कठुआ, उन्नाव और सूरत की घटनाओं के बाद अब एक नाबालिग से बलात्कार के दोषी आसाराम को मिली सजा से पश्चिमी जगत की बांछें एक बार फिर खिल गई हैं. एक बार फिर एक सुर में ऐसा स्वांग भरा जा रहा है जैसे ऐसे घिनौने कुकर्म केवल भारत जैसे घटिया देश में ही हो सकते हैं. बाक़ी दुनिया - विशेषकर यूरोप-अमेरिका - मानो दूध के धुले इतने पाक़-साफ़ हैं, कि उनके यहां ऐसा कुछ होने की कल्पना तक नहीं की जा सकती.

उदाहरण के लिए, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की फ्रांसीसी अध्यक्ष क्रिस्टीन लगार्द ने यह कहना ज़रूरी समझा कि ‘भारत में जो कुछ हुआ वह दुर्भाग्यपूर्ण है. मुझे उम्मीद है कि नरेंद्र मोदी और अन्य पदाधिकारी महिलाओं की सुरक्षा की तरफ और ज्यादा ध्यान देंगे. भारत में इसकी जरूरत भी है.’ सुश्री लगार्द भूल गयीं कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के जिस ऊंचे पद पर वे आज बैठी हैं, उसी पद पर, एक नवंबर 2007 से 18 मई 2011 तक, उन्हीं के देश के जो जाने-माने सोशलिस्ट नेता दोमिनीक श्त्राउस-कान विराजमान थे, उन्हें एक होटल की महिला कर्मचारी के साथ बलात्कार के आरोप में ही अपना पद गंवाना पड़ा था.

राष्ट्रपति बन सकते थे, पहुंच गये हिरासत में

श्त्राउस-कान 1997 से 1999 तक फ्रांस के अर्थ और वित्त मंत्री भी रह चुके थे. प्रबल संभावना थी कि 2012 में वे फ्रांस के राष्ट्रपति चुने जाते. पर, ऐसा नहीं हो सका. 18 मई 2011 वाले दिन अमेरिकी पुलिस ने न्यूयॉर्क में उन्हें गिरफ्तार कर लिया. वे जिस होटल में ठहरे थे, वहां कमरे की साफ़-सफ़ाई करने वाली एक अफ्रीकी महिला कर्मचारी ने अपने साथ बलात्कार का उन पर आरोप लगाया था. ज़रा सोचिये! जो व्यक्ति अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का सर्वोच्च पदाधकारी था, फ्रांस का अगला राष्ट्रपति बन सकता था, वह साफ़-सफ़ाई करने वाली एक महिला के साथ बलात्कार के प्रयास में गिरफ्तार हो जाता है! तिस पर तुर्रा यह कि उसकी उत्तराधिकारी भारत के प्रधानमंत्री से कहती है कि ‘महिलाओं की सुरक्षा के प्रति ज्यादा ध्यान दें.’

श्त्राउस-कान को क़रीब तीन महीने पुलिस की हिरासत तथा घर के भीतर नज़रबंदी में रहना पड़ा. एक गोपनीय आपसी समझौते के आधार पर उन्हें रिहाई मिली. एक टेलीविज़न इंटरव्यू में उन्होंने माना कि होटल की उस महिला कर्मचारी के साथ उनके ‘अवैध संबंध’ थे. दोमिनीक श्त्राउस-कान अपनी कामुकता के लिए जाने जाते थे. लेकिन, तब उन्हें या अपने देश के अन्य नेताओं को सुश्री लगार्द ने वैसे कोई सलाह नहीं दी, जैसी वे आज भारत के प्रधानमंत्री को देना उचित समझती हैं.

ऐसा भी नहीं है कि श्त्राउस-कान प्रकरण के साथ फ्रांस में महिलाओं और लड़कियों के साथ बलात्कार, दुराचार या कामुकतापूर्ण यौनशोषण का अंत हो गया है. बल्कि स्थिति तो यह है कि यूरोपीय संघ में जर्मनी के बाद के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण देश फ्रांस में लड़कियों और महिलाओं के साथ यौनहिंसा की प्रवृत्ति शोचनीय बन गयी है.

