24 अप्रैल 1973. यह तारीख भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है. यही वह दिन था जब देश की सबसे बड़ी अदालत ने भारतीय न्यायिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय लिखा था. इसी दिन वह ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया था जो आज भी सुप्रीम कोर्ट के लिए सबसे महत्वपूर्ण नज़ीर की भूमिका निभाता है.

45 साल पहले आज के ही दिन सुप्रीम कोर्ट ने ‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’ मामले में फैसला सुनाया था. देश के इतिहास में यह पहला और आखिरी मौका था जब किसी मामले की सुनवाई के लिए 13 जजों की पीठ का गठन किया गया. इस पीठ ने अक्टूबर 1972 और मार्च 1973 के बीच लगभग 70 दिनों तक इस मामले की सुनवाई की. सैकड़ों नजीरों और 71 देशों के संविधानों का अध्यन करने के बाद इस पीठ ने 24 अप्रैल 1973 को कुल 703 पन्नों का फैसला सुनाया. यह फैसला क्या था और इतनी बड़ी पीठ के गठन की जरूरत ही क्यों पड़ी थी, इसे समझने के लिए उस वक्त के राजनीतिक माहौल को समझना बेहद जरूरी है.

तब के हालात

प्रधानमंत्री बनने के साथ ही इंदिरा गांधी की सुप्रीम कोर्ट से तनातनी शुरू हो गई थी. इंदिरा गांधी लगभग सब कुछ अपने नियंत्रण में कर लेना चाहती थीं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट लगातार उनके इन मंसूबों पर पानी फेर देता था. सबसे पहले साल 1967 में शीर्ष अदालत ने गोलकनाथ मामले में एक अहम फैसला देते हुए कह दिया था कि संसद के पास यह अधिकार नहीं है कि वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों को छीन सके या उनसे छेड़छाड़ भी कर सके.

गोलकनाथ मामले के लगभग ढाई साल बाद इंदिरा गांधी ने देश के 14 बड़े बैंकों के राष्ट्रीयकरण का फैसला लिया. इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और कुछ ही महीनों के भीतर कोर्ट ने सरकार के इस फैसले को असंवैधानिक करार दे दिया. इसके एक साल बाद जब इंदिरा गांधी ने रजवाड़ों को मिलने वाले ‘प्रिवी पर्स’ समाप्त करने का फैसला लिया तो उसे भी सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक ठहरा दिया.

इन तीनों ही बड़े मामलों में इंदिरा गांधी को लगातार सुप्रीम कोर्ट में हार झेलनी पड़ी थी. (एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इन तीनों ही मामलों में सरकार के खिलाफ उन्हीं एनए पालकीवाला ने पैरवी की थी जिन्होंने आगे चलकर केशवानंद भारती मामले में भी सरकार के खिलाफ सबसे मजबूत पैरवी की.) इन तीन फैसलों में हार से बौखलाई इंदिरा सरकार ने अब सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टों पर लगाम कसने की ठानी.

इंदिरा सरकार के संविधान संशोधन और उन्हें मिली चुनौती

इंदिरा सरकार ने एक-एक कर संविधान में संशोधन शुरू कर दिए. इन संशोधनों के जरिये सुप्रीम कोर्ट के इन तीनों फैसलों को पलट दिया गया. गोलकनाथ केस, बैंकों के राष्ट्रीयकरण और रजवाड़ों को मिलने वाले ‘प्रिवी पर्स’ के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसले दिए थे, उन्हें संविधान संशोधनों के जरिये एक-एक कर रद्द कर दिया गया. इतना ही नहीं, इन संशोधनों से विधायिका को यह भी शक्तियां मिल गईं कि वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों में संशोधन करने के साथ ही उन्हें निरस्त भी कर सकती थी. इंदिरा गांधी इन संशोधनों के जरिये लगभग निरंकुशता की ओर बढ़ने लगी थीं.

