इस संग्रह की शीर्षक कहानी ‘बन्दूक’ का एक अंश : ‘बिना कुछ बोले ही जसोदा ने आंखें घुमाईं. आंखें सुर्ख और सूजी हुईं थीं.

‘तुमने मेरी कीमत लगाई, मुझे इसका दुख नहीं है. हम तो तिरिया जात हैं, हमेसा बिकती आई हैं. तुमने कौन गुनाह किया. दुख इस बात का है कि खरीदने वाले से पता चला कि मैं बिक चुकी हूं. सात फेरी की कुछ तो लाज रख लिए होते. भला ई कौन वेद-बिधान का न्याय है कि जब चाहो तब राखौ और जब चाहो तो किसी और को सौंप दो. आयं...असल चीज है भरोसा, जब वही नहीं रहा तो जीवन क्या और मरना क्या. बराबर है सब. मैंने नौकरी की बात घर बसाने के लिए कही थी, उजाड़ने के लिए नहीं. मुझे तुमसे ऐसी उम्मीद न थी.’ कहते-कहते उसका गला रुंध आया.

‘दर-अ...सल...दर’ गजाधर ने सफाई देनी चाही.

‘चुप रहो, गजाधर. कुछ नहीं सुनना है. खत्म हो गया सब कुछ.’ जसोदा मुश्किल से बोल पाई...

‘अच्छा, चलो, अब तो बता दो क्या फइसला है तुम्हारा’?

‘मेरा फइसला?’

‘हां...हां...तुम्हारा फइसला?’

‘तो सुनो.’...

‘जसोदा ने पहले आंसुओं को पोंछा मारा, ‘मैं तुम दोनों में से किसी के साथ नहीं रहूंगी. जब बिकना ही है तो अपनी कीमत खुद लगाऊंगी. मैं अभी, हां-हां, अभी तुम्हारा घर छोड़ कर जा रही हूं.’ जसोदा खड़ी हो गई.’


कहानी संग्रह : बन्दूक एवं अन्य कहानियां

कहानीकार : राम जन्म पाठक

प्रकाशक : साहित्य भंडार

कीमत : 200 रुपये


स्त्री-पुरुष संबंधों को समझना और जीना जितना कठिन है, उस पर कहानी लिखना भी उससे कम कठिन नहीं है. बहुत बार एक छोटी सी घटना भी संबंधों को नई जटिलता की तरफ ले जाती है. वैसे ही स्त्री-पुरुष संबंधों की कहानी भी बहुत बार उलझावों या जटिलताओं की शिकार हो जाती हैं. राम जन्म पाठक का यह कहानी संग्रह स्त्री-पुरुष संबंधों की पड़ताल की कोशिश में अलग-अलग स्वाद की कई अच्छी और प्रभावी कहानियां हमें देता है.

संग्रह की शीर्षक कहानी ‘बन्दूक’ समाज के सबसे निचले वर्ग की स्त्री के स्वाभिमान की बहुत ही प्रभावी कहानी है. इसे पढ़कर पता चलता है कि स्वाभिमान के साथ जीने के लिए स्त्री का पढ़ा-लिखा और आत्मनिर्भर होना उतना जरूरी नहीं, जितना उसमें अपने आत्मसम्मान के प्रति सजग होने की चाह है. इस कहानी के प्रभावी होने का एक अन्य प्रमाण है फिल्मकार सागर सरहदी द्वारा इस कहानी पर ‘चौसर’ नाम से फिल्म बनाना. पति-पत्नी के संबंधों की व्याख्या करती एक अन्य कहानी ‘थोड़ा हटकर’ वास्तव में अपनी अभिव्यक्ति में काफी हटकर है.

इस कहानी में सिर्फ एक पात्र है और एक तरफा संवाद. इसके बावजूद पूरी कहानी आपसे बात करती मालूम होती है और आप कहीं भी कहानी को बीच में छोड़ने के बारे में नहीं सोचते. पत्नी और प्रेमिका के फर्क के बारे में बात करते हुए राम जन्म यहां एक बहुत मारक बात कह जाते हैं. वे लिखते हैं -

‘हो सकता है मेरी बात आपके काम आए. जानते हैं दुनिया में शराब पीने की सबसे बुरी जगह कहां है. मैं बताता हूं - बीवी के सामने. प्रेमिका के सामने तुम पी सकते हो. दोनों महिलाएं ही हैं, लेकिन जमीन-आसमान का अंतर है. पत्नी के साथ तुम सहमति से बलात्कार करते हो और प्रेमिका के साथ असहमति से संभोग. इतना ज्यादा अंतर होता है...दोनों दो इलाके हैं...असल गलती दोनों की तुलना करना है. वे जहां हैं, उन्हें वहीं रहने दो. अदला-बदली करोगे तो गड़बड़ होगी.’