हर आठ में से एक महिला बलात्कार की शिकार

फरवरी 2018 में प्रकाशित एक सबसे नवीनतम सर्वेक्षण से सामने आया कि फ्रांस की औसतन हर आठ मे से एक महिला (12 प्रतिशत, कुल 40 लाख) को अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार तो रतिक्रिया की सीमा तक के (पेनिट्रेटिव) बलात्कार का शिकार होना ही पड़ता है. इस तरह की महिलाओं में 31 प्रतिशत का बलात्कारी उनका अपना ही पति या जीवनसंगी था. 19 प्रतिशत का बलात्कारी उनके परिचितों में से कोई था और और 17 प्रतिशत का कोई अपरिचित था. 58 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि उनके साथ यौन-दुराचार हुआ और 43 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें कामुकतापूर्ण ढंग से सहलाया गया. उन महिलाओं की संख्या भी 50 प्रतिशत तक थी, जिन्हें शाब्दिक अपमान या कामुक फ़ब्तियों का निशाना बनाया गया. अधिकतर को अपने साथ कई बार दुराचार झेलना पड़ा.

वास्तव में, क्रिस्टीन लगार्द के फ्रांस में लड़कियों और महिलाओं की स्थिति शोचनीय ही नहीं, इतनी अधिक शोचनीय है कि राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों को, महिलाओं के साथ हिंसा-विरोधी 25 नवंबर 2017 वाले अंतरराष्ट्रीय दिवस पर, इस बारे में अपने आवास में एक अलग सभा बुलानी पड़ी.

समाज कामुकता से बीमार

सभा में दुख प्रकट करते हुए राष्ट्रपति माक्रों ने कहा, “हमारा समाज कामुकता से बीमार है,” यह बेबाक स्वीकारोक्ति सबके लिए बहुत चौंकाने वाली थी. उन्होंने कहा कि फ्रांस में यौन-अपराध भयावह होते जा रहे हैं, औसतन हर तीन दिन पर, कोई न कोई महिला अपने जीवनसाथी की हिंसा के कारण दम तोड़ बैठती है.

राष्ट्रपति-भवन ‘एलिज़े पैलेस’ में आयोजित इस सभा में उन्होंने इस समस्या से लड़ने के लिए एक ऐसी कार्ययोजना (ऐक्शन प्लान) की घोषणा की, जिसके अधीन कुछ नये कठोर क़ानून भी बनाये जायेंगे. भाषण से पहले उन्होंने और आमंत्रित लोगों ने उन 123 महिलाओं की याद में एक मिनट का मौन रखा, जो 2016 में अपने मौजूदा या पिछले जीवनसाथी के हाथों मारी गयीं.

फ्रांस में नारी-समानता के लिए अलग मंत्रालय

फ्रांस में स्त्री-पुरुष समानता के लिए एक अलग से मंत्रालय है. राष्ट्रपति माक्रों ने ऐलान किया कि इस मंत्रालय के बजट में 13 प्रतिशत की वृद्धि की जायेगी. ऐलान और भी हुए. जैसे नारी-समानता की विभिन्न योजनाओं के लिए 2018 से 42 करोड़ यूरो अलग से आवंटित किये जायेंगे. यौन-अपराधों से बचाव को ध्यान में रखते हुए सरकारी स्कूलों के बच्चों और किशोरवय छात्रों के लिए यौनशिक्षा के नये पाठ्यक्रम शुरू किये जायेंगे. राष्ट्रपति माक्रों ने बताया कि एक नया कानून बनाकर राह चलती लड़कियों और महिलाओं के साथ छेड़ख़ानी या अभद्र छींटाक़शी को भी दंडनीय अपराध बना दिया जायेगा. उनका यह भी कहना था कि इस अभियान को आगे बढ़ाते हुए वयस्कों के लिए भी नैतिक शिक्षा के कोर्स चलाये जायेंगे. साथ ही, महिलाओं के प्रति हिंसाभाव उकसाने वाले इंटरनेट-वीडियो वगैरह पर कड़ी नज़र रखी जायेगी.

कामुकता की प्रचुरता

राष्ट्रपति माक्रों ने माना कि फ्रांसीसी समाज कामुकता से बीमार है, पर यह नहीं बताया कि यह अति कामुकता आती कहां से है? जो लोग फ्रांस को जानते हैं, वे यह भी जानते हैं कि फ्रांसीसी कला, संगीत, साहित्य और फ़िल्मों में कामवासना की सदा प्रचुरता रही है. इस प्रचुरता का लोगों की मानसिकता और जीवन-शैली पर प्रभाव पड़ना भी स्वाभाविक ही है. रही-सही कमी इंटरनेट पर उपलब्ध अश्लील वीडियो पूरी कर दे रहे हैं. बच्चों का अश्लील यौन-ज्ञान तो बड़ों से भी बढ़-चढ कर है.

