पिछले हफ्ते ऑस्ट्रेलिया के गोल्डकोस्ट में संपन्न हुए 21वें कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का प्रदर्शन काफी सराहनीय रहा. भारत ने कुल 66 पदकों के साथ अपने अभियान का समापन किया. 11 दिन चले इन खेलों में उसने 26 स्वर्ण, 20 रजत और 20 कांस्य पदक जीते. 80 स्वर्ण पदक जीतने वाला ऑस्ट्रेलिया और 44 स्वर्ण पदक जीतने वाला इंग्लैंड ही पदक तालिका में उससे आगे थे. गोल्डकोस्ट में भारत का कुल 66 पदक जीतना कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में उसका तीसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भी है. इससे पहले उसने साल 2002 में मैनचेस्टर में 69 और 2010 में दिल्ली में हुए इन खेलों में 101 पदक जीते थे.

इन खेलों में मिली इस कामयाबी को देखते हुए भारतीय खिलाड़ियों से 2020 टोक्यो ओलंपिक में भी बड़ी उम्मीद लगाई जाने लगी है. इस प्रदर्शन को देखने के बाद खुद केंद्रीय खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर का कहना था कि कॉमनवेल्थ गेम्स तो केवल एक शुरुआत है, भारत अगले ओलंपिक में असली चमक बिखेरेगा. इन सभी चर्चाओं के बीच एक सवाल यह उठता है कि क्या कॉमनवेल्थ गेम्स में मिली सफलता के आधार पर भारत से ओलंपिक में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद की जा सकती है? अगर पिछले कॉमनवेल्थ खेलों में भारत के प्रदर्शन और उसके बाद हुए ओलंपिक में उसके प्रदर्शन की तुलना करें तो ऐसा बिलकुल भी नजर नहीं आता, तो फिर ऐसे में इस बार यह उम्मीद करना कितना सही होगा?

इस सवाल का जवाब पाने के लिए सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइट ‘स्क्रॉल डॉट इन’ के खेल पत्रकार आनंद कटकम ने इस बार के कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के प्रदर्शन की तुलना ओलंपिक के स्तर से की है. ये तुलना उन खिलाड़ियों के प्रदर्शन को आधार बनाकर की गई है जिन्होंने इस बार कॉमनवेल्थ में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया था. साथ ही इस तुलना में केवल उन खेलों को ही लिया गया है जिनमें दूरी, वजन और समय के आधार पर जीत और हार का निर्णय होता है.

इस बार कॉमनवेल्थ गेम्स में ‘डिस्कस थ्रो’ के मुकाबले में भारत की सीमा पुनिया को रजत, जबकि नवजीत ढिल्लन को कांस्य पदक मिला था. सीमा ने 60.41 मीटर की दूरी तक डिस्कस फेंका था जबकि नवजीत के डिस्कस ने 57.43 मीटर की दूरी तय की थी. हालांकि, गोल्डकोस्ट में यह सीमा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं था. उनके नाम 64.76 मीटर तक डिस्कस फेंकने का राष्ट्रीय रिकॉर्ड है.

कॉमनवेल्थ गेम्स के इस मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया की डानी स्टीवंस ने 68.26 मीटर तक डिस्कस फेंक कर स्वर्णिम सफलता हासिल की थी. अगर, सीमा और डानी दोनों के इस प्रदर्शन की तुलना रियो ओलंपिक के डिस्कस थ्रो मुकाबले से करें तो डानी ओलंपिक में रजत पदक जीतती नजर आती हैं. जबकि, पूनिया के हाथ खाली दिखते हैं. यही नहीं, सीमा के लिए ओलंपिक में पदक जीतने की राह भी काफी कठिन नजर आती है. हालांकि, अगर वे अपने राष्ट्रीय रिकॉर्ड यानी 64.76 मीटर से एक मीटर ज्यादा डिस्कस फेंकने में कामयाब होती हैं तो वे ओलंपिक में कांस्य पदक हासिल करती नजर आ रही हैं.