सरकारी अमला किस तरह से काम करता है, इस किताब में यह दिखाती हुई एक बहुत बेहतरीन कहानी है ‘निरीक्षण’. प्रशासन कैसे किसी मामूली काम को बहुत बड़े मिशन में बदल सकता है या फिर बड़े व जरूरी कामों को कैसे पूरी तरह गैरजरूरी बना के छोड़ देता है, यह बात इस कहानी में बहुत ही रोचक और मारक तरीके से कही गई है. यह कहानी मुख्यमंत्री द्वारा एक साल पहले लगाए गए एक पेड़ के औचक निरीक्षण करने आने के इर्द-गिर्द घूमती है. वह पेड़ बकरी खा चुकी है. इस स्थिति में कैसे पूरे सरकारी महकमें में भयंकर तनाव व अफरातफरी है, वह देखने लायक है. एक बानगी -

‘अच्छा, पौध था किसका? मेरा मतलब आम, महुआ, नीम...क्या?’ डीएम ने माथे पर बल दिया.

‘पता कर लेते हैं, सर. वन विभाग के रिकॉर्ड में होगा.’

‘आधा तो नहीं, पौन घंटे की, ‘कंबिग’ के बाद फाइल मिल गयी, सड़ी-गली हालत में. दिन, तारीख, कर-कमलों के पद, नाम, पेड़ों की प्रजाति, जगह...सब दर्ज थे. सबसे ऊपर मुख्यमंत्री का नाम था. उनके नाम के सामने पौध की प्रजाति का कॉलम था मगर...प्रधान की सांस अटक गयी हो जैसे. पूरी स्याही मिट चुकी थी. शुरू में केवल ‘प’ पढ़ने में आता था. हुई न फजीहत. अब ‘प’ से पीपल भी हो सकता है और पाकड़ भी. और भी कई होंगे...एक बार उन्हें लगा कि ‘व’ है, ‘व’ से वट हो सकता है लेकिन उनके दफ्तर के रिकॉर्ड में बरगद लिखा जाता है. हो सकता है कि ‘ब’ के चक्कर में किसी ने ‘व’ लिख दिया हो. कितने लोग हैं कि ‘व’ का पेट चीरना ही भूल जाते हैं. लिखेंगे ‘व’ पढ़ेंगे ‘ब’.’

धर्म और मजहब को ज्यादातर इंसान जिंदगी के लिए बेहद जरूरी मानते हैं. लेकिन साम्प्रदायिक दंगों के वक्त यही मजहब हमारे जीवन पर तलवार बनकर लटक जाता है. दंगों के समय सालों का भरोसा चंद लम्हों में डगमगाने लगता है. इसी फ्लेवर की एक कहानी है ‘पनाह’. बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के समय हुए दंगों के दौरान मुस्लिम घर में रह रहे एक हिंदू की मानसिक स्थिति का लेखक ने यहां काफी सजीव वर्णन किया है -

‘रज़ाई का कोना पकड़ा ही था कि दरवाज़े पर एक ज़ोरदार ‘थप्प’. हाथ का चाकू और रुका हुआ पेशाब एक साथ छूट गया. लगता है वे लोग आ गए. हे राम-अब क्या करें? चीखे? वह पाता है कि उसका कंठ अवरुद्ध हो गया है. सांस रोककर खड़ा हो गया है...इसके पहले कि वह कुछ हिले-डुले, एक और ‘थप्प’ और साथ में ‘खोलिए’ की कांपती ध्वनि...कौन है यह?...अरे यह तो सलमा भाभी हैं...उसका हाथ क्यों पकड़ रही हैं?...कहां ले जा रही हैं वे? क्या यह भी शामिल हैं उन्हीं में?...वे कुछ संकेत कर रही हैं. क्या? किधर? ओह...तख्त के नीचे छुपाने लाई हैं वह?

‘बन्दूक’ कहानी संग्रह की कुछ कहानियां ठांय से आपके भीतर उतर जाती हैं, लेकिन साथ ही कुछ खाली फायर भी यहां होते दिखते हैं. कहानियों में कोई ज्यादा उलझाव नहीं है, वे खट से अपनी बात कहती हैं और सट से निकल लेती हैं. कुछ ‘हिट एंड रन केस’ की तरह. राम जन्म की शैली में कहीं-कहीं जबरदस्त हास्य है, जैसे – ‘डीएफओ को लगा कि डीएम उनके ऊपर कभी भी थूक सकते हैं. वह थोड़ा आगे की ओर झुक आये, ताकि डीएम थूकें तो थूक बेकार न जाए!’ इस तरह की चुटीली बातों का और ज्यादा प्रयोग करके इन कहानियों को और ज्यादा रसीला और स्वादभरा बनाया जा सकता था. पर यह दुखता है कि लेखक ने अपनी इस विद्या का प्रयोग करने में बहुत कंजूसी की है. इसके बावजूद कहा जा सकता है कि स्त्री-पुरुष संबंधों में झांकने की कोशिश करता यह कहानी संग्रह कई अलग मिजाज की कुछ अच्छी कहानियां पाठकों को देता है.