केशवानंद भारती | फोटो साभार : लाइवलॉ.इन
केशवानंद भारती | फोटो साभार : लाइवलॉ.इन

इन्हीं संविधान संशोधनों को चुनौती मिली केशवानंद भारती मामले में. केशवानंद भारती केरल के एक धार्मिक मठ के प्रमुख थे. केरल सरकार ने उनके मठ के प्रबंधन के उनके अधिकार को सीमित कर दिया था. इसी के खिलाफ वे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे. यह भी बेहद दिलचस्प है कि जिन एनए पालकीवाला ने केशवानंद भारती की सुप्रीम कोर्ट में ऐतिहासिक पैरवी की, वे कभी निजी तौर से पालकीवाला से मिले ही नहीं.

केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह तय करने की थी कि क्या संसद के पास संविधान को किसी भी हद तक संशोधित करने का अधिकार है. क्या संसद चाहे तो नागरिकों के मौलिक अधिकारों में भी संशोधन कर सकती है और उन्हें छीन भी सकती है? गोलकनाथ मामले में 11 जजों की पीठ यह फैसला दे चुकी थी कि संसद मौलिक अधिकारों से छेड़छाड़ नहीं सकती, लिहाजा इसी मुद्दे पर कोई नया फैसला लेने के लिए 11 जजों से भी बड़ी पीठ के गठन की जरूरत थी. इसीलिए मुख्य न्यायाधीश सर्व मित्र सीकरी की अध्यक्षता में देश के इतिहास में पहली और आखिरी बार 13 जजों की एक बेंच का गठन हुआ और केशवानंद भारती मामले की सुनवाई शुरू हुई.

अनुच्छेद 368 में संविधान संशोधन से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं. इस अनुच्छेद को ऊपरी तौर पर पढ़ने से लगता है कि संसद के पास संविधान में संशोधन करने की असीमित शक्तियां हैं. यह अनुछेद ऐसा कुछ नहीं कहता कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती. लेकिन 70 के दशक में जिस तरह से इंदिरा गांधी की सरकार ने संविधान में लगातार संशोधन किये, उससे यह सवाल पैदा हुआ कि क्या संविधान अप्रत्यक्ष तौर से संसद के इस अधिकार के सीमित होने की बात करता है? इसी सवाल का जवाब केशवानंद भारती मामले में 13 जजों को खोजना था.

करीब 70 दिनों की बहस के बाद 24 अप्रैल 1973 को कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया. यह फैसला 7:6 के न्यूनतम अंतर से दिया गया. यानी सात जजों ने पक्ष में फैसला दिया और छह जजों ने विपक्ष में. इस फैसले में छह के मुकाबले सात के बहुमत से जजों ने गोलकनाथ मामले के फैसले को पलट दिया. यानी अब न्यायालय ने माना कि संसद मौलिक अधिकारों में भी संशोधन कर तो सकती है, लेकिन ऐसा कोई संशोधन वह नहीं कर सकती जिससे संविधान के मूलभूत ढांचे (बेसिक स्ट्रक्चर) में कोई परिवर्तन होता हो या उसका मूल स्वरूप बदलता हो.

संविधान का मूलभूत ढांचा

भारतीय न्यायिक इतिहास में ‘संविधान के मूलभूत ढांचे’ या बेसिक स्ट्रक्चर के सिद्धांत का जिक्र सबसे पहले 1965 में किया गया था. जस्टिस मढोलकर ने तब सज्जन सिंह मामले की सुनवाई करते हुए इस सिद्धांत पर सबसे पहले विस्तृत चर्चा की थी. कम ही लोग जानते हैं कि भारतीय न्यायिक इतिहास का यह सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत पकिस्तान से आया है. जस्टिस मढोलकर ने सज्जन सिंह मामले में इस सिद्धांत का जिक्र पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1963 में दिए गए एक फैसले के हवाले से ही किया था. केशवानंद भारती मामले में जस्टिस एचआर खन्ना ने इस सिद्धांत पर और भी विस्तार से चर्चा की और तब ही यह सिद्धांत एक तरह से भारतीय संविधान का संरक्षक बन गया.

केशवानंद भारती मामले में आए इस फैसले से स्थापित हो गया कि देश में संविधान से ऊपर कोई भी नहीं है, संसद भी नहीं. यह भी माना जाता है कि अगर इस मामले में सात जज यह फैसला नहीं देते और संसद को संविधान से किसी भी हद तक संशोधन के अधिकार मिल गए होते तो शायद देश में गणतांत्रिक व्यवस्था भी सुरक्षित नहीं रह पाती.

