अप्रैल के महीने में ऐसा चार-पांच दिन हुआ जब नोएडा के अपने ऑफिस पहुंचने के बाद मैंने रिक्शेवालों को दस-दस के सिक्कों में किराया देने की कोशिश की और उन्होंने लेने से मना कर दिया. यह कुछ समय पहले फैली अफवाह का असर था जिसके मुताबिक जिन सिक्कों में रुपए का चिन्ह नहीं बना है या दस का अंक बीच में लिखा हुआ है, वे असली नहीं हैं. साल भर पुरानी इस अफवाह के कारण अब भी ऐसे सिक्के नोएडा में ठीक से नहीं चल रहे हैं.

इसके कुछ दिनों बाद सिक्कों से ही जुड़ा दूसरा वाकया मेरे सामने मध्य प्रदेश के सतना रेलवे स्टेशन पर घटा. उस दिन मेरे पास खड़ी एक महिला ने भिखारी को तीन रुपए देने चाहे और भिखारी ने उसे यह कहते हुए सिक्के लौटा दिए कि ये नहीं चलते इसलिए उसे या तो पांच का सिक्का दिया जाए या कुछ भी नहीं. पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि वह भिखारी कुछ ज्यादा ही नखरे दिखा रहा था, लेकिन असलियत यह है कि ऐसा करना उसकी मजबूरी थी. पिछले कुछ समय से इस इलाके में एक और दो रुपए के सिक्के नहीं चल रहे हैं. भिखारियों पर ध्यान दें तो उनके लिए ऐसे हालात सबसे बुरे कहे जा सकते हैं क्योंकि एक-दो रुपए के सिक्कों से वे कुछ खरीद नहीं सकते और दस रुपए का नोट कोई भीख में देता नहीं.

पिछले दिनों जब पूरा देश नकदी की तंगी से जूझ रहा था उस समय भी मध्य प्रदेश के सतना, रीवा, सीधी, कटनी जैसे जिलों और उत्तर प्रदेश के बनारस, कानपुर, इलाहाबाद के कई इलाकों में एक-दो रुपए के सिक्के पूरी तरह से चलन से बाहर थे. खासकर कस्बों और गांवों में जहां बीते कुछ महीनों से फुटकर व्यापारियों ने इन्हें लेना पूरी तरह से बंद कर दिया है.

रीवा के सब्जी विक्रेता श्रवण त्रिपाठी चिल्लर की इस नई ‘मुसीबत’ के बारे में पूछने पर कहते हैं, ‘मार्केट में चिल्लर बहुत ज्यादा हो गया है. हमारे पास बोरियां भरी पड़ी हैं और वैसे भी सबको लगता है कि हम यहां पर उनका वजन कम करने के लिए बैठे हैं, इसलिए वो हमारे सिर पर डालकर चले जाना चाहते हैं. कितना चिल्लर लेंगे हम.’ उनके पड़ोस की दुकान पर बैठे रामगणेश भी इस बात से सहमत नजर आते हैं और इसमें नोटों की किल्लत का जिक्र भी जोड़ते हैं. वे कहते हैं, ‘नोट कम हैं और सिक्के ज्यादा. हम जितने सिक्के रख सकते हैं, हैं हमारे पास. लेने लगो तो लोग दस-बीस क्या सौ-पचास रुपए भी चिल्लरों में दे जाते हैं. दिक्कत ये है कि हम सब्जी तौलें कि चिल्लर गिनें. फिर ये भी सुनने को मिलता रहता है कि सिक्के बंद होने वाले हैं, इसलिए नहीं लेते.’ ज्यादातर सब्जी दुकानदार मानते हैं कि वे सिक्कों में लेन-देन करना तो चाहते हैं लेकिन जो सिक्के उनके पास हैं, उन्हें कहीं खपाने के बाद.

बनारस की रहने वाली प्रिया सिंह, जो एक कॉलेज स्टूडेंट हैं, भी सिक्के चलना बंद होने की अफवाह का जिक्र करते हुए बताती हैं, ‘जब भी किसी से पूछो कि क्यों नहीं लोगे सिक्के. तो कहता है कि ये बंद होने वाले हैं. लोगों को लगता है कि नोटबंदी की तरह अचानक एक दिन सिक्काबंदी हो जाएगी तो वे इतने सारे सिक्के लेकर कहां जाएंगे. आजकल सब्जी-फल वाले ही नहीं रिक्शावाले भी सिक्के नहीं ले रहे हैं.’

हालांकि हालत हर जगह इतनी बुरी नहीं है. इंदौर में दूध का व्यवसाय करने वाले मोहित यादव बताते हैं, ‘यहां तो सिक्के मजे से चलते हैं, लेकिन अगर आप थोक में किसी को देना चाहें जैसे सौ या पचास रुपए तो लोग इतने सिक्के लेने से मना कर देते हैं. कोई भी अपने पास जरूरत से ज्यादा सिक्कों का स्टॉक रखना नहीं चाहता.’ इंदौर के राजवाड़ा मार्केट के कुछ और व्यापारी भी सिक्कों का स्टॉक बढ़ाने से बचने की बात स्वीकारते हैं और मजाक में ही सही यह कहते दिखते हैं कि कहीं किसी दिन सिक्काबंदी हो गई तो वे ही सबसे ज्यादा परेशान होंगे.

