सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सांसदों की पेंशन और भत्तों के साथ उनके परिजनों को मिलने वाली सुविधाओं को खत्म करने की मांग करने वाली याचिका खारिज कर दी है. वेबसाइट लाइवलॉ के अनुसार जस्टिस जे चेलामेश्वर और जस्टिस संजय किशन की बेंच ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली एनजीओ लोक प्रहरी की याचिका पर यह फैसला सुनाया है. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में पूर्व सांसदों की पेंशन और भत्तों को असंवैधानिक बताने वाली याचिका को खारिज कर दिया था.

रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल मार्च में एनजीओ लोक प्रहरी की इस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार किया था. 82 फीसदी सांसदों को करोड़पति बताते हुए इस याचिका में कहा गया था कि जनता पर पूर्व सांसदों के वेतन-भत्तों का बोझ नहीं डाला जाना चाहिए. शीर्ष अदालत ने इस पर केंद्र और चुनाव आयोग से जवाब मांगा था. इसके अलावा लोक सभा और राज्य सभा के महासचिवों को भी नोटिस जारी किया था. इसी साल सात मार्च को सौंपे अपने जवाब में केंद्र ने पूर्व सांसदों के वेतन-भत्तों को सही ठहराया था. अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा था, ‘सांसदों को पांच-पांच साल पर चुनाव लड़ना पड़ता है. उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्रों के दौरे करने के अलावा यात्राएं भी करनी पड़ती हैं, इसलिए उन्हें मिलने वाली पेंशन उचित है.’

एनजीओ लोक प्रहरी ने अपनी याचिका में सांसदों के वेतन-भत्ते तय करने के लिए स्थायी व्यवस्था बनाने की भी मांग की थी. इस पर अदालत में अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा था कि केंद्र ने सांसदों के वेतन-भत्ते तय करने के लिए स्वतंत्र व्यवस्था बनाने का विचार छोड़ दिया है. हालांकि, उन्होंने अदालत को सांसदों के वेतन-भत्ते संबंधी वित्त विधेयक-2018 के प्रावधानों की जानकारी दी. एक अप्रैल, 2023 से लागू होने वाली इस नई व्यवस्था के तहत सांसदों के वेतन-भत्ते की हरेक पांच साल पर महंगाई के आधार पर समीक्षा की जाएगी.