मध्य प्रदेश के छतरपुर से सागर की तरफ़ जाने वाले रास्ते में जिला मुख्यालय से लगभग 13 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव है खड़गांय. गांव तक जाने के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क याेजना के तहत बनाई गई पक्की सड़क है. लेकिन इस सड़क पर आवाजाही इन दिनों न के बराबर है. वज़ह? गांव की लगभग 70 फ़ीसदी आबादी काम की तलाश में परदेस जा चुकी है. यहां अभी अगर कोई बचा है तो कुछ बुज़ुर्ग, बच्चे और महिलाएं. गांव के अधिकांश घरों में ताले लटके नज़र आते हैं. लोग बताते हैं कि गांव की उप-सरपंच मंजू अहिरवार तक काम की तलाश में पति के साथ दिल्ली चली गई हैं.

जैसे बुंदेलखंड की ज़मीन पर पानी नहीं रुकता, वैसे ही यहां से पलायन नहीं थमता. इसका मौसम आ चुका है. एक तरफ़ खेतों से फ़सलें कटकर बाज़ार में पहुंच रही हैं, खेत सूने हो रहे हैं. दूसरी तरफ़ अपनी जड़ों से कटकर बुंदेलखंड के लोग दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल, जम्मू, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, लेह-लद्दाख़ तक पहुंच रहे हैं और गांव के गांव सूने होते जा रहे हैं. जो बचे उनमें बुज़ुर्ग, महिलाओं और छोटे बच्चों के अलावा सिर्फ वे हैं जिन्हें अपना घर-गांव छोड़ना रास नहीं आता. लेकिन जो जा सकते हैं वे जा चुके हैं, जा रहे हैं या जाने वाले हैं.

खड़गांय के मकानों में लटके ताले और सूनसान गलियां.
खड़गांय के मकानों में लटके ताले और सूनसान गलियां.

खड़गांय की तरफ मुड़ने से पहले बगौता तिराहे पर कुछ लोगों की बातों से इसकी मिसाल मिलती है. इनमें से एक हैं राजापुर-बराज गांव के रामसेवक लोधी. इनका गांव छतरपुर जिले की ही बड़ामलेहरा तहसील के अंतर्गत आता है. सत्याग्रह के सवाल पर वे बताते हैं, ‘आज-कल तौ पूरौ गांवइ खाली हो गओ साब. गांव में 400-500 की आबादी हुइ है. ऊ मैं 40-50 जनैं बचे.’ आप क्यों नहीं गए काम की तलाश में बाहर? ज़वाब में कहते हैं, ‘गए ते साब. एक-दो दफै हमऊं गए ते. पर अच्छो नईं लगो सो भग आए. फिर नईं गए कभऊं. अब इतईं जौन काम मिल जात ओइ सैं खर्चा चला लेत.’ रामसेवक के खुद के संबंधी भी इन दिनों दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में हैं.

यहां इतना काम मिल जाता है कि खर्चा चल जाए? इसका ज़वाब रामसेवक के पास में ही खड़े ललौनी गांव के रामदयाल कुशवाहा देते हैं, ‘काम-वाम कछू नईं मिलत साब. मिलत होतो तौ का कोऊ घर-बार छोड़ कैं परदेस जातो भलां. अब हम औंरन खां नई पुसात (पसंद) सो नईं गए बाहर. सो जौ देख लो जे बैठे ठलुआ (निठल्ला).’ रामदयाल का छोटा बेटा इन दिनाें लद्दाख में है. जो थोड़ी बहुत फसल वग़ैरह हुई है उसे बेचने के बाद बड़ा भी वहीं जाने वाला है.

बगौता गांव के अर्पित सिंह इससे आगे की बात पर ध्यान दिलाते हैं, ‘साब सरकार से जौन काम (मनरेगा के तहत) मिलत, ऊ में दिन भर के 200 रुपइया मिलत. वे भी महीना-दो महीना बाद. और ऊ को भी कौनऊं ठिकानो नइयां. काए से कुल्ल काम तौ मशीनन सें हौन लगो. और मशीनें भी नेता, मंत्री, अफ़सरन कीं चलतीं. इनकी कौनऊं जांच-वांच भी नईं होत. काए सें जांच करबे वारे भी बेइ और मशीन चलवाबे वारे भी. अब आपइ बताऔ गांव के लोगन के लानै काम कां धरो. उनें को पूंछत.’ अर्पित के घर के लोग भी दिल्ली में हैं. वे बताते हैं कि वहां वे लोग 10-12 हजार रुपए महीना तक कमा रहे हैं.