लेकिन, बात जब बलात्कारों की आती है तो फ्रांस सहित यूरोप के क़रीब हर देश में ‘भारत के हिंदू समाज’ को कोसने-धिक्कारने और उसे ‘बलात्कारियों का देश’ सिद्ध करने की होड़-सी लग जाती है. इस बार पुर्तगाल के प्रधानमंत्री रह चुके और अब संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुतेरेस ने भी इस होड़ में शामिल होते हुए कठुआ की बलात्कारी हत्या को भयावह करार दे दिया.

कामुकता-केंद्रित पश्चिमी संस्कृति

कोई सुनने-समझने को तैयार नहीं है स्त्री-समाज का यौन-शोषण और बलात्कार के रूप में उसकी पराकाष्ठा भारतीय नहीं, फ़िल्मों, सेटेलाइट टीवी और इंटरनेट के माध्याम से अपनी स्वच्छंद जीवनशैली की नग्नता और अश्लीलता को घर-घर पहुंचाने वाली पश्चिमी संस्कृति की फैलायी हुई एक विश्वव्यापी बीमारी है.

भारतीय फ़िल्मों में चुंबन-आलिंगन के अभाव को यही पश्चिमी संस्कृति ‘दकियानूसी पिछड़ापन’ कह कर उसकी खिल्ली उड़ाया करती थी. अब, जबकि भारतीय फ़िल्म, कला और मीडिया जगत ने यह ‘दकियानूसी पिछड़ापन’ पीछे छोड़ दिया है, तो पश्चिम वाले कुपित हैं कि भारत में यौन-अपराध बढ़ रहे हैं. कहा जा रहा है कि भारतीय समाज को बदलना होगा. यदि भारतीय समाज को बदलना इतना सरल है और वही, न कि पश्चिम का सांस्कृतिक साम्राज्यवाद बीमारी की जड़ है, तो फिर स्वयं पश्चिम में यौन-अपराध, हत्या और बलात्कार भारत से कई गुना अधिक क्यों हैं? स्वयं पश्चिम अपना समाज बदल कर अपने यहां यौन-अपराधों और बलात्कारों का अंत क्यों नहीं कर देता? सूप बोले तो बोले, चलनी भी बोले, जिसमें बहत्तर छेद!

इस बीच यौन-अपराधों और बलात्कारों वाली यह बीमारी अमेरिका सहित यूरोपीय देशों में भी इतनी संक्रामक हो गयी है कि प्राइमरी स्कूल के बच्चे तक यौन-अपराध करने लगे हैं. उन्हें इसका बोध ही नहीं होता कि टेलीविज़न फ़िल्मों, इंटरनेट वीडियो या स्मार्ट फ़ोन की तस्वीरों में वयस्क जो क्रीड़ाएं करते दिखते हैं, वे हम बच्चों के लिए वर्जित, हानिकारक या अपराध क्यों हैं?

स्कूली बच्चों में भी यौन-हिंसा की प्रवृत्ति

फ्रांस के स्कूलों में यौन-हिंसा के प्रति आंख खोलने वाले नये पाठ्यक्रम शुरू करने की राष्ट्रपति माक्रों की कार्ययोजना इस बात की पुष्टि है कि लड़कियों और महिलाओं के साथ यौन-हिंसा वयस्कों के बीच ही नहीं, छोटे-छोटे स्कूली बच्चों के बीच भी भयावह आयाम धारण कर चुकी है.

