भाषा सिर्फ़ इंसानों के लिए नहीं जानवरों के लिए भी उतनी ही मायने रखती है. यक़ीन न आए तो झारखंड के पलामू बाघ संरक्षित क्षेत्र (पीटीआर) के बेटला राष्ट्रीय उद्यान में जाकर ख़ुद देख लीजिए जहां कर्नाटक से लाए गए तीन हाथियों को इन दिनों हिंदी सिखाई जा रही है. क्योंकि ये हिंदी नहीं समझते. इसीलिए इस भाषा में मिले निर्देश भी नहीं समझ पा रहे हैं.

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक बेटला राष्ट्रीय उद्यान में कर्नाटक से इसी साल मार्च में तीन हाथियों- काल भैरव, सीता और इनके बच्चे मुरुगेशन को लाया गया था. इन्हें अब तक वहां कन्नड़ भाषा में निर्देश दिए जाते थे और उसी को ये समझते हैं. पीटीआर के फील्ड डायरेक्टर एमपी सिंह कहते हैं, ‘हाथी सिर्फ़ स्वर-विज्ञान (फॉनेटिक्स) और हाव-भाव (बॉडी लैंग्वेज) समझते हैं. चूंकि हिंदी और कन्नड़ भाषी लोगों के हाव-भाव और स्वर-विज्ञान दोनों में फ़र्क़ होता है. इसीलिए यहां इन जानवरों काे निर्देश समझने में दिक्कत आ रही है. हिंदी में दिए गए निर्देशों पर ये ठीक से प्रतिक्रिया नहीं देते.’

वे बताते हैं कि फिलहाल इन हाथियों के साथ कुछ समय के लिए दो महावत और एक कावड़ी भी कर्नाटक से आए हैं. इन लोगों के कन्नड़ में दिए गए निर्देश पर ही हाथी सही ढंग से प्रतिक्रिया करते हैं. लेकिन ये लोग यहां अधिक समय तक नहीं रहने वाले. वातावरण के साथ इन जानवरों के घुल-मिल जाने के बाद ये यहां से चले जाएंगे. इसलिए इनके जाने से पहले ही ऐसा इंतज़ाम किया जा रहा है कि ये हाथी कन्नड़ के साथ हिंदी के निर्देश भी समझने लगें. इस काम में कन्नड़ महावतों की ही मदद ली जा रही है. उनसे हाथियों को कन्नड़ के साथ वैसे ही निर्देश हिंदी में भी दिलवाए जा रहे हैं.

सिंह के मुताबिक, ‘पहले हमें लगा था कि हाथियों को नई भाषा से परिचित कराने की प्रक्रिया एकाध महीने में पूरी हो जाएगी. लेकिन अब लगता है कि इसमें कुछ और वक़्त लगेगा. क्योंकि अब पहले हम इन हाथियों के महावतों को हिंदी सिखाते हैं. फिर वे इस भाषा के निर्देशों से हाथियों को परिचित कराते हैं. इसलिए वक़्त लग रहा है.’