पलायन मज़बूरी या अब आदत?

यूं तो देखने में पहली नज़र में पलायन की यह समस्या मज़बूरी की उपज़ ही ज़्यादा लगती है. लेकिन छतरपुर के कलेक्टर रमेश भंडारी को ऐसा नहीं लगता. सत्याग्रह से बातचीत में वे कहते हैं, ‘बुंदेलखंड में पलायन अब आदत बन चुकी है. दूसरे राज्यों में काम के बदले होने वाली ज़्यादा कमाई इस आदत की वज़ह है. यहां काम करने के बाद उन्हें बमुश्किल पांच-छह हजार रुपए मिलते हैं. दूसरी जगहों पर 10-15 हज़ार रुपए तक कमा लेते हैं. यही फ़र्क उन्हें लद्दाख जैसे सुदूर इलाकों तक भी खींच ले जाता है. जो जितना दूर और मुश्किल भरे इलाके में काम करेगा वह उतना ज़्यादा कमाएगा.’

लेकिन दमोह शहर के वरिष्ठ पत्रकार सुनील गौतम ऐसा नहीं मानते. सत्याग्रह से बातचीत में वे पूछते हैं, ‘अगर किसी को घर के आसपास ही काम मिले तो कोई परदेस क्यों जाएगा? लेकिन चूंकि बुंदेलखंड में ऐसा कुछ है नहीं. तिस पर भ्रष्टाचार ऐसा है कि जो थोड़ी-बहुत बेहतरी की संभावनाएं बनती भी हैं वे भी कुंद पड़ जाती हैं. ऐसे में निराश आम आदमी क्या करे? आख़िर घर तो उसे चलाना ही है. बीवी-बच्चों का भरण-पोषण करना है. सो उसके लिए यही रास्ता रह जाता है.’

गौतम बताते हैं, ‘आप दमोह, सागर, टीकमगढ़ छतरपुर, ललितपुर, झांसी आदि किसी भी रेलवे स्टेशन रात नौ-दस बजे के बाद दो-तीन घंटे बिता लीजिए. ख़ास तौर पर जब दिल्ली जाने वाले ट्रेनें यहां से गुजरती हाें. आप देखेंगे कि किन अमानवीय हालात में यहां के लोग आते-जाते हैं. क्या आदतन किसी एक से दूसरी जगह आने-जाने वाले लोग इस तरह आते-जाते हैं. और ये कथित आदतन आवाजाही या पलायन भी किस पैमाने पर कि गांव के गांव खाली हो जाएं?’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘अभी फसल पूरी तरह से बाज़ार में आई नहीं और 30-40 फ़ीसदी आबादी अपना घर-बार छोड़कर दूसरे राज्यों का रुख़ कर चुकी है. एक महीने बाद यह औसत 60-70 फ़ीसदी तक हो जाने वाला है. तो क्या इसे आदतन कहेंगे? लेकिन अधिकारी इसे इस तरह पेश कर वास्तव में सरकारी विफलताओं को ढकने की कोशिश ही कर रहे हैं.’

पलायन का एक पहलू शोषण से जुड़ता है

छतरपुर के नजदीकी अमरोनिया गांव के ओमप्रकाश अभी 24 साल के हैं. साल-छह महीने की एक छोटी से बच्ची के पिता भी हैं. वह बच्ची अभी उनकी गोद में खेल रही है. लेकिन जल्द ही उसके पिता का साथ उससे छूट जाने वाला है..ओमप्रकाश भी काम की तलाश में दिल्ली जाने वले हैं. और सत्याग्रह के सवाल पर वे खड़ी हिंदी में मार्मिक सा जवाब देते हैं, ‘सर आप ही बताइए, इतनी सी बच्ची को घर में छोड़कर कोई मज़बूरी में परदेस जाएगा या आदत की वज़ह से?’