स्थिति यह है कि जर्मनी और फ्रांस ही नहीं, सारा यूरोप दशकों से नारी-समानता की सौगंध खा रहा है, पर हर जगह असमानता-भरे दुराचार की दुर्गंध ही फैलती मिल रही है. 28 देशों और 50 करोड़ जनसंख्या वाले यूरोपीय संघ की एक ‘मौलिक अधिकार एजेंसी’ है, जिसे संक्षेप में ‘एफ़आरए’ कहते हैं. संघ के देशों में महिलाओं की स्थिति का आकलन करने के लिए उसने सभी 28 देशों की 18 से 74 वर्ष आयु के बीच की 42 हज़ार (हर देश में डेढ़ हज़ार) महिलाओं के बीच एक सर्वेक्षण किया. मार्च 2014 में प्रकाशित उसके नतीज़ों की सूची बड़ी लंबी और निराशजनक है. सबसे अधिक चौंकाने वाले कुछ तथ्य और आंकड़े इस प्रकार हैंः

यूरोपीय संघ में यौन-हिंसा की स्थिति

  •   42 हजार में से हर तीसरी महिला ने बताया कि उसे अपने 15वें जन्मदिन के बाद कम से कम एक बार शारीरिक या यौन-हिंसा या दोनों झेलनी पड़ी हैं.  
  •   हर 20वीं महिला (93 लाख) को कम से कम एक बार बलात्कार की वेदना सहनी पड़ी है. 12 प्रतिशत (2 करोड़ 10 लाख) को तो 15 साल की होने से पहले ही किसी वयस्क की हवश का शिकार होना पड़ गया.  
  • 22 प्रतिशत (4 करोड़ 18 लाख) को अपने जीवनसंगी की ओर से शारीरिक या बलात्कारी हिंसा झेलनी पड़ी. 43 प्रतिशत (7 करोड़ 15 लाख) को मानसिक यातना से गुज़रना पड़ा. दोनों प्रकार की 67 प्रतिशत पीड़िताओं ने पुलिस के पास कभी शिकायत नहीं की.
  •   33 प्रतिशत (6 करोड़ 13 लाख) को अपने बचपन में ही किसी वयस्क की ओर से शारीरिक प्रताड़ना या लैंगिक हिंसा का कटु अनुभव मिल गया.   
  •   11 प्रतिशत (1 करोड़ 85 लाख) को भद्दे ईमेल और एसएमएस भेज कर तंग किया गया.  
  •   32 प्रतिशत (6 करोड़ 8 लाख) ने कहा कि उन्हें अपने अधिकारियों, सहकर्मियों या ग्राहकों ने तंग किया.  
  •   अपने पति या संगी से इतर यौन-हिंसा झेल चुकी हर दसवीं महिला ने कहा कि उसे अपरिचित लोगों ने सामूहिक बलात्कार या शीलभंग का शिकार बनाया.

शिक्षा और खुशहाली यौन-हिंसा बढ़ाने वाली?

यूरोपीय संघ की इस ‘मौलिक अधिकार एजेंसी’ के व्यापक सर्वेक्षण से एक और चौंकाने वाला तथ्य भी सामने आया. इस पर शायद ही कोई विश्वास करेगा कि जिस देश का समाज जितना अधिक खुशहाल, उदारवादी और सुशिक्षित है, वहां महिला उत्पीड़न का अनुपात भी उतना ही अधिक है!

यूरोपीय संघ के देशों में स्वीडन. डेनमार्क, नीदरलैंड (हॉलैंड) और फ़िनलैंड इन तीनों कसौटियों के अलावा भ्रष्टाचार-मुक्त सुशासन में भी सबसे अग्रणी माने जाते हैं. इन देशों की 70 प्रतिशत से अधिक महिलाओं ने कहा कि 15 साल की उम्र के बाद कभी न कभी यौन-उत्पीड़न से उनका सामना हो ही गया. यूरोपीय संघ का सबसे उदार और सबसे समाज- कल्याणकारी देश कहलाने वाला स्वीडन, उत्पीड़न की 81 प्रतिशत शिकायतों के साथ पहले नंबर पर रहा. उसके बाद के स्थानों पर 70 प्रतिशत से अधिक शिकायतों के साथ क्रमशः डेनमार्क, फ्रांस, नीदरलैंड और फ़िनलैंड रहे. स्वीडन की संसद में 47 प्रतिशत महिलाएं बैठती हैं. देश के 22 मंत्रियों में से नौ महिलाएं हैं. तब भी, महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न के लिहाज से यूरोप में वही नंबर एक है,

