कांग्रेस के नेतृत्व में छह अन्य विपक्षी पार्टियों ने देश के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का ऐलान किया है. इन पार्टियों में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी), सीपीएम, सीपीआई और मुस्लिम लीग शामिल हैं. इन पार्टियों ने राज्य सभा के पदेन सभापति- उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लाने का नोटिस दिया है. भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में यह पहली बार है जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए नोटिस दिया गया है.

इस बारे में विपक्षी पार्टियों द्वारा जारी प्रेस रिलीज में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए हैं. साथ ही, इसमें बीती 12 जनवरी की घटना का भी उल्लेख किया गया है. उस वक्त चार वरिष्ठम न्यायाधीशों-न्यायाधीश जे चेलमेश्वर, न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायाधीश एमबी लोकुर और न्यायाधीश कुरियन जोसेफ ने शीर्ष न्यायालय के कामकाज को लेकर अपना असंतोष जगजाहिर किया था.

इस प्रेस रिलीज के मुताबिक विपक्षी पार्टियों को उम्मीद थी कि मुख्य न्यायाधीश इस असंतोष को दूर करने की कोशिश करेंगे. लेकिन, तीन महीने से अधिक वक्त बीतने के बाद भी कुछ नहीं बदला है. मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव में ‘मेडिकल कॉलेज घूसखोरी’ और सीबीआई जज बीएच लोया के मामले का विशेष तौर पर उल्लेख किया गया है. मेडिकल कॉलेज घूसखोरी में खुद मुख्य न्यायाधीश पर आरोप लगे हैं और वे खुद इसकी सुनवाई भी कर रहे हैं. दूसरी ओर, बीते गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने ही जज लोया की मौत को प्राकृतिक बताते हुए इसकी स्वतंत्र जांच करने की मांग को खारिज कर दिया है. इस मामले में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह आरोपित थे.

न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया

भारतीय संविधान में महाभियोग शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है. हालांकि, उसके अनुच्छेद- 124 (4) के तहत संसद की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा कदाचार और अक्षमता का आरोप साबित होने पर न्यायाधीश को पद से हटाने की प्रक्रिया का उल्लेख है. इसमें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भी शामिल किया गया है. हाई कोर्ट के किसी न्यायधीश को भी इसी प्रक्रिया द्वारा हटाने की बात (अनुच्छेद-217-बी) कही गई है.

न्यायाधीश को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया का विशेष उल्लेख न्यायाधीश जांच अधिनियम –1968 में किया गया है.

सांसदों की सहमति

न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया शुरू करने के लिए इससे संबंधित प्रस्ताव पर राज्य सभा के कम से कम 50 और लोक सभा के 100 सांसदों की सहमति जरूरी है. ताजा मामले में कांग्रेस ने राज्य सभा के 71 सांसदों की सहमति की बात कही है. हालांकि, इनमें से सात का कार्यकाल पूरा हो चुका है. इसके बाद भी तय से ज्यादा सांसदों की संख्या को देखते हुए सदन के सभापति द्वारा इससे जुड़ी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना तय माना जा रहा है.

जांच समिति

महाभियोग प्रस्ताव पर सभापति (राज्य सभा) या अध्यक्ष (लोक सभा) द्वारा मंजूर किए जाने के बाद संबंधित न्यायाधीश पर लगे आरोपों की जांच के लिए एक जांच समिति गठित की जाती है. इसमें सदस्य के तौर पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या अन्य न्यायाधीश, किसी हाई कोर्ट के न्यायाधीश और न्यायिक मामलों के एक प्रतिष्ठित जानकार को शामिल किया जाता है. चूंकि, इस मामले में आरोपित सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ही हैं, इसलिए पहले सदस्य के तौर पर शीर्ष अदालत के किसी अन्य न्यायाधीश को समिति में शामिल किया जाना तय है. यह जांच समिति आरोपित न्यायाधीश को तय वक्त में अपना पक्ष लिखित रूप से सामने रखने देने का मौका देगी.

