केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार लोक सभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना चाहती है और उसके इस विचार को विधि आयोग का भी समर्थन मिला है. आयोग ने इस सिलसिले में संविधान संशोधन का भी मशविरा दिया है.

ख़बरों के मुताबिक आयोग ने इस बाबत सार्वजनिक रूप से श्वेत पत्र जारी किया है. इसमें आयोग की कई संभावित सिफ़ारिशों को शामिल किया गया है. इसका मसौदा संविधान विशेषज्ञों, बुद्धिजीवियों, राजनीतिक दलों, नौकरशाहों, छात्र-छात्राओं आदि विभिन्न वर्गों के बीच वितरित किया जा रहा है. आयोग के अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस बीएस चौहान के मुताबिक इस मसौदे पर सभी वर्गों से आठ मई तक सुझाव मांगे गए हैं. इन सुझावों के आधार पर आयोग आगे चलकर अपनी सिफ़ारिशों को अंतिम रूप देगा.

आयेाग ने साथ ही उन दिक्कतों से निपटने के उपाय भी बताए हैं जिनकी वजह से अक्सर विधानसभाएं या लोक सभा भंग हो जाया करती है. मसलन- सदन में किसी का बहुमत न रहने या फिर सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पारित होने की स्थिति आदि. आयोग के मुताबिक ऐसी स्थिति में अगर मध्यावधि चुनाव होता है तो जो शेष कार्यकाल है सिर्फ़ उतने के लिए ही नए सदन व सरकार का गठन होना चाहिए न कि नए सिरे से पूरे पांच साल के के लिए. इस तरह हर पांच साल बाद लोकसभा-विधानसभाओं के चुनाव का सिलसिला साथ-साथ चलता रहेगा.

आयोग ने इस बार के लिए जो सुझाव दिया है कि उसके मुताबिक 2019 में लोक सभा के साथ उन विधानसभाओं के भी चुनाव हो सकते हैं जिनके कार्यकाल इसके थोड़े-बहुत आगे-पीछे खत्म हो रहे हैं. बाकी सभी विधानसभाओं का कार्यकाल 2024 तक बढ़ाया जा सकता है. फिर उसी समय समय लोक सभा के साथ सबके चुनाव कराए जा सकते हैं.