का आरोप है कि इन 14 सालों में आप लगभग 12 हजार घोषणाएं कर चुके हैं, जिनमें से ज्यादातर पूरी नहीं हो पाईं. आखिर आपने ये सब घोषणाएं पूरी क्यों नहीं की?

जिन्होंने घोषणाएं पूरी कर दीं, उन्होंने कौन-से तीर मार लिये! वैसे भी अब मैं ये सब घोषणाएं अपनी सरकार के चौथे कार्यकाल में पूरी करूंगा.

क्या आप आश्वस्त हैं कि आने वाले विधानसभा चुनावों में मध्य प्रदेश में फिर से भाजपा ही सरकार बनाएगी?

बिलकुल. इन चौदह सालों में हमने मध्य प्रदेश में इतना कीचड़ फैला दिया है... मतलब कि विकास के काम कर दिए हैं कि अब यहां फिर कमल का खिलना तय है.

लेकिन सुनने में तो आ रहा है कि किसान आंदोलन और योजनाओं के लागू न होने से पूरे प्रदेश में आपके खिलाफ माहौल बन रहा है...

देखिए बड़े-बड़े लोग कह गये हैं - जितना आपका विरोध बढ़े, उतना ही ज्यादा समझना चाहिए कि आप सही राह पर हैं. तो मैं योजनाएं लागू करूं या नहीं, मेरे विरोधी बार-बार साबित कर रहे हैं कि मैं सही राह पर हूं. (मुस्कुराते हुए)

आपके तीन कार्यकाल के दौरान हुए किसान आंदोलनों में कई बार मध्य प्रदेश पुलिस ने किसानों पर फायरिंग की है, ऐसे में आप खुद को किसान सहयोगी सरकार कैसे कह सकते हैं?

मारे गए सभी किसानों के परिवारों को हमने एक-एक करोड़ रुपये की सहायता राशि देने की बात की है. मरे हुए किसान की कीमत हमने जिंदा किसान से ज्यादा आंकी है. क्या इसके बाद भी आपको हमारे किसान सहयोगी होने में शक है!

पिछले दिनों देश में जहां-जहां उपचुनाव हुए, वहां-वहां भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है. ऐसे में क्या इस बात की संभावना ज्यादा नहीं है कि राज्य में आने वाले विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को हार का मुंह देखना पड़े?

अव्वल तो ऐसा होगा नहीं और यदि हुआ, तो हम केन्द्र से सिफारिश करेंगे कि वह भाजपा की हार वाली सीटों पर हुए चुनाव को उपचुनाव घोषित करे और कुछ समय बाद उन पर फिर से चुनाव करवाए.

अच्छा यह बताइये कि आपने किस आधार पर कहा था कि मध्य प्रदेश की सड़कें अमेरिका से बेहतर हैं?

क्या आप खुलेआम यह बात कह देंगी कि कोई और आपसे बेहतर इंटरव्यू करता है या कोई दूसरी न्यूज साइट आपकी साइट से बेहतर है? नहीं न? तो फिर मैं भला क्यों न कहूं कि मैंने ट्रंप से ज्यादा बढ़िया सड़कें बनवाई हैं. इस देश के पकौड़े वाले से लेकर बड़ी-बड़ी कंपनी के मालिक तक, सब दिन-रात सेल्फ प्रमोशन करते हैं. हर कोई अपने माल को दूसरे से बेहतर बताता है. मैंने इसमें क्या अनोखा कह दिया! इस देश का चाय वाला...मेरा मतलब चाय वालों तक को भी सेल्फ प्रमोशन का हक है, और मुख्यमंत्री को नहीं! (चिढ़ते हुए)