आजकल यह पद आलोचना में सुनने में नहीं आता: पहले रचना-प्रक्रिया की बड़ी चर्चा होती थी. अक्सर वह रचना पर अधिक, प्रक्रिया पर कम केन्द्रित होती थी. इसी तरह का एक और प्रायः भुला दिया गया पद है ‘भावबोध’. अनुभूति का ज़िक्र भी इधर कम होता है. इस विस्मृति का यह आशय तो नहीं है कि इधर की रचनाओं में प्रक्रिया, भाव और अनुभूति कम या घट गए हैं पर उन पर आलोचना में ध्यान देना हमने बहुत कम कर दिया है. किसी युवा विद्वान् को हिन्दी आलोचना में ऐसे पदों के जन्म और अवसान पर कुछ काम करना चाहिए.

प्रक्रिया पर मेरा ध्यान गया अमरीकी कवि राबर्ट हैस की नई पुस्तक ‘अ लिटिल बुक आन फ़ार्म’ (इको प्रेस) देखने से गया. हिन्दी में शायद ही किसी कवि ने कविता में रूप की रचना पर इतने विस्तार से कभी लिखा हो. यह कविजनोचित विनय है कि विषय की व्याप्ति को देखते हुए साढ़े चार सौ पृष्ठों से अधिक मोटी पुस्तक को ‘एक लिटिल बुक’ कहा है. कवियों के अलावा सभी रसिक-पाठक यह तो जानते हैं कि कविता रची जाती है- उसे फूल या पत्ती की तरह कहीं से बना-बनाया चुना नहीं जा सकता. इसे बनाने में कविकौशल लगता है, भाषा का विशिष्ट लयात्मक उपयोग करने की कल्पना, क्षमता और रूप की लम्बी परम्परा का योगदान होता है.

हाल ही में बंगाल से अपने संबंध के बारे में एक इंटरव्यू में मुझसे पूछा गया कि बांग्ला में वहां के कई महत्वपूर्ण कवियों और कलाकारों ने विस्तार से रूप और शिल्प के बारे में पुस्तकें लिखी हैं. मेरा ध्यान इस ओर गया कि हिन्दी में ऐसी पुस्तकें नहीं हैं. शायद इसी का एक दुष्प्रभाव है कि आज की ज़्यादातर युवा हिन्दी पीढ़ियां रूप और शिल्प के प्रति लापरवाह और ख़ासी निरक्षर हैं- कुछ भी कैसे भी लिख देना आम आदत बन रही है. इसकी याद कम होती जा रही है कि कविता शिल्पित होती है, उसे रचना पड़ता है और उसमें सदिच्छा से अधिक प्रयत्न और कुछ शिक्षा-दीक्षा की दरकार होती है. अगर हिन्दी में अख़बार की ख़बरों, निरे गद्य और रूपलयशिल्पहीन अराजकता घर गई है तो इसने कविता की क्षति ही की है.

नई तकनीक ने इस अराजकता को और मान्य और व्यापक कर दिया है. रूप की ऐसी लगातार उपेक्षा, लगभग अवमानना, स्वयं हिन्दी के लिए अभूतपूर्व ही कही जाएगी. अनुभव तो सीधे हो सकता है पर रूप अर्जित करना पड़ता है. साहित्य प्रथमतः और अन्ततः भाषा का सबसे शिल्पित रूप होता है. बड़े साहित्य में कथ्य और रूप के बीच अन्तर कम से कम होता है- उनका सामान्य द्वैत भी ग़ायब या बहुत झीना हो जाता है. ‘क्या कहा’ और ‘कैसे कहा’ का अन्तर बहुत क्षीण हो जाता है. पर यह होता तभी है जब किसी लेखक को रूप-शिल्प पर पूरा अधिकार हो और उनकी संभावनाओं और सीमाओं की गहरी समझ भी. रूपहीन साहित्य टिकाऊ नहीं हो सकता और न ही स्मरणीय.

सारंगी में जीवन

उस्ताद अब्दुल लतीफ़ खां एक बड़े सारंगीवादक थे. उनकी एक जीवनी उर्दू लेखन और संगीतविद श्याम मुंशी ने ‘सारंगी के हमसफ़र’ लिखी है जो भोपाल के पहले पहल प्रकाशन ने प्रकाशित की है और उस्ताद की स्मृति में भोपाल में आयोजित एक समारोह में 23 अप्रैल 2018 को लोकार्पित हो रही है.

यह एक अद्भुत कथा है- एक ऐसे जीवन की जिसने अपनी सार्थकता, मर्म और सत्व पाया सारंगी से. यह संघर्षकथा है स्वयं सारंगी के लगभग एक व्यक्ति बन जाने की. ऐसी परस्पर पर्यायता बिरली होती है जैसी कि उस्ताद अब्दुल लतीफ़ खां और सारंगी में हुई. वह भी एक ऐसे समय में जिसमें सारंगी को एक तरह से हाशिये पर फेंके जाने का उपक्रम चल रहा था. इसमें एक तरह की अल्पसंख्यता भी जुड़ी थी: एक अल्पसंख्यक वाद्य का एक अल्पसंख्यक वादक.

