हम यही मानते हैं कि डॉक्टरों का काम सिर्फ बीमारी का ठीक से इलाज करना है. मुश्किल यह है कि डॉक्टर भी लगभग यही मान बैठते हैं. जबकि एक जिम्मेदार हेल्थ केयर सिस्टम का काम मूलतः बीमारी को रोकने या उसे इतनी जल्दी से जल्दी पकड़ने का है कि उसका प्रभावी इलाज संभव हो सके. हमारे देश में यूं भी डॉक्टर कम हैं और बीमारों की ही इतनी सारी मारामारी है कि डाक्टरों को और कुछ फुर्सत ही नहीं बचती कि वे इस ‘थैंकलेस’ काम में अपना ‘बहुमूल्य’ समय ‘नष्ट’ करें.

इधर आम जनता भी यह मानती है कि कभी तबीयत खराब होने पर ही डॉक्टर के पास जाया जाता है. हमें कोई बीमारी हो ही न सके, इसकी भी कुछ जांचें होती हैं - ऐसी कोई समझ आमतौर पर जनता के बीच नहीं है. भले ही ऐसी किसी भी तरह की जांच को पाप न भी माना जाता हो लेकिन हमारे यहां इसे फालतू खर्चा करने की बेवकूफी जरूर माना जाता है. अगर आप भी ऐसा मानते हैं, तो यह ठीक सोच नहीं है.

इस तरह की जांचों को प्रिवेंटिव हेल्थ चेकअप कहा जाता है और अपने आप में ये भी बहुत जरूरी हैं. मान लें कि आप अपनी समझ से एकदम स्वस्थ और ठीक हैं. आपको कोई तकलीफ नहीं होती. फिर भी आपको समय-समय पर डॉक्टर की सलाह तथा कुछ बुनियादी जांचें नियमित अंतराल पर करानी चाहिए, जिससे आपकी बीमारियां एकदम शुरुआत में ही पकड़ में आ सकें और उनका सटीक इलाज हो सके. मैं आज आपको समझाने की कोशिश करूंगा कि ऐसी प्रिवेंटिव स्क्रीनिंग चेकअप और इससे जुड़ी जांचें किस तरह आपको कई गंभीर बीमारियों से समय रहते बचा सकती हैं.

प्रिवेंटिव हेल्थ चेकअप तथा स्क्रीनिंग के अंतर्गत इस तरह की जांचें होती हैं :

(1) डॉक्टर द्वारा आपका पूरा क्लीनिकल चेकअप (बीपी से लेकर अन्य सारा फिजिकल चेकअप)

(2) रक्त की बायोकेमिकल जांचें (हीमोग्लोबिन, शुगर, कोलेस्ट्रॉल आदि के अलावा वे सारी जांचें भी जो डॉक्टर ने बताई हों)

(3) एक्स रे आदि की जांचें (छाती का एक्स रे, स्तन की मैमोग्राफी, हड्डियों की डेंसियोमेटरी, पेट और दिल की सोनोग्राफी की जांचें आदि)

(4) स्त्रियों में वेजाइना से लिये सेंपल की नियमित ‘पैप स्मियर’ की जांच.

(5) चुनिंदा केसों में अन्य जांचें (टीएमटी, ईको कार्डियोग्राफी और कोलोनोस्कोपी आदि)

(6) इनके अलावा अब एक नई तथा बहुत बड़ी आशा की दिशा ‘जेटेनिट टेस्टिंग’ की तरफ खुल रही है. आपके जीन्स के पैटर्न की गहन जांच द्वारा अब यह बताया जा सकेगा कि आज से सालों बाद भी आपको क्या-क्या बीमारियों की आशंका हो सकती है.

इस संदर्भ में कुछ लोगों ने सारे शरीर की (होल बॉडी) सीटी स्कैन द्वारा जांच का सुझाव भी दे रखा है, जिसे आज तक कोई मान्यता नहीं मिली है. वैसे इसके नुकसान ही हैं.

तो हम इनमें से कौन सी जांचें कब-कब करायें ?

मैं एक अच्छा काम आजकल यह देख रहा हूं कि लोग खुद ही किसी पैकेज डील द्वारा अपनी बहुत सी खून की जांचें करवा के आ जाते हैं और डॉक्टर से पूछते हैं कि इनमें सब ठीक है कि नहीं? यह का अच्छा तो है पर अधूरा है.