ग़रीब बुल्गारिया में सबसे कम यौन-हिंसा

यूरोपीय संघ के इस सर्वेक्षण में उसके सबसे ग़रीब और कुशासित देशों में गिने जाने वाले बुल्गारिया को 24 प्रतिशत शिकायतों के साथ, सबसे अंतिम स्थान मिला. यानी, वहां महिलाओं का सबसे कम यौन-उत्पीड़न होता है! महिलाओं के साथ गंभीर क़िस्म की यौन-हिंसा के मामले में भी डेनमार्क, फ़िनलैंड और स्वीडन क्रमशः 52, 47 और 46 प्रतिशत के साथ प्रथम तीन स्थानों पर रहे. स्वीडन की विदेशमंत्री मार्गोट वालस्त्रौएम ने एक ट्वीट में लिखा कि उन्हें तो यूरोपीय संघ के शिखर सम्मेलनों तक में ‘जांघ पर हाथ रखने’ जैसी शरारतों का सामना करना पड़ा है. इससे यही संकेत मिलता है कि पश्चिम के सबसे सभ्रांत लोगों के बीच भी महिलाएं सबसे पहले कामवासना की ही चीज़ हैं.

यौन-उत्पीड़न की 35 प्रतिशत शिकायतों के साथ जर्मनी का नाम यूरोपीय सर्वेक्षण के मध्यक्रम में दिखायी पड़ता है. इटली, क्रोएशिया या बुल्गारिया जैसे देशों के नाम – जहां आर्थिक खुशहाली और शिक्षा का सूचकांक कहीं नीचे, पर कुशासन और भ्रष्टाचार का सूचकांक उतना ही ऊपर है – 30 प्रतिशत से भी कहीं कम अनुपात के साथ गंभीर क़िस्म की यौन-हिंसा के सबसे निचले क्रम में मिलते हैं. इसका अर्थ तो यही हुआ कि महिलाओं के साथ यौन-हिंसा या दुराचार एक ऐसी ऐय्याशी है, जिस का शौक ऊंची शिक्षा और मोटी आय वाले लोगों के लिये ही पालना सबसे सरल है.

स्वीडन बलात्कारों के नोबेल पुस्कार का दावेदार

सच तो यह है कि यदि बलात्कारों के लिए भी कोई नोबेल पुस्कार होता तो वह नोबेल पुरस्कारों के देश स्वीडन को ही मिल रहा होता. प्रति 10,000 निवासियों पर प्रतिवर्ष 53.2 बलात्कारों के साथ स्वीडन इस लिहाज से पूरे यूरोप में पहले नंबर पर और विश्व में दूसरे नंबर पर है. भारत में यह अनुपात केवल 2.6 है, तब भी उसे दुनिया के सबसे बलात्कारी देश के तौर पर बदनाम कर दिया गया है. भारत की जनसंख्या यदि एक अरब 30 करोड़ के बदले स्वीडन की ही तरह एक करोड़ से भी कम होती, तो उसका कोई नाम भी नहीं लेता. स्वीडन में 1975 में बलात्कार के केवल 421 मामले दर्ज किये गये थे, जबकि 40 साल बाद यह संख्या लगभग 16 गुना बढ़ कर 2014 में 6,620 हो गयी थी.

भारत में हम जिस इंग्लैंड-अमेरिका की भाषा और रहन-सहन पर मरते हैं, उनका रिकॉर्ड भी बहुत ही शर्मनाक है. इन दोनों देशों की सरकारें यौन-हिंसा के बारे में भरोसेमंद आधिकारिक आंकड़े प्रकाशित करने से बचती हैं. छह करोड़ 30 लाख जनसंख्या वाले ब्रिटेन के सरकारी अभियोक्ता कार्यालयों के महानिदेशक एलिसन साउन्डर्स ने ब्रिटिश दैनिक ‘गार्डियन’ को सितंबर 2016 में वहां की स्थिति की झीनी-सी झलक दी, साउन्डर्स ने बताया कि लड़कियों-महिलाओं के साथ घरेलू दु्र्व्यवहार, बलात्कार और मारने-पीटने जैसे अपराध, 2015-16 के दौरान, 10 प्रतिशत बढ़ कर 1,17,568 हो गये.

ब्रिटेन में सोशल मीडिया का आतंक

लेकिन, बलात्कार के केवल 4,643 मामले अदालतों तक पहुंचे, जिनके बल पर 2,689 फैसले सुनाये गये. इंटरनेट, सोशल मीडिया और अन्य तकनीकी माध्यमों द्वारा धौंस- धमकी देने, फ़ोटो या शब्दों द्वारा अपमानित और तंग करने जैसे मानसिक कष्ट पहुंचाने वाले मामले और भी तेज़ी से बढ़ रहे हैं, साउन्डर्स का कहना था कि इंटरनेट की आड़ लेकर बेझिझक ऐसे अपराध करना बहुत आसान हो गया है. यौन-अपराधों की जांच-पड़ताल सरकारी अभियोजकों के काम का क़रीब 20 प्रतिशत हिस्सा बन गाया है.

