भारत (खासकर उत्तर) में अगर ठंड के महीने वायु प्रदूषण से जूझते और इससे निपटने के रास्ते खोजते हुए बीतते हैं तो गर्मियों में हर आते दिन के साथ मॉनसून का बेसब्री से इंतजार किया जाता है. भारत में गर्मी अभी शुरू ही हुई है, लेकिन देश के कई हिस्सों से जल संकट की खबरें आनी शुरू हो चुकी हैं. इससे सिलसिले में एक बुरी खबर ये है : भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के ताजा आंकड़े दिखाते हैं कि पिछले साल अक्टूबर के बाद बारिश में आई कमी के चलते देश के 640 में से 404 जिलों में शुष्क मौसम की स्थिति है. इनमें से कुल 140 जिलों में अक्टूबर, 2017 से मार्च, 2018 के बीच शुष्कता का स्तर बहुत गंभीर हो चुका है. बचे हुए 109 जिलों में शुष्क मौसम है जबकि 156 में शुष्कता का स्तर कम है.

अब अच्छी खबर की बात करें तो कल मौसम विभाग ने अनुमान जारी किया है कि भारत में यह मॉनसून सामान्य रहेगा और दीर्घावधि औसत (एलपीए) के हिसाब से देश में 97 प्रतिशत बारिश होगी. यह खबर कृषि संकट से जूझ रहे किसानों से लेकर राजनेताओं (इस साल तीन बड़े राज्यों में चुनाव हैं और अगले साल लोक सभा चुनाव हैं) तक, हर किसी के लिए बड़ी राहत बनकर आई है. हालांकि ये अनुमान गलत भी साबित हो सकते हैं क्योंकि आईएमडी इनके लिए पुराने मॉडल का इस्तेमाल करता है. वहीं इसके चलते अगर कुछ हिस्सों में सामान्य से कम बारिश भी हो तो ये आंकड़े छिप सकते हैं.

इसमें कोई दोराय नहीं कि अच्छा मॉनसून इस साल की कुछ दिक्कतों को दूर कर देगा. लेकिन लंबी समयावधि के हिसाब से देखें तो हम फिर भी संकट में ही हैं. सैटेलाइटों की पूर्व-चेतावनी प्रणाली पर आधारित वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टिट्यूट की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत में जलाशय तेजी से कम हो रहे हैं और इसके चलते हमारे यहां भी जल-संकट से जुड़ी ‘जीरो डे’ जैसी स्थिति बन सकती है.

इस साल की शुरुआत से ही दक्षिण अफ्रीका के शहर केप टाउन में जल-संकट को लेकर ‘जीरो डे’ की बड़ी चर्चा है. इस शहर के प्रशासन ने चेतावनी दी है कि पानी की कमी के चलते नौ जुलाई से ज्यादातर घरों और कार्यालयों के नलकों से पानी आना बंद हो जाएगा. इस तारीख को ही यहां जीरो डे कहा जा रहा है. इसके बाद शहर में हर परिवार के लिए पानी के इस्तेमाल का कोटा तय कर दिया जाएगा.

जलाशयों के खत्म होने और भूमिगत जल स्तर गिरने के साथ जल संगृहण की कोशिशें न होने की वजह से भारत में बहुत भयावह आर्थिक और सामाजिक संकट पैदा हो सकता है. इसकी एक झलक गुजरात में नर्मदा नदी से संबंधित दो जलाशयों से जल-वितरण को लेकर पैदा हुए तनाव में भी देखी जा सकती है. पिछले साल कम बारिश होने से इंदिरा सागर बांध में पानी का स्तर काफी नीचे चला गया है. लेकिन जब इसकी भरपाई सरदार सरोवर जलाशय से की गई तो इस पर काफी हो-हल्ला मचा क्योंकि इससे करीब तीन करोड़ लोगों को पीने के पानी की आपूर्ति होती है. वहीं इस वजह से गुजरात सरकार को किसानों से सिंचाई रोकने और आगे फसल की बुवाई न करने के लिए भी कहना पड़ा था.

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में भारत के लिए अब और जरूरी हो गया है कि वह जल-संकट से निपटने के लिए दीर्घावधि की कोई योजना बनाए. इसमें जल-संरक्षण के कामों का विकेंद्रीकरण और भूगर्भीय जल के सामुदायिक प्रबंधन को शामिल किया जाना चाहिए. इस योजना के तहत यह भी कोशिश होनी चाहिए कि कृषि प्रणाली में ऐसे बदलाव लाए जाएं जिससे ज्यादा पानी की जरूरत वाली फसलों के बदले कम पानी की फसलों को वरीयता दी जाए.

इन नई चुनौतियों से निपटने के लिए नए संस्थान और आर्थिक ढांचे की भी जरूरत होगी. केंद्रीय जल आयोग और केंद्रीय भूगर्भ जल बोर्ड को भी भविष्य की तैयारियों के लिहाज से नया रूप देना होगा. वहीं इसके साथ जब पानी के इस्तेमाल पर शुल्क लगाने की बारी आएगी तब सभी राजनीतिक पार्टियों को ख्याल रखना होगा कि इस मुद्दे पर राजनीति न की जाए क्योंकि उस हालत में जल-संकट से बचने की राह मुश्किल होने लगेगी. (स्रोत)