पिछले दिनों जब कई जगहों पर नोटों की किल्लत होने की खबरें आ रही हैं, सिक्के राहत की वजह बन सकते थे. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया तो इसकी एक वजह सालों से चला आ रहा आम लोगों का रवैया भी है. हमारे यहां जनता सिक्कों और छोटे नोटों से हमेशा परायापन जताती रही है. इंदौर के प्रिंटिंग व्यवसायी संदीप भालेराव बताते हैं, ‘करीब महीने भर पहले मुझे हजार रुपए का भुगतान सिक्कों में मिला. मैंने तो इसे सहजता से ही लिया लेकिन देने वाला खुद ही गफलत में दिख रहा था. हालांकि उन पैसों की खपत करना मेरे लिए भी थोड़ा मुश्किल था. ज्यादातर लोगों को लगता है कि उनके पास पैसे तो पर्याप्त हों, लेकिन उन्हें सहेजने का झंझट कम हो इसलिए वे छुट्टे पैसों या छोटे नोटों से परहेज करते हैं. बीते कुछ समय में मार्केट में छुट्टों की किल्लत रह नहीं गई है इसलिए भी उनकी कदर कम हो गई है.’

कुछ जानकार चिल्लर की इस बाढ़ को नोटबंदी का दूरगामी असर भी बताते हैं. उनके अनुसार नोटबंदी के दौरान डिजिटल ट्रांजेक्शन करने पर खासा जोर दिया गया और इसके बाद से बड़े शहरों में यह चलन खासा बढ़ा भी है. इस कारण शहरों में सिक्कों और छुट्टे पैसों की जरूरत कम हुई है और उन्हें छोटे शहरों, कस्बों और गांवों की तरफ धकेल दिए गया है. इसके अलावा जब नोटबंदी के दौरान अचानक लोगों के पास पैसे खत्म हो गए तो लाखों की संख्या में गुल्लक भी तोड़े गए थे. सालों से जमा वे सिक्के भी अब सर्कुलेशन में आ चुके हैं और जानकारों के मुताबिक यही वजह है कि बाजार में सिक्के जरूरत से ज्यादा हो चुके हैं.

बीते छह-आठ महीने से सिक्कों की अधिकता की यह समस्या लगातार बनी हुई है और बीच-बीच में किसी अफवाह की हवा पाकर घटती-बढ़ती रहती है. बीते साल नवंबर में तो कानपुर के व्यापारियों ने बाकायदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर के साथ बड़े-बड़े होर्डिंग लगाकर अपनी समस्या की तरफ उनका ध्यान खींचा था. उस समय तो कुछ बैंक शाखाओं ने भी सिक्के लेने से इंकार कर दिया था. हालांकि इस साल फरवरी में आरबीआई से निर्देश जारी होने के बाद बैंक अब कितनी भी बड़ी राशि सिक्कों में लेने को बाध्य हैं, लेकिन इसके बावजूद हालात ज्यादा ठीक नहीं हो सके हैं.

प्रिंटिंग व्यवसायी संदीप भालेराव बताते हैं, ‘इस मामले में सरकारी बैंकों का रवैया बेहद दुखी करने वाला है. मैं सरकारी बैंकों में कई दिन धक्के खाने के बाद प्राइवेट बैंक गया तो वहां सिक्के मिनटों में जमा हो गये.’ वाराणसी के केदार घाट पर किराने की छोटी सी दुकान चलाने वाले रविकांत भी ऐसा ही कुछ बताते हैं, ‘मुझे लगता है कि ज्यादातर छोटे दुकानदारों या रेहड़ी-ठेले वालों के अकाउंट सरकारी बैंकों में होते हैं या उन्होंने जनधन योजना में खाता खोला हुआ है. इन बैंकों में सेवाएं अच्छी नहीं हैं. वे वहां अपने हजार-पांच सौ के नोट ही बड़ी मुश्किल से जमा करवा पाते हैं इसलिए सिक्के लेकर जाने की हिम्मत ही नहीं बटोर पाते. मैं भी पांच बार सोचता हूं और कोशिश करता हूं कि बिना गए काम चल जाए.’ वहीं सतना की एसबीआई ब्रांच के एक बैंक कर्मचारी का कहना है कि उनकी शाखा सौ-पचास सिक्के तो तुरंत ले लेती है लेकिन पांच-दस हजार के सिक्कों को वे किस्तों में जमा करने की सलाह देते हैं.

कुल मिलाकर सिक्कों से जुड़ी इस समस्या के उपाय फिलहाल बैंकों के असहयोग और अफवाहों के असर से आगे नहीं निकल पा रहे हैं और इसके चलते लोगों को तमाम परेशानियां उठानी पड़ रही है. इस परेशानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि सिक्कों को न चल पाने की यह जिल्लत नोटों की किल्लत वाले दौर में भी उठानी पड़ रही है.