वहीं किशनगढ़ कस्बे के नज़दीकी कदवारा गांव के एक अधेड़ रामलाल अहिरवार ठेठ बुंदेली में पलायन के एक दूसरे पहलू की तरफ़ भी रोशनी डालते हैं. वे कहते हैं, ‘घर कौ मुखिया बाहरें चलो जात तौ राशन की दुकान वारे राशन तक नई देत.’ फिर घर का खाना-पानी कैसे चलता है? ‘कैसें का. बनियन सें उधारी लेत. महिनन-महिनन. फिर जब मुखिया लौटत तौ वेई कर्जा चुकाउत.’ तो इस बीच का सरकारी राशन कहां जाता है? इकट्‌ठा मिलता है या नहीं? ‘अरे काए खां मिलत. सब वेई (राशन दुकान वाले) खा जात, भड़या (चोर) सबरे. बेंच देत सब बजार में.’

यहां फिर छतरपुर कलेक्टर की बात याद आती है और दिमाग सोचने को मज़बूर होता है कि लोग ऐसी भावनात्मक और शोषण भरी स्थितियों के बावज़ूद आदतन कैसे अपना घर-गांव छोड़कर महीनों के लिए परदेस जा सकते हैं.

सोचने पर मज़बूर करने वाला सवाल एक और भी है

किशनगढ़ कस्बे का बस अड्‌डा. ढलती शाम का वक्त है और युवाओं का एक समूह यहां चाय की एक दुकान पर गप्पें हांक रहा है. इनमें से से अधिकांश आठवीं-दसवीं तक पढ़े हैं. कुछ तो 10-12 साल से काम के लिए दूसरे राज्यों में आ-जा रहे हैं. इसलिए इनका लहज़ा भी ठेठ बुंदेली नहीं रहा, ख़ास तौर पर किसी बाहरी से बात करते वक़्त.

हम उनसे इलाके में होने वाले पलायन की बात करते हैं. पहले तो वे यही जानना चाहते हैं कि यह सब पूछ कौन रहा है और क्यों. अपनी तस्दीक़ से संतुष्ट होने के बाद बातचीत आगे बढ़ती है. उनमें एक दीपक इस पूरे चलन (पलायन के) को एक तरह से ठीक ही ठहराते हैं. उनकी दलील है, ‘सर मुझे देखिए. मेरी उम्र अभी 24 साल है. मैं 12 साल से बाहर कमाई के लिए जा रहा हूं. उसी कमाई के बल पर आज मैंने थोड़ी-बहुत पढ़ाई कर ली है. इससे आज आप जैसे लोगों से बात कर पा रहा हूं. घर वालों को कुछ कमाकर दे पाता हूं. दो पैसे बचा लेता हूं इसलिए बीवी-बच्चों के भले के बारे में थोड़ा-बहुत सोच लेता हूं. क्या यहां रहकर यह सब हो पाता?’

दीपक के साथी ओमप्रकाश 12 साल से काम के लिए जम्मू जा रहे हैं. वे अभी वहां किसी ठेकेदार के मातहत ड्राइवरी करते हैं. ओमप्रकाश कहते हैं, ‘सर एक बात बताइए. क्या पढ़े-लिखे लोग नौकरी करने के लिए अपना घर छोड़कर नहीं जाते? बल्कि वे तो देश छोड़कर तक चले जाते हैं. पंजाब-हरियाणा में तो ऐसे न जाने कितने लोग हैं जो ज़्यादा पैसे कमाने के लिए ही विदेश गए हुए हैं. फिर आप मीडिया वाले उनके जाने को पलायन क्यों नहीं कहते? आपके लिए वह मुद्दा क्यों नहीं होता? ग़रीब और कम पढ़े-लिखे लोग अगर दो पैसे ज़्यादा कमाने के लिए बाहर जाते हैं तो आप उसे पलायन कहते हैं. यह आपके लिए लिखने-पढ़ने का बड़ा मुद्दा हो जाता है. क्यों भला?’