‘साब पानी रोकबे कौ इंतजाम हो जाए तो सूखे खेत हरे हो जै हैं. फसल कटबे के बाद जौन लोगें खाली बैठ जात उनें अपने खेतनईं में फिर सें काम मिल जै है. फिर कोउ काए खां घर-बार छोड़ कें बाहर जै है काम तलासबे.’

दो-तीन वाक्यों में बुंदेलखंड के पानी और पलायन की समस्या का यह हल सूरजपुरा गांव के बुज़ुर्ग किसान संतोष पांडे बताते हैं. दमोह से गढ़ाकोटा होते हुए सागर जाते वक़्त बीच रास्ते में यह गांव पड़ता है. गढ़ाकोटा से एक-डेढ़ किलोमीटर पहले बाएं हाथ पर एक रास्ता सूरजपुरा के लिए अंदर जाता है. लगभग चार किलोमीटर की सड़क खासी ऊबड़-खाबड़ है. इस पर सफर करते वक़्त आपको यह अहसास भी नहीं होगा कि जिस गांव का आपने रुख़ किया है वह बुंदेलखंड के दूसरे गांवों से कुछ अलग होगा. लेकिन गांव पहुंचते ही यह धारणा बदलने लगती है.

बुंदेलखंड के दूसरे तमाम गांवों-कस्बों-शहरों में जहां अभी वक़्त-बेवक्त बूंद-बूंद के लिए संघर्ष देखने मिल रहा है वहीं रेहली ब्लॉक के इस गांव में पीने के पानी की कोई कमी नहीं है. क़रीब 500-600 लोगों की आबादी है और पांच-छह हैंडपंप. सभी भरपूर पानी दे रहे हैं. गांव के एक पढ़े-लिखे युवा अमित तिवारी सत्याग्रह से बातचीत के दौरान बताते हैं, ‘इस मौसम में भी हमारे यहां 100-150 फीट की खुदाई पर पानी निकल आता है. हमारे यहां ये हाल है कि करीब दो किलोमीटर दूर के पठरिया गांव के लोग भी पीने का पानी यहीं से ले जाते हैं क्योंकि उनके यहां हैंडपंप सूख गए हैं.’

यह सब कैसे हो पाया? इसका ज़वाब अमित के भाई दीपक देते हैं, ‘सर, हम लोगों ने अपने-खेतों में छोटे-छोटे तलैयानुमा ढांचे बना लिए हैं. इनमें बारिश का पानी इकट्‌ठा हो जाता है. इससे एक बड़ा फायदा ये हुआ है कि जमीन के नीचे के पानी का स्तर अब बहुत नीचे नहीं जाता और पीने के पानी की दिक्कत नहीं होती. दूसरा फायदा ये होता है कि हमें रबी की फसल (जो अक्टूबर-नवंबर में बोई और मार्च-अप्रैल में काटी जाती है) के लिए ख़ासकर एक-दाे सिंचाई का पानी मिल जाता है. लेकिन सर, इसके बाद की फसल के लिए हमें अब भी मानसून के ही भरोसे रहना पड़ता है.’

सरकारी रवैये पर सवाल

आगे कुछ बताने में अब दीपक की झिझक साफ दिखती है. लिहाज़ा इसके आगे और पीछे की भी कहानी एक दूसरे युवा संतोष आगे बढ़ाते हैं, ‘अरे हम बताइत साब, काए कोऊ के डर परे का. हम औरन ने सरकारी नदी-घाटी योजना में अपने खेतन में तलइयां बनवाईं तीं. अफसरन ने हमसें कई कै हमें 40-40 हजार की दो किस्त में पैसा दए जै हैं, तुम औरें अबै अपनी जेब सें लगवा लो. हम में सें गांव के 12-15 बड़े किसानन ने लगा भी दए, पै सरकार सें हमें अबै तक पूरे पैसा नईं मिले. कोऊ खां 10 तौ कोऊ यै 20 हजार मिले औ जै राम जी की.’

संतोष बात आगे बढ़ाते हैं. बताते हैं कि उन्होंने जो तलैया बनाई थीं उन्हें गहरा करने की जरूरत थी नहीं तो उनमें मिट्टी भर जाती. पर कौन करवाता? वे कहते हैं, ‘हमने अपनी जेब सें पैसा लगा दए. सरकार ने पूरे पैसा दए नइयां. फसल जित्ती भओ चइए उत्ती हो नईं रई. जौन भइ ऊके दाम ठीक मिल हैं ई को कौनऊं ठेकानौ नइयां.’ संतोष आगे बताते हैं कि अधिकारियों से बात करो तो वे कहते हैं कि वाटर शेड योजना के तहत दूसरी तलैया बना लो तो उसमें पैसा मिल जाएगा. वे कहते हैं, ‘अब आपइ बताओ को फिर सें जोखिम लै है. और फिर हमाए जैसे कछू जनन की तौ 20-24 एकड़ की खेती है. पै जी के पास एकइ-दो एकड़ खेत हैं बे अगर दो जगां तलैया खुदवा लै हैं तो खेती काए में कर हैं?’

और अगर वाटर शेड योजना के तहत किसान अपने खेत में तलैया बनाने के लिए राजी हो भी जाएं तो एक और मुसीबत है. संतोष बताते हैं कि सरकारी कर्मचारी जहां खुदाई करते हैं मिट्टी वहीं चारों तरफ डाल देते हैं. वे कहते हैं, ‘अब हम औंरन नें उनसे कई, के भइया माटी खेत की मेंड़न में डरवा दो नईं तौ बरसात में पूरी माटी तलइन में भर जानें, पूरौ पैसा पानी में चलो जै है. किसान खां भी कछू फायदा न मिल है. पै सुनत को है? बे कात कै ट्रैक्‍टर सें माटी ढुबा कें खेत की मेंडन में डरवाने, तौ ढुबाई के पैसा बौ देबै जे के खेत में तलइया खुद रई. अब बताऔ मरन तौ सब तरफ सें किसानन की भई न?’