श्याम मुंशी ने यह जीवनी बहुत दिलचस्प शैली में ऐसे लिखी है कि आप उसे एक लम्बी कहानी की रोचकता से पढ़ सकते हैं. उसमें एक संगीतकार का निस्संकोच गुणगान है और जहां-तहां अतिशयोक्ति भी दिखाई पड़ सकती है. जितना अब्दुल लतीफ़ सारंगी पर आसक्त हैं लगभग उतना ही श्याम लतीफ़ साहब पर. यह एक आसक्त जीवनी है और उसे ऐसा होने में कोई संकोच नहीं है. उन्होंने आलोचनात्मक दृष्टि से औरों को देखा है पर लतीफ़ साहब को नहीं. लेकिन यह कोई कमी नहीं लगती.

जीवन और संगीत दोनों ही जितनी दृष्टि और आसक्ति से निर्धारित होते हैं उतने ही जीवंत ब्योरों से जिसमें वे रसे-बसे रहते हैं. एक अपरिपक्व तरुण का अपने को जीवन भर के लिए सारंगी से बांध देना और उसे अन्त तक निभा ले जाना असाधारण घटना है. सीखने और जैसे-तैसे जीवन यापन करने के जो ब्यौरे श्याममुंशी ने एकत्र कर अपनी कथा में गूंथे हैं उनसे यह लगता है कि जैसे लतीफ़ साहब और सारंगी दोनों ही एक-दूसरे के लिए ही बने थे. इसलिए यह कथा इस विशेष अर्थ में सारंगी की आत्मकथा भी है: लतीफ़ साहब का सच्चा आत्म तो सारंगी में ही बसता था. वह उसी में बोलता-गाता-पुकारता-पछियाता था.

जिन कठिन परिस्थिति और ग़रीबी में यह संगीत-साधना की गई उससे यह भी ज़ाहिर होता है कि सच्चा और बड़ा संगीत कई मायनों में एक सामुदायिक गतिविधि भी था: उसमें व्यक्तिगत प्रतिभा की जितनी भूमिका थी उतनी ही समुदाय और परिवेश की. ग़रीबी, विपन्नता और ऐसी कठिनाइयों ने साधना को न तो शिथिल किया न ही संगीत को कमज़ोर या चलाऊ किया. संगीत में एक वैकल्पिक जीवन संभव था जहां मधुरिमा, सूक्ष्मता और स्वर के वैभव के लिए जगह और अवकाश थे. यह नोट करना दिलचस्प है कि भयावह परिस्थिति ने संगीत को धार दी होगी पर उसे कटु-कर्कश नहीं बनाया. यह भी कहा जा सकता है कि एक लगभग सदा निम्नमध्यवर्ग की ज़िन्दगी बसर करनेवाले लतीफ़ साहब के यहां मानवीय स्थिति की स्थायी विडंबना पर उनकी सारंगी विलाप है. या शायद प्रार्थना कि, फिर भी, वह सबको कुछ ऊपर उठने दे. उसकी स्वर-चेष्टा हमें उदात्त और विराट से स्पंदित उनसे जोड़ दे, भले कुछ देर के लिए ही.

उस्ताद अब्दुल लतीफ़ खां साहब को कुछ नज़दीकी से जानने-समझने-गुनने का सौभाग्य मुझे मिला था. उनमें आत्मविश्वास भरपूर था, पर अहंकार रत्ती भर नहीं. वे अपने संगीत पर ज़िद कर अड़े रहे पर उनकी कुछ और सीखने की टेव (आदत) मन्द नहीं पड़ी. उनका महान संगीत उन्हें हमेशा विनय का पाठ पढ़ाता रहा और वे उसका पालन करते रहे. अपने कठिन जीवन का बोझ या आतंक उन्होंने कभी दूसरों पर नहीं डाला. वे छोटे से छोटे कलाकार के साथ संगत करने में वैसे ही लगन से बजाते थे जैसे मूर्धन्यों के साथ. उन्हें कटु हो जाने के जीवन ने बहुत कारण दिए पर उन्होंने अपने साज़ के बुनियादी चरित्र याने अटूट अदम्य मधुरिमा को कभी खण्डित या दूषित नहीं होने दिया.