इस अधिनियम के मुताबिक यदि इस प्रस्ताव का नोटिस दोनों सदनों को एक साथ दिया जाए तो कोई जांच समिति तब तक गठित नहीं की जाएगी जब तक दोनों द्वारा इसे मंजूर न कर लिया जाए. इसके अलावा ऐसी स्थिति में राज्य सभा सभापति और लोक सभा अध्यक्ष द्वारा संयुक्त रूप से समिति गठित की जाएगी. जांच समिति अपनी रिपोर्ट तैयार कर सभापति या अध्यक्ष या संयुक्त रूप से गठित होने की स्थिति में दोनों को एक साथ सौंपेगी. इसके बाद इसे जल्द से जल्द संसद के सामने रखा जाएगा.

जांच समिति की रिपोर्ट पर संसदीय कार्यवाही

जांच समिति की रिपोर्ट में आरोपित न्यायाधीश को किसी कदाचार का दोषी या पद के लिए असमर्थ नहीं पाए जाने पर इस मामले को खारिज कर दिए जाने का प्रावधान है. दूसरी ओर, समिति द्वारा दोषी पाए जाने पर इस प्रस्ताव को दोनों सदनों में मतदान के लिए रखा जाता है. इसे राज्य सभा और लोक सभा में कुल सदस्यों के बहुमत और मतदान में हिस्सा लेने वाले सांसदों के दो-तिहाई वोट (विशेष बहुमत) से पारित किए जाने के बाद राष्ट्रपति के पास उनकी मंजूरी के लिए भेजा जाता है. राष्ट्रपति द्वारा पारित प्रस्ताव पर मुहर लगाने के बाद दोषी न्यायाधीश को अपना पद छोड़ना पड़ता है. दूसरी ओर, सदनों में इस प्रस्ताव को विशेष बहुमत न मिलने पर इसे खारिज माना जाता है.

न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग का इतिहास

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लाए जाने से पहले अब तक सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश के लिए इसे नहीं लाया गया था. देश के न्यायिक इतिहास में महाभियोग का सामना करने वाले पहले न्यायाधीश वी रामास्वामी थे. साल 1993 में उनके खिलाफ लाया गया यह प्रस्ताव लोक सभा में कांग्रेस के मतदान से अलग होने की वजह से जरूरी विशेष बहुमत हासिल नहीं कर पाया. न्यायाधीश वी रामास्वामी पर पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए भ्रष्टाचार में शामिल होने का आरोप था.

इसके बाद साल 2011 में सिक्किम हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पीडी दिनाकरण के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था. उन पर भूमि अधिग्रहण को लेकर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया था. न्यायाधीश पीडी दिनाकरण ने अपने खिलाफ लाए गए प्रस्ताव पर राज्य सभा द्वारा जांच समिति गठित किए जाने के बाद पद से इस्तीफा दे दिया. इसके साथ ही उसी साल कलकत्ता हाई कोर्ट के न्यायाधीश सौमित्र सेन को भी इस प्रस्ताव का सामना करना पड़ा. उन पर वित्तीय भ्रष्टाचार का आरोप लगा था. इसकी जांच के लिए गठित समिति ने उनके खिलाफ आरोप को सही पाया. इसके बाद राज्य सभा ने दो-तिहाई वोट से न्यायाधीश सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को पारित कर दिया. लेकिन, लोक सभा में मतदान से पहले ही उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था.

इसके करीब चार साल बाद 2015 में गुजरात हाई कोर्ट के न्यायाधीश जेबी पर्दीवाला के खिलाफ राज्य सभा सांसदों द्वारा यह प्रस्ताव लाया गया था. उन पर हार्दिक पटेल के खिलाफ मामले की सुनवाई के दौरान आरक्षण पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगाया गया था. हालांकि, राज्य सभा के सभापति को महाभियोग का नोटिस दिए जाने के बाद उन्होंने अपनी टिप्पणी वापस ले ली थी.