भारत को इस बार के कॉमनवेल्थ गेम्स में सबसे चौंकाने वाली सफलता वेटलिफ्टिंग में मिली है. देश के कुल 16 वेट लिफ्टरों में से नौ ने पदक जीते हैं. लेकिन, इस बड़ी सफलता की ओलंपिक के स्तर से तुलना करने पर भारत ओलंपिक में केवल एक पदक ही जीतता नजर आता है. यह इकलौता पदक भी विश्व चैंपियन और इस कॉमनवेल्थ गेम्स में रिकॉर्ड भार उठाने वाली मीराबाई चानू जीतती दिखती हैं.

कॉमनवेल्थ गेम्स में चानू ने 48 किग्रा वर्ग में हिस्सा लेते हुए कुल 196 किग्रा का भार उठाकर स्वर्ण पदक जीता था. यह वजन रजत पदक जीतने वाली खिलाड़ी से 26 किग्रा ज्यादा था. अगर इस प्रदर्शन की तुलना रियो ओलंपिक से करें तो चानू ओलंपिक में सिल्वर मेडल पर कब्जा करती नजर आती हैं. रियो में थाईलैंड की तानासन सोपिता ने सर्वाधिक 200 किग्रा वजन उठाकर स्वर्णिम सफलता हासिल की थी.

हालांकि, अगले ओलंपिक में मीराबाई चानू से स्वर्ण पदक की उम्मीद भी लगाई जा सकती है. पिछले एक साल के अंदर उन्होंने जिस तरह से वजन उठाने की अपनी क्षमता में इजाफा किया है, उसे देखते हुए यह उम्मीद करना गलत नहीं लगता. बहरहाल, वेटलिफ्टिंग में भी गौर करने वाली बात यही है कि चानू के अलावा दूसरा कोई भारतीय वेटलिफ्टर अपने कॉमनवेल्थ गेम्स के प्रदर्शन के आधार पर ओलंपिक में पदक जीतने की उम्मीद नहीं जगाता.

इस बार के कॉमनवेथ गेम्स में भारत के नीरज चोपड़ा एक सनसनी बनकर सामने आये. उन्होंने ‘जेवलिन थ्रो’ यानी ‘भाला फेंक’ स्पर्धा में अपने प्रदर्शन से सभी को हैरत में डाल दिया. नीरज ने ऑस्ट्रेलिया के चर्चित एथलीट हमिश पिकॉक को पीछे छोड़ते हुए 86.47 मीटर जेवलिन फेंककर स्वर्ण पदक अपने नाम किया. उनके इस प्रदर्शन की तुलना अगर रियो की ‘जेवलिन थ्रो’ स्पर्धा से करें तो वे ओलंपिक में कांस्य पदक जीतते नजर आते हैं.

महज 20 साल के नीरज की यह सफलता इसलिए भी चौंकाने वाली थी कि ‘जेवलिन थ्रो’ में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक लम्बे अरसे से कोई भारतीय पदक जीतने में सफल नहीं हुआ था. हालांकि, इसका कारण यह भी है कि भारतीय युवा इस स्पर्धा में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेते. लेकिन, इस बार के कॉमनवेल्थ गेम्स में नीरज चोपड़ा ने दिखाया कि अगर पूरी इच्छा शक्ति के साथ सही दिशा में मेहनत की जाए तो ‘जेवलिन थ्रो’ जैसी स्पर्धा में भी पदक जीतना संभव है.

डिस्कस थ्रो, वेटलिफ्टिंग और जेवलिन थ्रो के अलावा भी कुछ ऐसी स्पर्धाएं हैं जिनका यहां जिक्र नहीं किया गया है और ओलंपिक की उन स्पर्धाओं में भारत का पदक जीतना लगभग निश्चित माना जा रहा है. इनमें कुश्ती में सुशील कुमार, बैडमिन्टन में सायना नेहवाल, पीवी सिंधू और किदाम्बी श्रीकांत शामिल हैं. इस सूची में भारत की टेबिल टेनिस सनसनी मनिका बत्रा का भी नाम जुड़ सकता है. मनिका ने गोल्डकोस्ट में दो गोल्ड सहित कुल चार पदक जीते थे. इस दौरान उन्होंने तीन बार की ओलंपिक पदक विजेता और विश्व की नंबर चार खिलाड़ी सिंगापुर की फेंग तिआनवेई को भी शिकस्त दी थी.