ब्रिटेन की स्थिति के बारे में ठोस सरकारी आंकड़ों के अभाव में इस समय जो भी आंकड़े उपलब्ध हैं, उनके आधार पर अनुमान लगाया गया है कि वहां हर एक लाख जनसंख्या पर साल भर में औसतन 24 से अधिक बलात्कार होते हैं. यह अनुपात भारत की तुलना में कम से कम नौ गुना अधिक है!

ब्रिटेन में भी सभी यौन-अपराध पुलिस के कानों तक नहीं पहुंचते. वहां भी ऊंचे तबकों के कैसे नामी लोग भी अपनी कामवासना को क़ाबू में नहीं रख पाते, इसका एक सबूत नवंबर 2017 में रक्षामंत्री सर माइकल फ़ैलन के त्यागपत्र से मिलता है. एक महिला रेडियो-पत्रकार ने आरोप लगाया था कि 2002 में, टोरी पार्टी के एक रात्रिभोज-सम्मेलन के समय, सर फ़ैलन ने कई बार उसके घुटने पर अपना हाथ रख दिया. महिला पत्रकार का का कहना था, ‘मैंने बिना किसी गुस्से के, नम्रतापूर्वक उनसे कहा कि यदि उन्होंने फिर यह हरकत की तो मैं उनके मुंह पर तमाचा जड़ दूंगी.’

अमेरिका में हर दिन 500 बलात्कार

ब्रिटेन की तरह अमेरिका में भी यौन-अपराधों के आंकड़े इधर-उधर से जुटाने पड़ते हैं, वे किसी एक ही स्रोत से नहीं मिलते. वहां के ‘राष्ट्रीय अपराध सर्वे’ (एनसीवीएस) की एक रिपोर्ट का कहना है कि 2008 में वहां हर दिन औसतन 500 महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहा था. 2005 में हर दिन औसतन तीन महिलाओं की हत्या हो रही थी. उस वर्ष कुल मिलाकर 1, 181 औरतें मार डाली गयीं. एक-तिहाई मौतों के लिए उनके पति या प्रेमी ज़िम्मेदार थे. इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अफ्रीकी मूल की अश्वेत अमेरिकी महिलाओं के साथ, श्वेत अमेरिकी महिलाओं की अपेक्षा, 35 प्रतिशत अधिक यौन-हिंसा होती है.

‘एनसीवीएस’ का ही यह भी कहना है कि 2006 में अमेरिका में महिलाओं के साथ बलात्कार और यौन-उत्पीड़न के कुल 2,32,960 ऐसे भी मामले हुए जिनकी पुलिस के पास कोई शिकायत नहीं पहुंची. इन सब आंकड़ों के बारे में सोचते समय याद रखना ज़रूरी है कि कि अमेरिका की 32 करोड़ जनसंख्या भारत की एक अरब 30 करोड़ जनसंख्या के केवल एक-चौथाई के बराबर है. भारतीय मीडिया की ही तरह विदेशी मीडिया की भी आदत-सी बन गयी है कि जनसंख्या बताये बिना वे भारत जैसे भीम की तुलना ब्रिटेन या बेल्जियम जैसे बौनों से करने लगते हैं.

हर पांच में से एक छात्रा का बलात्कार हो सकता है

अमेरिका में जो महिलायें 20 से 24 साल उम्र की हैं, उनके साथ घरेलू यौन-हिंसा होने का ख़तरा सबसे अधिक पाया गया है. जो 24 साल या उससे कुछ कम की हैं, उनके साथ बलात्कार होने की संभावना सबसे अधिक होती है. अमेरिका के न्याय विभाग (डिपार्टमेंट ऑफ़ जस्टिस) का आकलन है कि अपने कॉलेज के दिनों में हर पांच में से एक छात्रा को बलात्कार हो जाने या उसके प्रयास के कटु अनुभव से गुज़रना पड़ेगा. इस अनुभव को झेल चुकी पांच प्रतिशत छात्राएं भी पुलिस के पास शिकायत करने नहीं जायेंगी! 2015 में अमेरिका के 27 विश्वविद्यालयों में किये गये एक अध्ययन से सामने आया कि ग्रेजुएशन कर रही 23 प्रतिशत छात्राएं अपने साथ यौन-हिंसा प्रेरित बलप्रयोग या कामुकतापूर्ण दुर्व्यवहार झेल चुकी थीं.

