लोकसभा चुनाव के ठीक पहले भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) और निजी एजेंसी स्काइमेट ने इस साल देश में मॉनसून के सामान्य रहने का अनुमान जताया है. आईएमडी ने हाल में बताया कि इस साल पूरे देश में पिछले 50 सालों के औसत का 97 फीसदी प्रतिशत बारिश होने की उम्मीद है. दूसरी ओर, स्काइमेट का अनुमान है कि जून से सितंबर के बीच सौ फीसदी बारिश हो सकती है. मॉनसून के मौसम में 96 से 104 फीसदी के बीच की बारिश को सामान्य माना जाता है.

इस तरह यह 2014 और 2015 के सूखे के बाद लगातार तीसरा साल होगा जब देश में सामान्य बारिश हो सकती है. जानकारों के अनुसार इस खबर से मोदी सरकार ने निश्चित तौर पर राहत की सांस ली होगी. ऐसा इसलिए कि मॉनसून के बेहतर होने से फसलों का बेहतर उत्पादन होता है जिससे किसानों की आर्थिक दशा थोड़ी सुधर जाती है. इससे ग्रामीण इलाकों में विभिन्न उत्पादों की मांग में भी वृद्धि दर्ज की जाती है जिससे अर्थव्यवस्था की विकास दर तेज हो जाती है. असल में देश की केवल आधी कृषि भूमि के सिंचित होने से किसानों की मॉनसूनी बारिश पर निर्भरता हमेशा बनी रहती है. इसलिए जब बढ़िया बारिश होती है तो न केवल किसानों बल्कि राज्य और केंद्र सरकारों की खेती से जुड़ी चिंताएं भी काफी कम हो जाती हैं.

हालांकि बेहतरीन मॉनसून हमेशा बेहतर खबरें लेकर नहीं आता, कई बार यह परेशानी का सबब भी बन जाता है. यह परेशानियां इस बार भी पैदा हो सकती हैं. इसलिए जानकार मानते हैं कि सरकार को इस साल तनावमुक्त होकर लापरवाह बनने के बजाय इसके बुरे प्रभावों को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है. जानकारों के मुताबिक बेहतर मॉनसून के समय भी कम से कम तीन वजहों से सावधान रहना चाहिए नहीं तो यह सरकार के लिए तोहफा साबित होने के बजाय उसके लिए सिरदर्द भी बन सकता है.

1.सबसे बड़ा खतरा तो ज्यादा बारिश की सूरत में बाढ़ और उससे संपत्ति को पहुंचने वाला नुकसान है. मौसम की भविष्यवाणी करने वाली निजी एजेंसी स्काइमेट की मानें तो इस साल देश में औसत से ज्यादा बारिश की 20 फीसदी संभावना है. ऐसे में न केवल राज्य सरकारों बल्कि केंद्र सरकार को भी अभी से सतर्क हो जाने की जरूरत है. नहीं तो पिछले साल बिहार में जैसी भयंकर बाढ़ और तबाही मची थी, वैसा ही हाल इस बार कई इलाकों में दोहराया जा सकता है.

इसलिए जानकारों की राय है कि सरकारों को अगले दो महीने में बाढ़ की आशंका वाले इलाकों के सभी बांधों-तटबंधों और पुल-पुलियाओं की मरम्मत करा लेनी चाहिए.इसके अलावा अभी से आपदा राहत इकाइयों की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए. इससे न केवल विस्थापन का खतरा कम हो जाएगा बल्कि ऐसा होने पर लोगों को होने वाली परेशानियां भी कम हो जाएंगी. ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है कि जून में ही मानसून के औसत से 11 फीसदी ज्यादा रहने का अनुमान बताया गया है.

स्काइमेट ने वैसे तो इस साल सूखे की आशंका शून्य बताई है, लेकिन उसने कहा है कि देश के दक्षिणी राज्यों सहित कुछ इलाकों में सामान्य से कम बारिश हो सकती है. इसका मतलब यह हुआ कि सरकारों को कुछ इलाकों में सूखे की समस्या से निपटने के लिए भी तैयार रहना चाहिए.

2. दूसरी परेशानी उस अनुभव से जुड़ती है जिसके तहत अच्छी बारिश वाले साल बेहतर उत्पादन के चलते कृषि उत्पादों की कीमतें गिर जाती हैं. देश में भंडारण सुविधाओं और संस्थागत कर्ज की कमी के चलते किसान कृषि उत्पादों को लंबे समय तक नहीं रख पाते और उसे बेच देते हैं. इससे किसानों को लाभ के बजाय ज्यादा नुकसान होता है. जानकारों के अनुसार इस साल भी ऐसा होने की प्रबल आशंका है. इसलिए विशेषज्ञों की सलाह है कि केंद्र और राज्य सरकारें अभी से ऐसी स्थिति से बचने के प्रयास शुरू कर दें.

3. मोदी सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2018-19 का बजट पेश करते हुए ऐलान किया था कि खरीफ फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य उनकी लागत का 150 फीसदी होगा. हालांकि लागत में जमीन का किराए और पूंजी पर देय ब्याज को शामिल नहीं किया जाएगा. फिर भी इससे कई फसलों की मौजूदा कीमतों में खासी वृद्धि के आसार हैं. इसके साथ इस साल ज्यादा उत्पादन की उम्मीद को मिला दें तो इस साल केंद्र के राजकोष पर बड़ा दबाव पैदा होने की आशंका है. फाइनेंशियल एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में भी बताया गया है कि मुख्यत: एमएसपी बढ़ने से इस साल राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून पर 30 हजार करोड़ रुपये ज्यादा खर्च होने का अनुमान है.

कुल मिलाकर चुनावों से पहले बेहतर मॉनसून का अनुमान केंद्र सरकार के लिए राहत भरा है. लेकिन यह भी साफ है कि इस अच्छी खबर से पैदा हो सकने वाली परेशानियों के लिए भी उसे अग्रिम तैयारी करनी होगी.