भारत कॉमनवेल्थ जैसा प्रदर्शन ओलंपिक में क्यों नहीं कर पाता?

यह सवाल तब से चर्चा में है जब से भारत ने कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा लेना शुरू किया. हर बार भारत इन खेलों में बेहतर प्रदर्शन करता है लेकिन इसके दो साल बाद होने वाले ओलंपिक में वह इस सफलता को नहीं दोहरा पाता. भारत का कॉमनवेल्थ में अच्छा प्रदर्शन करना और ओलंपिक में वैसा प्रदर्शन न कर पाने का सबसे बड़ा कारण यह है कि वह कॉमनवेल्थ गेम्स की जिन स्पर्धाओं में सबसे ज्यादा मेडल जीतता है उनमें जो देश सबसे अच्छे माने जाते हैं, वे कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा ही नहीं लेते. इस बार के कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत ने आधे से ज्यादा मेडल शूटिंग, वेटलिफ्टिंग और कुश्ती में जीते हैं और इन खेलों में जो देश सबसे अच्छे माने जाते हैं वे कॉमनवेल्थ का हिस्सा ही नहीं हैं.

उदाहरण के लिए इस बार कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत ने शूटिंग में 16, कुश्ती में 12 और वेटलिफ्टिंग में 09 पदक जीत थे. दो साल पहले हुए रियो ओलंपिक की शूटिंग स्पर्धा में सबसे ज्यादा पदक जीतने वाले देश इटली, जर्मनी और चीन थे. कुश्ती में रूस, जापान, क्यूबा और अमेरिका थे. जबकि, वेटलिफ्टिंग में चीन, ईरान और थाईलैंड थे. ये देश राष्ट्रमंडल देशों यानी कॉमनवेल्थ का हिस्सा नहीं हैं. यही नहीं, मुक्केबाजी और टेबल टेनिस स्पर्धाओं के मामले में भी कुछ ऐसी ही स्थिति है. इस बार कॉमनवेल्थ गेम्स की मुक्केबाजी और टेबल टेनिस स्पर्धाओं में भारत ने कुल 17 पदक जीते थे. लेकिन इन स्पर्धाओं में जो तीन देश ओलंपिक में सबसे आगे रहते हैं वे भी राष्ट्रमंडल देशों का हिस्सा नहीं हैं.

यानी साफ़ है कि गोल्डकोस्ट में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स की जिन स्पर्धाओं में भारत को झोली भरकर पदक मिले, उनमें से ज्यादातर हमारे खिलाड़ियों ने दुनिया के सबसे मजबूत प्रतिद्वंदियों से भिड़कर हासिल नहीं किए हैं. कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के ज्यादा पदक जीतने की सबसे बड़ी वजह यही है और इसके मुकाबले ओलंपिक में प्रदर्शन न कर पाने की भी.

हालांकि, इन सब बातों के बावजूद कई जानकर कॉमनवेल्थ गेम्स की सफलता का अपना महत्व बताते हैं. ये लोग कहते हैं कि भले ही कई लोग ओलंपिक और कॉमनवेल्थ गेम्स की आपस में तुलना करके नतीजों को देख रहे हों. लेकिन, कॉमनवेल्थ गेम्स की अपनी एक अलग पहचान है. भारत जैसे देश में जहां खेलों को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता, वहां इन खेलों में भी पदक जीतने के अलग ही मायने हैं. इससे न सिर्फ देश में खेल संस्कृति विकसित होती है बल्कि, इसमें मिली सफलता लाखों युवाओं को खेलों में आगे बढने के लिए प्रेरित भी करती है. कुछ खेल विशेषज्ञों का मानना है कि कॉमनवेल्थ में भारत की सफलता को इसलिए भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें उसने कनाडा और न्यूजीलैंड जैसे उन देशों को पीछे छोड़ा है जहां खेल संस्कृति और खेल ढांचा हमेशा से मजबूत रहा है.