सरकारी रवैये का नतीज़ा

संतोष जो समस्याएं बताते हैं वे गांव पर किस तरह असर दिखा रहीं हैं इसके बारे में पुष्पेंद्र, चतुर्भुज और उमेश अठ्या की बातों पर ग़़ौर कीजिए. ये तीनों युवा 10वीं कक्षा तक पढ़े हैं. सत्याग्रह से बातचीत में वे बताते हैं कि जब गांव के खेतों में ये ताल-तलैया बनवाने की मुहिम शुरू हुई थी तो एकाध साल वे काम की तलाश में बाहर नहीं गए. उन्हें लगा था कि शायद अब यहीं खेतों में ही काम मिल जाएगा. लेकिन अब जो हालात हैं उनके चलते वे फिर दिल्ली का रुख़ कर रहे हैं. यही नहीं इनकी मानें तो गांव की 30-40 फ़ीसदी आबादी, जिनमें ज़्यादातर युवा हैं, काम के लिए अब भी दूसरे बड़े शहरों के ही भरोसे है. जबकि बीच में कुछ समय के लिए गांव में यह चलन थोड़ा सही, पर रुकता दिखा था.

सूरजपुरा जैसा ही हाल दूसरे गांवों का भी है

सूरजपुरा की कहानी कोई अकेली नहीं है. टीकमगढ़ से जतारा की तरफ जिला मुख्यालय से क़रीब 40-45 किलोमीटर दूर एक गांव पड़ता है नादिया. यहां परमार्थ समाजसेवी संस्थान ने लोगों को बारिश का पानी सहेजने के लिए जागरूक किया है. सामाजिक कार्यकर्ता रमाकांत राणा बताते हैं, ‘हमने अपने अभियान के तहत पहले एक-दो जगहों पर कुएं के करीब रीचार्ज स्ट्रक्चर बनाए. उससे उन कुओं में पानी का स्तर बेहतर हुआ. इसे देखकर गांव वाले उत्साहित हुए और उन्होंने अब तक कुओं-हैंडपंपों आदि के पास लगभग 25 जगहों पर वैसे ही रिचार्ज स्ट्रक्चर बना डाले हैं. इसका नतीज़ा ये हुआ कि आज लगभग 1,500 की आबादी वाले इस गांव में 18 में से लगभग 12 हैंडपंप चालू हैं.’

लेकिन खेती के लिए पानी? इसका ज़वाब उपसरपंच रूप सिंह यादव देते हैं, ‘फसल के लानें पानी तौ नइयां साब. खेतन में तलइयां बनीं हैं पर पानी कम गिरो ई सैं सब सूखी डरीं. हां पै जी के खेतन में पुराने कुआं बने हैं बे लोगें जरूर गर्मियन की फसल लै रए. बाकी तौ सब जनें बरसात के इ भरोसे हैं.’ आपके गांव से भी लोग काम की तलाश में बाहर जाते हैं? इस पर भी रूप सिंह का ज़वाब ‘हां’ में है. वे कहते हैं, ‘अब का करें साब. सरकार सें जादा कौनऊं मदद मिलत नईंआं. तौ आदमी का कर है. कमाने-खाने तो है ई. ई सें बाहरइ चले जात. दो पैसा कमा ल्याउत.’ गांव से लगभग कितने लोग काम के लिए बाहर जाते हैं? ‘हर घर सें दो आदमी तो चलेइ जात’, रूप सिंह ज़वाब देते हैं.

यही हाल छतरपुर जिले के किशनगढ़ कस्बे के नज़दीकी फुरताल पटना गांव के हैं. यहां और इसके नज़दीकी कुछ गांवों में कोका-कोला इंडिया फाउंडेशन के सहयोग से हरीतिका नाम का स्वयंसेवी संगठन पांच-छह साल से जलसंरक्षण की कुछ परियोजनाएं चला रहा है. इसके तहत स्‍टॉप डैम बनवाए गए. बोर कराए गए. खेतों में छोटी तलइयां खुदवाई गईं. किसान लगातार बेहतर फसल ले सकें, इसके लिए अन्य मदद भी दी जा रही है.

लेकिन गांव के निवासियों- उत्‍तम, रामादीन और गोविंद से हुई सत्याग्रह की बातचीत का लब्बोलुआब यह है कि किसानों को मदद देने के एवज़ सबकी अपनी शर्तें होती हैं. सरकार से मदद चाहिए तो उसकी शर्तें अलग और कंपनी (कोको कोला) से मदद लेनी है तो उसकी अलग. अक़्सर ही ये शर्तें कई छोटे-मंझोले किसान पूरी नहीं कर पाते. यही वज़ह है कि इन गांवों की भी 30-40 फ़ीसदी आबादी काम की तलाश में बाहर जा ही रही है.

यानी कुल मिलाकर स्‍थित‍ि यह है क‍ि बदलाव के चंद बेहतर प्रयास भी सरकारी उपेक्षा और भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था से जूझते नज़र आते हैं. इसलिए इन प्रयासों के नतीज़े भी अब तक अपेक्षाओं से कम ही सामने आ रहे हैं.