वरिष्ठ पत्रकार रिपब्लिक न्यूज़ चैनल के संपादक अर्णब गोस्वामी की एक कथित चिट्ठी इन दिनों सोशल मीडिया पर काफ़ी शेयर की जा रही है. दावा किया जा रहा है कि यह चिट्ठी उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम लिखी है. इसके बहाने उन्होंने मोदी विरोधियों पर तंज़ किया है. चिट्ठी अंग्रेज़ी में लिखी गई है. हमने उसका अनुवाद भी किया है ताकि ज़्यादा से ज़्यादा पाठक समझ सकें कि इस चिट्ठी में क्या कहा गया है.

प्रिय प्रधानमंत्री जी,

हम इस लायक़ नहीं हैं कि हमें आप जैसा व्यक्ति (नेता) मिले. देश में अधिकतर लोग आपके काम को महत्व नहीं दे रहे हैं. आप रोज़ 16 घंटे काम करते हैं... इस देश के लोगों की बेहतरी के लिए अपने आराम का बलिदान करते हैं. लेकिन इसके लिए आपको कभी भी प्रशंसा नहीं मिलेगी. आपको अभी भी बेकार के मुद्दों के लिए दोष दिया जाएगा. ये लोग 60 साल तक देश को एक परिवार के हवाले कर सकते हैं लेकिन आपको शांति से पांच साल काम करने नहीं दे सकते. इसकी वजह यह है कि यह देश फ़र्ज़ी बुद्धिजीवियों, भूखे और आलसी लोगों से भरा पड़ा है. वे अपने चार सदस्यों का परिवार नहीं चला सकते, लेकिन आपको यह सलाह ज़रूर देंगे कि यह देश कैसे चलाना चाहिए. वाह!

लोग आपसे बदला लेने के लिए मरे जा रहे हैं, जैसे इस देश का प्रधानमंत्री बन कर आपने दुनिया का सबसे भयावह अपराध कर दिया हो. बिहार (चुनाव) के नतीजे देखिए, वहां लोगों ने 8वीं, 9वीं और 12वीं पास/फ़ेल उम्मीदवारों को जिताया है, लेकिन उन्हें नहीं जिनका नेतृत्व आप करते हैं. क्यों? मैंने लोगों को यह कहते सुना है कि अगर आज चुनाव हों तो मोदी हार जाएंगे... क्यों? अपने प्रिय देश के लिए आप इतनी मेहनत कर रहे हैं यह जानते हुए भी आप जैसे क़द का व्यक्ति कैसे ये सब सुन सकता है! वे लोग यह मानने को तैयार नहीं हैं कि हमारा देश अपने आप समर्थ हो रहा है... हर तरह से प्रगति कर रहा है. लेकिन नहीं. वे यह नहीं चाहते. वे तो बस एक रुपये किलो तुअर की दाल और मुफ़्त के प्याज़ चाहते हैं. इस देश के लोगों को भ्रष्टाचार की आदत पड़ गई है और वे इस बात को हज़म नहीं कर पा रहे कि देश धीरे-धीरे सकारात्मक बदलाव से गुज़र रहा है.

यह बात पक्की है और इससे मैं निराश भी हूं कि 2019 में हम आपको (प्रधानमंत्री के रूप में) नहीं देख पाएंगे. क्योंकि लोग देश चलाने के लिए किसी पप्पू जी (राहुल गांधी) को चुन लेंगे. लोग उस व्यक्ति के ग़ुलाम तक बन सकते हैं जो उन्हें मुफ़्त में दाल-चावल और आलू खिलाए. यह हम इतिहास से जान सकते हैं. बदलना कोई नहीं चाहता, लेकिन बदलाव हर किसी को चाहिए. लोगों ने 3जी पैकेज के साथ स्मार्टफ़ोन लिए हुए हैं और कथित रूप से बढ़ती महंगाई की बात करते हैं. क्या मज़ाक़ है! 3जी प्लान के लिए 297 रुपये का रीचार्ज कराएंगे, लेकिन तुअर की दाल के दाम बढ़ने से वे परेशान हो जाते हैं. हद है!

सर, आप दुनिया के दस सबसे ताक़तवर लोगों में शामिल हैं. लेकिन उन्हें इससे कोई मतलब नहीं. ज़्यादातर लोग अंधे और बहरे हैं. (लेकिन) आप इस उम्र में आराम करें और जीवन का आनंद लें. आपके परिश्रम, प्रतिबद्धता और समर्पण का यहां कोई महत्व नहीं है.

