अभी रज़ा की मृत्यु को दो साल भी पूरे नहीं हुए है कि यह दुखद समाचार मिला कि आधुनिक भारतीय कला के एक और मूर्धन्य और रज़ा के घनिष्ठ मित्र राम कुमार का निधन हो गया. वे कई दिनों से बीमार चल रहे थे. जैसे सारे रंग अब एक नीरंग में मिल गये. राम कुमार की आयु 93 के करीब थी और उन्होंने लगभग सात दशक एकनिष्ठ भाव से अपनी कला को दिये. उन्होंने शुरु में कुछ हिन्दी कहानियां और एकाध उपन्यास भी लिखे थे जिनका उनकी मध्यवर्ग की घूसर उदासी चित्रित करने के लिए नोटिस भी लिया गया था. वे प्रख्यात प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप से जुडे थे और आधुनिक भारतीय कला का कोई भी वृतान्त या विश्लेषण उनके योगदान के हिसाब के बिना पूरा और प्रमाणिक नहीं हो सकता.

एक तरह की अल्पभाष्किता राम कुमार के जीवन और कला का अनिवार्य पक्ष रही. उन्हें एक मूर्धन्य के रूप में दशकों से मान्यता मिली हुई थी पर वे अपने बारे में कुछ विशेष कहने या अपनी कला के लिए कोई दावा करने से हमेशा विरत रहे. शुरू तो उन्होंने आकृतिमूलक चित्रों से किया था जिनमें मध्यवर्गीय विषण्णता के अनेक मर्मचित्र शामिल थे, पर बाद में लगभग छ: दशकों से लैण्डस्केप ही बनाते रहे. उनकी रंग-ज्यामिति धीरे-धीरे विशिष्ट और अद्वितीय होती गयी और राम कुमार के चित्रों की पहचान ही बन गयी. मुझे याद है कि भारत भवन की कलादीर्घा में प्रदर्शित एक चित्र को देखकर दूर से ही तबके उपराष्ट्रपति जस्टिस हिदायतुल्ला ने उसे राम कुमार की कृति के रूप में पहचान लिया था. जैसे राम कुमार अक्सर सभा-गोष्ठी और महफ़िलों में ज़्यादातर चुप ही रहते थे वैसे ही उनकी चित्रों में मुखरता बहुत कम, कभी-कभार, अक्सर चुप्पी ही होती थी. मौन को चित्रित करने में वे अपने मित्र वासुदेव गायतोण्डे के सहचर थे. वे अज्ञेय के भी निकट थे और उनकी एक पंक्ति ‘मौन भी अभिव्यंजना है’ उनपर बहुत लागू होती थी.

राम कुमार के चित्रों को अपनी सम्पूर्णता में शायद मौन की सम्भावना और वैभव का, मौन के अथक परिष्कार का क्षण भी कहा जा सकता है. अद्भुत यह है कि वे मौन गीति-क्षण चित्रित करते हुए मौन को एक तरह का महाकाव्यात्मक आयाम दे देते थे. यह आयाम उनकी गीतपरवता को खण्डित या अतिक्रमित नहीं करता था. उनके यहां किसी तरह की अतिरंजना कभी नहीं आ सकी, अचूक परिष्कार के बावजूद. उनकी कला आधुनिकता के प्रचलित ‘खण्ड खण्ड पाखण्ड पर्व’ के बजाय सम्पूर्णता, लय और निरन्तरता का आग्रह करती थी. इस विशेष संदर्भ में वे रज़ा के साथ एक तरह वैकल्पिक आधुनिकता के वास्तुकार थे.

मैंने अपने जीवन में पहली कला-प्रदर्शनी 1958 में दिल्ली के शिल्पी चक्र में देखी थी जो रामकुमार की एकल प्रदर्शनी थी और जहां उनसे और उनके भाई निर्मल वर्मा से पहली बार भेंट हुई थी. बाद में भोपाल में मध्य प्रदेश कला परिषद् और भारत भवन के दौरान वे हमेशा पूरा सहयोग देते रहे. 1982 में जब भारत भवन का उद्घाटन होने जा रहा था तो जगदीश स्वामीनाथन की मदद करने जो मूर्धन्य आये थे उनमें हुसेन, राम कुमार, अकबर पदमसी और कृष्ण खन्ना भी थे. दुखद है कि मूर्धन्यता में इधर लगातार कटौती हो रही है.