केंद्र सरकार द्वारा पूरे मेघालय और अरुणाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा) हटाने का फैसला बहुत ही सकारात्मक कदम है. 2017 से इन राज्यों में विद्रोह से जुड़ी कोई घटना सामने नहीं आई है. तीन साल पहले त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने इस आधार पर राज्य से अफस्पा हटाने की मांग की थी कि वहां विद्रोही गतिविधियां पूरी तरह खत्म हो गई हैं. इसके बाद पूर्वोत्तर के इस राज्य से यह कानून हटा लिया गया था. हालांकि यहां के राज्यों में असम, नगालैंड और मणिपुर के ज्यादातर हिस्से में अफस्पा कानून फिलहाल लागू रहेगा.

अगर किसी क्षेत्र की जनता साबित करती है कि वह शांति कायम रख सकती है तो केंद्र द्वारा इस कोशिश को सम्मान देते हुए अफस्पा को हटाया जाना जरूरी और पूरी तरह सही कदम है.

अफस्पा एक बहुत ही सख्त कानून है जो सुरक्षा बलों को नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार देता है. सुरक्षा बल के जवान इन अधिकारों का अपनी मर्जी से इस्तेमाल कर सकते हैं. इसमें कोई दोराय नहीं है कि इस कानून को विषम परिस्थितियों में ही लागू किया जाता है. यह तब होता है जब स्थानीय प्रशासन संबंधित इलाकों पर नियंत्रण रखने में नाकाम रहता है और सरकार से यह कानून लागू करने की मांग करता है. हालांकि एक बार जब यह कानून लागू हो जाता है तो प्रशासन इसे हटाने में अक्सर हिचक ही दिखाता है. मेघालय का ही उदाहरण लें तो यहां 27 साल से अफस्पा लागू है जबकि राज्य में विद्रोही गतिविधियां सालों पहले नियंत्रित कर ली गई हैं.

मणिपुर की बात करें तो नागरिक संगठनों के भारी विरोध और इरोम शर्मिला की चर्चित भूख हड़ताल के बाद सरकार ने हिचक के बावजूद 2004 में इंफाल (नगर निगम क्षेत्र) से अफस्पा हटाया था. वहीं दूसरी तरफ इस साल फरवरी में असम की सरकार ने पूरे राज्य को अशांत क्षेत्र घोषित कर दिया था. इसके बाद राज्य के सभी जिले इस कानून की जद में आ गए हैं, जबकि असम से भी उग्रवाद लगभग खत्म हो चुका है.

सरकारों को यह कानून लुभाता है क्योंकि इसके तहत बुनियादी नागरिक अधिकार रद्द किए जा सकते हैं. हालांकि 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में साफ किया था कि अफस्पा के तहत यह मानना कि सुरक्षा बलों को कुछ भी करने का अधिकार है, इस कानून का गलत मतलब है.

देश की शीर्ष अदालत ने मणिपुर के एक नागरिक संगठन की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की थी. यह संगठन उन लोगों ने बनाया है जिनका कोई न कोई परिजन राज्य में कथिततौर पर सुरक्षा बलों द्वारा मारा गया है. तब सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि जिन इलाकों में अफस्पा लागू है, वहां नागरिकों की शिकायतों पर सुनवाई के लिए तय प्रक्रिया पूरी किए जाने की जरूरत है और यह कानून उग्रवाद विरोधी अभियानों में सैन्यकर्मियों को एकतरफा सुरक्षा नहीं देता.

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक अफस्पा का किसी इलाके में जारी रहना नागरिक प्रशासन और सशस्त्र बलों की असफलता का प्रतीक है. देश की शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी जम्मू कश्मीर के मामले में पूरी तरह सही जान पड़ती है. अतीत में यहां कई जिलों में शांतिपूर्ण स्थिति थी और यहां से अफस्पा हटाने की मांग उठती रही, इसके बावजूद केंद्र सरकार ने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया. वहीं उसने स्थानीय एजेंसियों को ही कानून लागू करने का अधिकार भी दे दिया. कुछ मामलों में तो यहां और भी बुरी स्थिति है. मसलन इस साल जनवरी के दौरान शोपियां में सुरक्षा बलों की गोलियों से तीन नागरिकों की मौत सीधे-सीधे 2016 के सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का ही उल्लंघन है.

उम्मीद की जानी चाहिए कि मेघालय से अफस्पा हटने से इस कानून और इसकी सीमाओं पर एक संतुलित बहस की शुरुआत होगी. (स्रोत)