बड़ी निराशा के साथ

जय हिंद

अब सवाल यह है कि क्या सच में अर्णब गोस्वामी ने यह चिट्ठी लिखी है. इसके लिए चिट्ठी में कही गईं कुछ बातों पर ध्यान देने की ज़रूरत है. इसमें बिहार चुनाव में भाजपा को मिली हार का ज़िक्र किया गया है. यह 2015 की बात है. सवाल उठता है कि तब की बात को अर्णब गोस्वामी हाल की चिट्ठी में क्यों लिखेंगे, जबकि उसके बाद भाजपा या तो सभी चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी रही है या फिर कांग्रेस से पीछे रहने के बाद भी सरकार बनाने में काम हुई है. थोड़ा ग़ौर करने पर पता चलता है कि दरअसल इस चिट्ठी के पीछे की वजह 2014 के आम चुनाव के बाद दो-तीन मौक़ों पर ‘मोदी लहर’ के कथित रूप से कमज़ोर पड़ने का भय है.

साल 2015 की शुरुआत में दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए थे. तब कई राजनीतिक और चुनाव विशेषज्ञों ने दावा किया था कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आएगी. लेकिन परिणाम आए तो उसे सिर्फ तीन सीटें मिलीं. आम आदमी पार्टी ने 67 सीटें जीत लीं. वह पहला मौक़ा था जब प्रचंड मानी जा रही मोदी लहर को राजनीति में नई-नई जन्मी एक पार्टी ने रोक दिया था. उसके बाद अक्टूबर-नवंबर 2015 में बिहार में विधानसभा चुनाव हुए. उनमें भी भाजपा को जेडीयू-आरजेडी और कांग्रेस के गठबंधन से हार का सामना करना पड़ा था. इसकी भी उम्मीद नहीं की गई थी. एक ही साल देश के एक बड़े राज्य और एक महत्वपूर्ण केंद्र शासित प्रदेश में पार्टी की हार ने मोदी लहर या सीधे कहें तो नरेंद्र मोदी के जननेता होने के छवि पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया था.

यही वजह है कि बिहार चुनाव के कुछ समय बाद असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए भाजपा और नरेंद्र मोदी समर्थक सोशल मीडिया ने यह निठल्ला चिंतन लोगों के बीच पहुंचाने की कोशिश की थी. चुनाव अप्रैल-मई 2016 के बीच होने थे और चिट्ठी मार्च 2016 में वायरल की गई. इसके ज़रिये वोटरों में मोदी लहर के प्रति यक़ीन बनाए रखने की कोशिश की गई. तब शंखनाद नाम के फ़ेसबुक पेज से यही चिट्ठी वायरल की गई थी. उस समय इसमें अर्णब गोस्वामी का कहीं ज़िक्र नहीं था. लोग मोदी लहर में यक़ीन खो न दें इसीलिए बिहार में भाजपा की हार के लिए उन्हें भावनात्मक रूप से कोसा गया. मोदी के बहाने उन्हें संबोधित कर कहा गया कि एक व्यक्ति अपने जीवन का एक-एक पल उनकी भलाई करने में लगा रहा है और उन्हें इसकी क़द्र ही नहीं.

अब एक और बड़े और महत्वपूर्ण राज्य कर्नाटक में चुनाव होने हैं. वोटिंग से कुछ दिन पहले यही चिट्ठी फिर शेयर की जा रही है. इस बार इसे अर्णब गोस्वामी के नाम और कुछ फ़र्ज़ी सोशल मीडिया प्रोफ़ाइलों से फैलाया जा रहा है. इस बार भी वजह मोदी लहर के कमज़ोर पड़ने का डर ही है. हालांकि बीते दिसंबर में गुजरात में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को जीत मिली थी. लेकिन भाजपा जिस अंतर से जीतना चाहती थी उसमें वह बुरी तरह नाकाम रही थी. कई जानकारों ने तो यहां तक कहा कि भाजपा गुजरात में जीत कर भी हारी है और कांग्रेस हार कर भी जीती है. कई मानते हैं कि यह इस चिट्ठी के फिर से वायरल होने का एक कारण हो सकता है.

जानकारों के मुताबिक इसके अलावा एक और वजह है. पिछले तीन-चार सालों में कई पत्रकार सेलेब्रिटी की तरह हो गए हैं. अर्णब भी उनमें से एक हैं. उनके प्रशंसक और आलोचक दोनों बड़ी संख्या में हैं. प्रशंसक उन्हें ‘हमेशा कांग्रेस की आलोचना’ करने के लिए ‘सच्चा पत्रकार’ मानते हैं और आलोचक उन्हें ‘भाजपा-मोदी समर्थक’ बताते हैं. अगर वे प्रधानमंत्री के नाम कोई चिट्ठी लिखते तो यह अपने आप में एक ख़बर होती. इस चिट्ठी को उनकी बताना इसलिए भी हास्यास्पद है कि कोई पत्रकार (या कोई आम आदमी भी) आम लोगों को सस्ते दाल-चावल मिलने का ताना मारेगा यह मुश्किल लगता है.