बीती 14 अप्रैल की बात है. भारतीय जनता पार्टी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से एक ट्वीट किया गया. इसमें बताया गया था कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने ‘शोधन-अक्षमता और दिवाला संहिता (आईबीसी), 2016’ की मदद से यूपीए सरकार के समय के चार लाख करोड़ रुपये के फंसे हुए कर्ज (एनपीए) की वसूली कर ली है. ट्वीट के मुताबिक़ कुल एनपीए नौ लाख करोड़ रुपये था. मीडिया और सोशल मीडिया के एक हिस्से ने इस ट्वीट को हाथों-हाथ लिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वेबसाइट ने भी इसे ख़बर के रूप में चलाया. इस ट्वीट को भाजपा समर्थकों ने बड़ी संख्या में रीट्वीट कर वायरल कर दिया था. इसका स्क्रीनशॉट नीचे देखा जा सकता है.

लेकिन क्या यह सच है? ऑल्ट न्यूज़ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इस ट्वीट में दी गई जानकारी भ्रामक थी. अंग्रेज़ी अख़बार इकनॉमिक टाइम्स की चार अप्रैल की एक ख़बर की हेडिंग लेकर यह ट्वीट किया गया था. अख़बार ने सरकार के एक अधिकारी के बयान के हवाले से यह खबर लगाई थी जिसमें कहा गया था कि चार लाख करोड़ रु का एनपीए वसूल कर लिया गया है. खबर में न्यूज़ एजेंसी आईएएनएस के हवाले से बताया गया था कि कॉर्पोरेट मामलों के सचिव इंजेती श्रीनिवास ही वह अधिकारी हैं जिन्होंने यह जानकारी दी थी.

चूंकि यह स्टोरी एनडीए सरकार के काम की थी इसलिए भाजपा समर्थक मानी जाने वाली वेबसाइटों ने बिना जांच-पड़ताल किए इसे प्रकाशित कर दिया. प्रधानमंत्री के मोबाइल एप नमो और केंद्रीय कैबिनेट के कई भाजपा-एनडीए मंत्रियों, सांसदों और विधायकों ने इसे सोशल मीडिया पर शेयर कर दिया. बाद में भाजपा ने भी इसे अपने ट्विटर हैंडल से शेयर कर दिया.

सच कुछ और है

आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक़ पिछले चार सालों में मोदी सरकार 2.73 लाख करोड़ रुपये की उस रकम में से केवल 29,343 करोड़ रुपये वसूल कर पाई है जिसे बैंकों ने बट्टे खाते में डाल दिया था. कुछ समय पहले राज्यसभा में किए गए एक सवाल के जवाब में केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ला ने यह जानकारी दी है.

लंबे समय से चल रहे एनपीए को कई बार बैंक बट्टे खाते में डाल देते हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि बैंक ने अब अपना पैसा वापस पाने की उम्मीद छोड़ दी. इसके बाद भी बैंक इसे वसूलने का प्रयास करते रहते हैं. इसके लिए 2016 में लाए गए आईबीसी सिस्टम का भी इस्तेमाल किया जाता है. यह अभी देखने वाली बात होगी कि इसके तहत और कितना एनपीए वसूल हो पाता है. फ़िलहाल स्थिति यह है कि एनपीए के तहत आने वाली उस रकम का सिर्फ 10.77 प्रतिशत ही वसूल हो पाया है जिसे बैंकों ने बट्टे खाते में डाल दिया था. इसका मतलब है कि पिछले चार सालों के दौरान सरकारी बैंकों द्वारा एनपीए घोषित किए गए ऋण का 89.23 प्रतिशत हिस्सा क़र्ज़दारों से वसूल नहीं किया जा सका.

उधर, आरबीआई और उनके बयान के आंकड़ों में इस फर्क को लेकर जब ऑल्ट न्यूज़ ने इंजेती श्रीनिवास से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि इस मामले में उनके बयान को मीडिया में ग़लत तरीक़े से पेश किया गया. उनका कहना था, ‘मैंने कहा था कि कुल एनपीए के 50 प्रतिशत हिस्से की वसूली का मामला आईबीसी के तहत बनाए गए सिस्टम को रेफर कर दिया गया है.’

साफ़ है कि इस मामले में भाजपा ने ट्वीट के ज़रिये ग़लत जानकारी शेयर की. यही वजह है कि बाद में उसने यह ट्वीट हटा दिया. पार्टी और उसका समर्थन करने वाली वेबसाइटों और सोशल मीडिया प्रोफ़ाइलों ने बिना तथ्यों की जानकारी लिए यह बात ख़बर की तरह फैला दी कि एनडीए सरकार ने चार लाख करोड़ रुपये के एनपीए की वसूली कर ली है. इकनॉमिक टाइम्स की जिस रिपोर्ट के हवाले से यह दावा किया गया था वह आईएएनएस की एक रिपोर्ट पर आधारित थी. आईएएनएस ने भी इसकी पड़ताल करना ज़रूरी नहीं समझा. बाद में कुछ संस्थानों ने इस पर संदेह ज़ाहिर किया और पता चला कि यह दावा आरबीआई के आंकड़ों से मेल नहीं खाता.