यूरोप और अमेरिका से हट कर यदि विश्व-स्तर पर देखा जाये, तो केवल पांच करोड़ 30 लाख की जनसंख्या वाले दक्षिण अफ्रीका का नाम महिलाओं के साथ बलात्कार और य़ौन-हिंसा की संयुक्त राष्ट्र सूची में हर साल पहले नंबर पर मिलता है. वहां हर साल 64,000 से अधिक बलात्कार होते हैं – प्रति एक लाख जनसंख्या पर 115 बलात्कार. महिला यौन-उत्पीड़न के अन्य प्रकारों के आंकड़े तो और भी भयावह होंगे. जनसंख्या में दक्षिण अफ्रीका से 24.5 गुना बड़े भारत के राष्ट्रीय अपराध कार्यालय ने 2014 में बलात्कार के 34,651 मामले दर्ज किये थे.

यौन-अपराध और संयुक्त राष्ट्र

ऑस्ट्रिया की राजधानी वियेना में संयुक्त राष्ट्र का क़रीब 500 कर्मचारियों वाला एक ऐसा कार्यालय है जिसका काम है मादक द्रव्यों और हर प्रकार के अपराधों से संबंधित जानकारियां जमा करना और उनका अध्ययन करना. ‘यूअनओडीसी’ (यूनाइटेड नेशन्स ऑफ़िस ऑन ड्रग्स ऐन्ड क्राइम) नाम का यह कार्यालय यौन-अपराधों की भी खोज-ख़बर रखता है. संयुक्त राष्ट्र के हर सदस्य देश से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने यहां होने वाले यौन-अपराधों के बारे में भी नवीनतम जानकारियां दिया करें. पर, मुश्किल से आधे सदस्य देश ही इस पर ध्यान देते हैं.

‘यूअनओडीसी’ का कहना है कि क़रीब 140 देशों ने घरेलू हिंसा के बारे में भी क़ानून बनाये हैं और 144 देशों में यौन-उत्पीड़न की रोकथाम के भी क़ानून हैं, पर ज़रूरी नहीं है कि ये क़ानून अंतरराष्ट्रीय मानदंडों पर खरे उतरें या उन पर ईमानदारी से अमल होता है. 37 देश ऐसे हैं जो अपनी पत्नी के साथ बलात्कार करने पर या किसी दूसरी स्त्री के साथ बलात्कार करने के बाद उससे विवाह कर लेने पर, बलात्कारी पुरुष को क़ानूनी कार्रवाई से छूट देते हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के नवीनतम अनुमान

ऐसे ही लचर क़ानूनों और पैसे वालों, बाहुबलियों और सत्ताधारियों के निहित स्वार्थों के चलते सारी दुनिया में महिलाओं के साथ बलात्कारों, उनकी हत्याओं और शोषण-उत्पीड़न के अपराधों की बाढ़-सी आ गयी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा प्रकाशित नवीनतम अनुमानों में कहा गया है कि हर तीन में से एक (35 प्रतिशत) महिला, अपनों ही या ग़ैरों के हाथों शारीरिक या यौन हिंसा झेल चुकी है. उसके बाकी अनुमान इस तरह हैं:

