उन्नाव और कठुआ बलात्कार मामलों पर जनता में दिखे आक्रोश के बाद प्रधानमंत्री का बयान एक राहत की बात कही जा सकती है. उन्होंने कहा है कि इन मामलों में पूरी तरह से न्याय किया जाएगा. प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद यह निश्चित किया जाना चाहिए कि इन मामलों के दोषियों और जिन्होंने न्याय प्रक्रिया में अड़ंगा लगाने की कोशिश की है, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी. किसी वजह से भी अगर यह नहीं हो पाता तो सरकार के ‘बेटी बचाओ’ नारे का खोखलापन साबित हो जाएगा.

कठुआ और उन्नाव बलात्कार मामलों को लेकर जनता में जो आक्रोश दिखा है, वह काफी हद तक 2012 के निर्भया केस के बाद के घटनाक्रम की याद दिलाता है. निर्भया केस के बाद यौन अपराधों से जुड़े कानूनों और न्याय प्रक्रिया में कई अहम बदलाव हुए थे. इससे पूरे देश में बड़ी उम्मीद भी जगी थी, लेकिन पिछले दिनों वह उम्मीद पूरी तरह खत्म होते दिखी है.

उन्नाव मामले में तो पीड़िता के लिए त्रासदी कई गुना बढ़ गई जब उसके पिता की पुलिस हिरासत में मौत हुई और इसके बाद उसके परिवार को अपना गांव छोड़ना पड़ा. इसके साथ ही इस मामले के आरोपित भाजपा विधायक को भी पुलिस तब तक गिरफ्तार नहीं कर पाई तब तक कि उसे इलाहाबाद हाई कोर्ट से झिड़की नहीं मिली और सीबीआई को यह मामला नहीं सौंपा गया.

वहीं कठुआ मामले में जम्मू-कश्मीर क्राइम ब्रांच की जांच में ही अड़ंगा लगाने की कई कोशिशें हुई थीं. यहां हिंदू एकता मंच नाम के एक संगठन और राज्य सरकार में शामिल भाजपा के दो मंत्रियों ने आरोपितों के पक्ष में विरोध प्रदर्शन किया था.

इन दोनों ही मामलों में राजनीतिक दबाव के जरिए जांच को प्रभावित करने की कोशिश की गई है. निर्भया मामले को लेकर जब विरोध प्रदर्शन हुए थे तो संसद में बलात्कार से जुड़े कानूनों में बदलाव के पक्ष में जबर्दस्त सहमति देखी गई थी. अब भी कुछ-कुछ वैसा ही हो रहा है और कई मंत्री बच्चों के साथ बलात्कार के दोषियों को मौत की सजा की मांग कर रहे हैं. हालांकि यह एक खतरनाक कदम हो सकता है क्योंकि इससे बलात्कार करने वाले पीड़ितों की हत्या करने के लिए प्रेरित हो सकते हैं.

भारत में ऐसे बर्बर अपराधों के लिए पहले से कानून मौजूद हैं. फिर भी अगर हम ऐसे अपराधों को रोक पाने में असफल हो रहे हैं तो इसकी वजह कुछ और है. यह वजह है, अपराधों की शिकायत दर्ज होने से लेकर जांच और आरोपितों को दोषी ठहराए जाने तक की प्रक्रिया का लचर होना. फिर इसी से जुड़ी एक दिक्कत राजनीतिक दखलंदाजी की भी है.

इस समय अगर कोई कानूनी बदलाव किया जाता है तो यह नेताओं द्वारा जनता का आक्रोश शांत करने की कवायद ही कही जाएगी. जबकि इस बीच हमारे यहां पुलिस सुधार का काम भी एक दशक से अटका पड़ा है. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट 2006 में निर्देश दे चुका है. इन सुधारों के तहत पुलिस को राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त करना है ताकि नेता पदोन्नति और तबादलों में दखल न दे पाएं, महिलाओं की भरती होनी है ताकि बलात्कार के मामलों की जांच करने वाले विशेष दस्तों में उन्हें शामिल किया जा सके. इसके अलावा गवाहों को सुरक्षा देने की व्यवस्था बनाने और फॉरेंसिक जांच तकनीकों को उन्नत करने की भी जरूरत है.

इसके साथ एक बहुत जरूरी काम है उन जन प्रतिनिधियों की पहचान करना जिनके खिलाफ यौन अपराध दर्ज हैं. इन मामलों की तेजी से सुनवाई करवाने की भी जरूरत है. सिस्टम से ऐसे लोगों का बाहर होना ही इस तरह के तमाम अपराधियों के लिए एक बड़ा संदेश होगा. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) ने 2017 में 4,852 चुनावी हलफनामों के अध्ययन के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार की थी. यह बताती है कि हमारे यहां तीन सांसदों और 48 विधायकों के खिलाफ महिलाओं के खिलाफ अपराध दर्ज हैं. वहीं मान्यता प्राप्त पार्टियों द्वारा ऐसे 334 उम्मीदवारों को टिकट दी गई थी. कुल मिलाकर अगर सच में राजनीतिक पार्टियां कठुआ और उन्नाव मामलों पर कुछ करना चाहती हैं तो पहले उन्हें खुद की शुद्धि करने से शुरुआत करनी चाहिए. (स्रोत)