इस फैसले के दो साल बाद इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया और संविधान को पूरी तरह से बदल दिया गया. लेकिन आपातकाल के बाद केशवानंद भारती मामले का फैसला ही था जिसकी कसौटी पर कसकर संविधान को उसके मूल स्वरूप में वापस लाया गया. यह फैसला नहीं आया होता, या अगर इस फैसले में बहुमत ने मान लिया गया होता कि संसद किसी भी हद तक संविधान में संशोधन कर सकती है (जैसा कि इस पीठ के कुछ जजों ने माना भी था) तो आपातकाल के दौरान हुए संविधान संशोधन शायद कभी सुधारे नहीं जा सकते थे.

जजों को खामियाजा भुगतना पड़ा

केशवानंद भारती मामले के इस फैसले ने देश के ‘गणतांत्रिक चरित्र’ और ‘संविधान के मूल स्वरूप’ को तो हमेशा के लिए बचा लिया लेकिन इस फैसले को सुनाने वाले कई जजों ने इसका खामियाज़ा भी भुगता. इस फैसले के अगले ही दिन यानी 25 अप्रैल 1973 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एसएम सीकरी का कार्यकाल समाप्त हो रहा था लिहाजा देश के 14वें मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति होनी थी. इंदिरा गांधी सरकार ने एएन रे को इस पद पर नियुक्त कर दिया जबकि उनसे वरिष्ठ तीन जज उस वक्त सुप्रीम कोर्ट में मौजूद थे. लेकिन चूंकि इन तीनों जजों ने केशवानंद भारती मामले में सरकार के पक्ष का फैसला नहीं दिया था लिहाजा इन्हें लांघते हुए जस्टिस रे को मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया. सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था.

जस्टिस जेएम शेलत, जस्टिस केएस हेगड़े और जस्टिस एएन ग्रोवर, जिन्हें नज़रंदाज़ करते हुए जस्टिस रे को मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था, तीनों ने अपने पद इस्तीफ़ा दे दिया. कुछ समय बाद ही जस्टिस रे ने इंदिरा सरकार के इस उपकार को चुकाने के भरसक प्रयास भी किये. इलाहबाद हाई कोर्ट ने जब इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द कर दी थी तो इस फैसले के खिलाफ इंदिरा गांधी सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं. इसी दौरान जस्टिस रे ने एक 13 जजों की पीठ का गठन कर दिया और निर्देश जारी किये कि यह पीठ संविधान में संशोधन के संसद के अधिकार पर पुनर्विचार करेगी.

हैरानी की बात यह थी कि केशवानंद भारती मामले में किसी ने कोई पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं की थी. ऐसे में पालकीवाला ने इस पीठ से सवाल किया कि क्या कोई पुनर्विचार याचिका दाखिल हुई है जिसके लिए इस पीठ का गठन हुआ है. जस्टिस रे ने इसके जवाब में कहा कि तमिलनाडु राज्य की ओर से यह याचिका दाखिल की गई है. तमिलनाडु के तत्कालीन महाधिवक्ता उस वक्त वहीं मौजूद थे. उन्होंने तुरंत ही खड़े होकर कहा कि ऐसी कोई याचिका उनके राज्य की ओर से दाखिल नहीं की गई है. अंततः जस्टिस रे को इस पीठ को निरस्त करना पड़ा और केशवानंद भारती मामले के फैसले को पलटने का उनका प्रयास असफल रहा.

केशवानंद भारती मामले में सबसे महत्वपूर्ण फैसला लिखवाने वाले जस्टिस एचआर खन्ना को भी इसका खामियाज़ा भुगतना पड़ा था. उन्हें भी कुछ सालों बाद वरिष्ठ होते हुए भी नज़रंदाज़ किया गया और उनकी जगह जस्टिस बेग को देश का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया. जस्टिस खन्ना ने भी तब अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था. लेकिन इन न्यायाधीशों ने अपने पद पर रहते हुए केशवानंद भारती मामले में तब जो इतिहास रच दिया था, वह आज भी भारतीय न्यायपालिका को राह दिखाने का काम कर रहा है.