  •   महिलाओं की दुनिया भर में होने वाली 38 प्रतिशत हत्याएं उनका पुरुष पति या प्रेमी ही करता है. उच्च आय वाले देशों में यह प्रवृत्ति 23.2 प्रतिशत और कम आय वाले दक्षिणपूर्व एशियाई क्षेत्र में 37.7 प्रतिशत है.  
  •   अपने जीवनसाथी की हिंसा झेल चुकी महिलाओं के अवसाद (डिप्रेशन) ग्रस्त हो जाने की संभावना दो गुनी और उन्हें एड्स रोग हो जाने की संभावना डेढ़ गुनी बढ़ जाती है.    
  •   बाल विवाह भी यौन-उत्पीड़न है. दुनिया भर की इस समय जीवित 75 करोड़ लड़कियों की शादी 18 साल की आयु से पहले ही कर दी गयी.  
  •   दुनिया की 12 करोड़ लड़कियों (हर 10 में से एक) को कभी न कभी सहवास या किसी यौनक्रीड़ा के लिए बाध्य किया गया.  
  •   खतने की प्रथा वाले 30 देशों में कम से कम 12 करोड़ औरतों और लड़कियों को अधिकतर उस समय गुप्तांग के ख़तने की पीड़ा भुगतनी पड़ी जब, उनकी आयु पांच साल से कम थी. कुछ की आयु तो केवल कुछ महीने ही थी.  
  •   मानव-तस्करी के शिकारों में 71 प्रतिशत अनुपात औरतों व अवयस्क लड़कियों का होता है. इस तरह की हर चार में से तीन लड़कियों या औरतों से वेश्यावृत्ति करवाई जाती है.

हॉलीवुड अभिनेत्रियों की गुहार

अदनी ही नहीं, हॉलीवुड की प्रसिद्ध अभिनेत्रियां और यूरोपीय संसद की महिला सांसदों जैसी बिरली महिलाएं भी, अक्टूबर 2017 से, गुहार लगा रही हैं कि उन्हें भी महिला होने के नाते यौन-उत्पीड़न भुगतना पड़ा है. अमेरिका के ‘द न्यूयॉर्क टाम्स’ और ‘द न्यूयॉर्कर’ ने अक्टूबर 2017 में भंडाफोड़ किया था कि हॉलीवुड के सबसे बड़े और जाने-माने फ़िल्म-निर्माता, हार्वे वाइनस्टीन, अपनी फ़िल्मों की अभिनेत्रियों के साथ यौन-दुराचार करते हैं. इन दुराचारों की पहली ख़बर छपते ही ऐसी दर्जनों अभिनेत्रियां और अन्य महिलाएं खुल कर सामने आयीं, जो वाइनस्टीन की तिकड़मों, उत्पीड़नों और बलात्कारों की भुक्तभोगी रह चुकी हैं.

इस घटना ने ट्विटर पर ‘मी टू’ (मैं भी) नाम से एक ऐसे हैशटैग को जन्म दिया, जिसका इस्तेमाल करते हुए स्वीडन की विदेशमंत्री और यूरोपीय संसद की महिला सांसदों से लेकर महिला वैज्ञानिकों, कलाकारों, पत्रकारों इत्यादि तक हज़ारों महिला भुक्तभोगियों ने अपनी आपबीतिया्ं पोस्ट की हैं.

महिला सांसद मानसिक यौन-हिेंसा झेलती हैं

विश्व के विभिन्न देशों की संसदों के सदस्यों की ‘अंतर संसदीय यूनियन’ (इंटर पार्लियामेंटरी यूनियन) ने पांच अलग-अलग भूखंडों के 39 देशों में महिला सांसदों के अनुभवों का अध्ययन किया. अध्ययन में भाग लेने वाली 82 प्रतिशत महिला सांसदों ने कहा कि अपने संसदीय कार्यकाल में उन्हें भी अपने प्रति मानसिक हिंसा के किसी न किसी रूप को झेलना पड़ा. यह हिंसा पुरुष सांसदों की ओर से किसी भद्दी टिप्पणी, भाव-भंगिमा, इशारेबाज़ी, घेराव या धमकी के रूप में थी.

कहने की आवश्यकता नहीं कि यौन-हिंसा या य़ौन-उत्पीड़न के अनगिनत रूप-स्वरूप हैं और हर कोई यह हिंसा करने के सक्षम है. चिंता का विषय यह है कि जब नेता, अभिनेता और क़ानून बनाने वाले सांसद भी यौन-उत्पीड़न के परपीड़ासुख से मुक्त नहीं कहे जा सकते तो फिर पीड़ितों को कौन और कैसे मुक्ति देगा?

लड़कियों और महिलाओं के यौन-उत्पीड़न का वैश्विक आयाम वास्तव में जितना विशाल और भयावह है, उसके प्रति चेतना और जानकारी उतनी ही क्षुद्र और हास्यास्पद है. उत्पीड़ित महिलाओं का ही जीवन नरक नहीं बन जाता, उनकी मर्मांतक पीड़ा की छाया में पले बच्चों के भावी विकास का भी बेड़ा ग़र्क हो जाता है.