अगर लतीफ़ साहब किसी भी वाद्य को साध सकने में सक्षम थे, जैसा कि इस जीवनी में तथ्यपरक ढंग से बताया गया है, तो इसका अर्थ यही है कि उन्होंने सिर्फ़ सारंगी नहीं संगीत को भी पूरी तरह से साध और स्वाया कर लिया था. यह और बात है कि उसकी सबसे सच्ची अभिव्यक्ति उनके यहां सारंगी में ही होती थी, फिर वह एकल वादन में हो या संगत में. यह अनूठी तदाकारिता ही उनके जीवन, उनकी संगीत-जिजीविषा को दीप्त करती थी. यह द्वाभा का मामला था: सारंगी से दीप्त लतीफ़ और लतीफ़ से आलोक्ति सारंगी.

मिला रंग से रंग

अभी रज़ा की मृत्यु को दो साल भी पूरे नहीं हुए है कि यह दुखद समाचार मिला कि आधुनिक भारतीय कला के एक और मूर्धन्य और रज़ा के घनिष्ठ मित्र राम कुमार का निधन हो गया. वे कई दिनों से बीमार चल रहे थे. जैसे सारे रंग अब एक नीरंग में मिल गए. राम कुमार की आयु 93 के क़रीब थी और उन्होंने लगभग सात दशक एकनिष्ठ भाव से अपनी कला को दिए. उन्होंने शुरू में कुछ हिन्दी कहानियां और एकाध उपन्यास भी लिखे थे जिनका उनकी मध्यवर्ग की घूसर उदासी चित्रित करने के लिए नोटिस भी लिया गया था. वे प्रख्यात प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप से जुड़े थे और आधुनिक भारतीय कला का कोई भी वृतान्त या विश्लेषण उनके योगदान को हिसाब के लिए पूरा और प्रामाणिक नहीं हो सकता.

एक तरह की अल्पभाषिकता उनके जीवन और कला का अनिवार्य पक्ष रही. उन्हें एक मूर्धन्य के रूप में दशकों से मान्यता मिली हुई थी पर वे अपने बारे में कुछ विशेष कहने या अपनी कला के लिए कोई दावा करने से हमेशा विरत रहे. शुरू तो उन्होंने आकृतिमूलक चित्रों से किया था जिनमें मध्यवर्गीय विषण्णता (दुःखी होने का भाव) के अनेक मर्मचित्र शामिल थे, पर बाद में लगभग छ: दशकों से लैंडस्केप ही बनाते रहे. उनकी रंग-ज्यामिति धीरे-धीरे विशिष्ट और अद्वितीय होती गई और राम कुमार के चित्रों की पहचान ही बन गई. मुझे याद है कि भारत भवन की कलादीर्घा में प्रदर्शित एक चित्र को देखकर दूर से ही तब के उपराष्ट्रपति जस्टिस हिदायतुल्ला ने उसे राम कुमार की कृति के रूप में पहचान लिया था. जैसे राम कुमार अक्सर सभा-गोष्ठी और महफ़िलों में ज़्यादातर चुप ही रहते थे वैसे ही उनकी चित्रों में मुखरता बहुत कम, कभी-कभार, अक्सर चुप्पी ही होती थी. मौन को चित्रित करने में वे अपने मित्र वासुदेव गायतोण्डे के सहचर थे. वे अज्ञेय के भी निकट थे और उनकी एक पंक्ति ‘मौन भी अभिव्यंजना है’ उनपर बहुत लागू होती थी.

राम कुमार के चित्रों को अपनी सम्पूर्णता में शायद मौन की सम्भावना और वैभव का, मौन के अथक परिष्कार का क्षण भी कहा जा सकता है. अद्भुत यह है कि वे मौन गीति-क्षण चित्रित करते हुए मौन को एक तरह का महाकाव्यात्मक आयाम दे देते थे. यह आयाम उनकी गीतपरवता को खण्डित या अतिक्रमित नहीं करता था. उनके यहां किसी तरह की अतिरंजना कभी नहीं आ सकी, अचूक परिष्कार के बावजूद. उनकी कला आधुनिकता के प्रचलित ‘खण्ड खण्ड पाखण्ड पर्व’ के बजाय सम्पूर्णता, लय और निरन्तरता का आग्रह करती थी. इस विशेष संदर्भ में वे रज़ा के साथ एक तरह वैकल्पिक आधुनिकता के वास्तुकार थे.

मैंने अपने जीवन में पहली कला-प्रदर्शनी 1958 में दिल्ली के शिल्पी चक्र में देखी थी जो राम कुमार की एकल प्रदर्शनी थी और जहां उनसे और उनके भाई निर्मल वर्मा से पहली बार भेंट हुई थी. बाद में भोपाल में मध्य प्रदेश कला परिषद् और भारत भवन के दौरान वे हमेशा पूरा सहयोग देते रहे. 1982 में जब भारत भवन का उद्घाटन होने जा रहा था तो जगदीश स्वामीनाथन की मदद करने जो मूर्धन्य आये थे उनमें हुसेन, राम कुमार, अकबर पदमसी और कृष्ण खन्ना भी थे. दुखद है कि मूर्धन्यता में इधर लगातार कटौती हो रही है.