आप इस तरह उल्टा न चलें. सबसे पहले तो अपने डॉक्टर से पूरा क्लीनिकल चेकअप करायें. क्योंकि ऐसे चेकअप से ही तो तय होगा कि आपको कौन-सी जांचें कराना उचित होगा. ऐसे में आप पैकेज की अन्य फालतू जांचों से भी बच जाएंगे और जरूरी जांचें छूटेगी भी नहीं.

हर प्रिवेंटिव जांच को हम मेडिकली तभी मान्यता देते हैं जब वह जांच इन कसौटियों पर खरी उतरे :

(1) जांच कितनी सटीकता से बीमारी की संभावना को पकड़ने के काबिल है (जांच की सेंसिटिविटी और स्पेसिफिसिटी.)

(2) जांच कितनी मंहगी है? क्या इसकी कीमत और बहुसंख्य जनता में इसके टेस्ट से लाभ के बीच कोई तारतम्य भी बैठता है? कहीं यह घोड़े से ज्यादा कीमत उसकी जीन खरीदने में लगाने का मामला तो नहीं है?

(3) क्या जिस बीमारी को इस टेस्ट द्वारा पकड़ लिया जायेगा उसके समय रहते इलाज द्वारा उस मरीज की आयु बढ़ सकेगी? और जो बढ़ी भी तो क्या वह इतनी ज्यादा होगी कि टेस्ट पर इतना समय और पैसा लगाया जाये? इस बात को कुछ उदाहरणों से समझते हैं :

प्रोस्टेट कैंसर के लिए एक बहुत ही कॉमन टेस्ट है – पीएसए. अगर यह पॉजिटिव निकले और इसके बाद प्रोस्टेट कैंसर का ऑपरेशन करा लें तो भी जिंदगी उतनी ही लंबी रहती है जो वैसे बाद में डायग्नोस्टिक होने पर रहती. फिर यह टेस्ट कई बार फॉल्स पॉजिटिव भी हो सकता है. तब तो हमने फालतू ही सर्जरी करवाई और उसके बाद होने वाली इरेक्टाइल डिस्फंक्शन आदि जटिलताओं को एक गलत टेस्ट रिजल्ट के कारण आमंत्रित कर डाला. इस लिहाज से देखें तो पीएसए टेस्ट से प्रोस्टेट कैंसर के मरीज को कुछ भी लाभ उस तरह से नहीं मिलने वाला.

स्तन कैंसर के लिए की जाने वाली मैमोग्राफी की उपयोगिता पर भी बार-बार प्रश्न उठते हैं. ऐसा मानें कि आंकड़े बताते हैं कि नियमित मैमोग्राफी से मात्र दस या इससे भी कम ही जानें बचती हैं. वहीं इसके बरक्स, बड़ी आंत के कैंसर के स्क्रीनिंग टेस्ट (मल में खून की जांच, कोलोनोस्कोपी, सिग्मोयडोस्कोपी) बड़े काम की प्रिवेंटिव जांच हैं. इससे कोलोनिक कैंसर की बीमारी का पता पहले ही चल जाता है और लगभग तीस प्रतिशत मरीज बचाये जा सकते हैं क्योंकि इसका शुरुआती सटीक इलाज उपलब्ध है.

एक बड़ी साधारण सी जांच पैप स्मियर होती है. यह सस्ती और सर्वत्र उपलब्ध छोटी सी जांच है. इसके द्वारा सरवाइकल कैंसर का पता शुरुआत में ही करके संबंधित स्त्री की उम्र में पच्चीस वर्ष जोड़े जा सकते हैं. हमें ऐसी ही प्रभावी स्क्रीनिंग जांचों की आवश्यकता है जो सस्ती हों और सटीक भी.

ऐसे ही डायबिटीज, हाइपरटेंशन, हाई कोलेस्ट्रॉल, तंबाकू तथा शराब का आदी होना और एकदम आलसी का जीवन जीने की आदत भी बड़ी बीमारियां हैं. इन सबको सामान्य स्क्रीनिंग जांचों या प्रिवेंटिव हेल्थ चेकअप द्वारा अगर पहले ही पकड़ लिया जाये तो आपकी उम्र में कई सार्थक वर्ष जोड़े जा सकते हैं.

हम आगे इनकी विस्तार से चर्चा करेंगे. इस स्तंभ की अगली किस्त में हम अलग-अलग उम्र में की जाने वाली, सहज उपलब्ध, सीधी, सरल और सस्ती स्क्रीनिंग जांचों के बारे में भी आप को बताएंगे.