नरेंद्र मोदी हमेशा से कारोबारी वर्ग के चहेते रहे हैं. मुख्यमंत्री के तौर पर भी उन्हें कारोबारी काफी पसंद करते थे. यही वजह थी कि जब उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावना बनी तो इस वर्ग ने उनका हर तरह से पूरा साथ दिया. उन्हें पसंद करने वालों में जहां एक तरफ मुकेश अंबानी और गौतम अडाणी जैसे बड़े कारोबारी रहे तो वहीं दूसरी तरफ छोटे कारोबारी भी उन्हें पसंद करते आए हैं.

इन सभी को उम्मीद थी कि अगर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे तो देश की आर्थिक नीतियां कारोबारियों के अनुकूल होंगी और उनके लिए कारोबार करना पहले से आसान हो जाएगा. कारोबारी श्रम सुधार के नाम पर श्रम कानूनों में जिस तरह के बदलाव चाहता था, वह इस सरकार ने एक हद तक किया भी. कारोबार करने से संबंधित कुछ और जटिलताओं को भी मोदी सरकार ने कम किया.

इन्हीं कदमों की वजह से यह सरकार मानती है कि ईज आॅफ डूइंग बिजनेस रिपोर्ट में भारत 100वें स्थान पर आ पाया है. इस सरकार के आने के पहले भारत की ‘ईज आॅफ डूइंग बिजनेस रैकिंग’ 140 के आसपास रहा करती थी. हालांकि, इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए जो आंकड़े लिए गए हैं और जिन सुधारों को इसका आधार बनाया गया है, उसका श्रेय मोदी सरकार को जाता है या नहीं, इसे लेकर विवाद है. लेकिन यह एक तथ्य है कि इसमें भारत की रैंकिंग सुधरी है.

लेकिन क्या कारोबारी वर्ग मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल से खुश है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में कपड़े का कारोबार करने वाले मनीष अग्रवाल कहते हैं, ‘नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से कारोबारी माहौल तो सुधरा. छोटे-बड़े हर तरह के कारोबारियों में यह आत्मविश्वास आया कि उनकी समस्याओं को इस सरकार में सुना जाएगा और उसका समाधान भी किया जाएगा. लेकिन यह माहौल शुरुआत के दो साल ही रहा. नोटबंदी के बाद से कारोबारी माहौल खराब होने लगा. नोटबंदी से सोने-चांदी के कारोबारियों को तो काफी लाभ हुआ लेकिन दूसरे कारोबार पर इसका निगेटिव असर पड़ा. इससे कारोबारी वर्ग उबर भी नहीं पाया था कि जीएसटी की मार पड़ गई. जीएसटी लागू हुए साल भर होने को हैं लेकिन इसके जुड़े झंझटों की वजह से छोटे और मझोले कारोबारियों को काफी दिक्कतें हो रही हैं.’

कारोबारियों से बात करने पर नोटबंदी और जीएसटी को लेकर उनमें साफ तौर पर असंतोष और गुस्सा दिखता है. इन सभी का मानना है कि इन दोनों निर्णयों से अर्थव्यवस्था को क्या फायदा हुआ, यह तो अभी मालूम नहीं लेकिन कारोबारियों को काफी नुकसान हुआ है. भाजपा से नजदीकी संबंध रखने वाले सूरत के एक कपड़ा कारोबारी बताते हैं कि जीएसटी लागू होने के बाद इतनी जटिलताएं पैदा हो गईं कि कई कारोबारियों ने कपड़े का उत्पादन ही बंद कर दिया था. ‘वो तो भला हो गुजरात चुनाव का जिसकी वजह से कई जटिलताओं को केंद्र सरकार ने खत्म किया और सूरत के कपड़ा कारोबारियों को जीवनदान दिया.’

कुछ कारोबारियों की यह शिकायत भी है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में कर अधिकारियों की ताकत काफी बढ़ गई है. कारोबारियों का कहना है कि ये अधिकारी छोटे और मझोले कारोबारियों को कर नियमों के पालन के नाम पर काफी परेशान कर रहे हैं और इन अधिकारियों के खिलाफ शिकायत करने पर सरकार में कहीं कोई कार्रवाई नहीं हो रही है. इससे भी उन्हें दिक्कत हो रही है.

मूलतः महाराष्ट्र के रहने वाले और दिल्ली में सोना-चांदी का व्यापार करने वाले एक कारोबारी इस बारे में कहते हैं, ‘जब मोदी सरकार पहले इनकम डेकलरेशन स्कीम और बाद में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना लेकर आई तो इसमें लोगों ने खुद से आगे बढ़कर अपने पैसों की घोषणा नहीं की. इसके बाद आयकर अधिकारी सक्रिय हो गए. इन लोगों ने कारोबारियों पर कई तरह से दबाव बनाकर उन्हें एक रकम की घोषणा करने को बाध्य किया. मुझ पर अधिकारियों ने दस करोड़ रुपये की घोषणा करने का दबाव बनाया. अंत में मुझे 70 लाख रुपये की घोषणा प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत करनी पड़ी.’ वे कहते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया में आयकर अधिकारियों ने कारोबारियों से खूब पैसे वसूले.

यह पूछे जाने पर क्या इस स्थिति में कारोबारी अगले लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी का साथ नहीं देंगे, अधिकांश कारोबारी विकल्पहीनता की बात करते हैं. मनीष अग्रवाल कहते हैं, ‘केंद्र में मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार होने से प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति ठीक बनी हुई है. आम तौर पर जहां भी भाजपा की सरकार होती है, वहां कानून-व्यवस्था ठीक रहती है. कारोबारियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज यही है. बाकी दिक्कतों का तो फिर भी कारोबारी सामना कर लेते हैं. कारोबारी विजन के लिहाज से भी राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प नहीं दिखता.’ दूसरे कारोबारी भी घूमा-फिराकर इस सवाल का जो जवाब देते हैं, उसका लब्बोलुआब यही होता है.

इसका संकेत साफ है कि मोदी सरकार से थोड़ी नाराजगी के बावजूद देश के कारोबारी वर्ग को नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प अभी नहीं दिख रहा है. ऐसे में जब तक जीएसटी-नोटबंदी जैसा कोई और झटका न लगे, उम्मीद की जा सकती है कि यह वर्ग अगले लोकसभा चुनावों में भी नरेंद्र मोदी और भाजपा के साथ ही रहने वाला है.