हाल ही में कठुआ, उन्नाव और सूरत में हुए बलात्कारों पर देश भर में आक्रोश देखने को मिला. इसके बाद केंद्र सरकार ने 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार करने वालों को मौत की सजा देने का अध्यादेश पारित किया. साथ ही इसमें 12 से 16 साल की उम्र की किशोरियों से बलात्कार की सजा को 10 से बढ़ाकर 20 और 16 साल से ज्यादा उम्र की लड़कियों या महिलाओं से बलात्कार की सजा को सात से बढ़ाकर 10 साल कर दिया गया है.

इस कानून को बच्चियों की सुरक्षा के लिहाज से मील का पत्थर माना जा रहा है. लेकिन क्या इससे यह समस्या खत्म हो सकेगी? आंकड़ों के हिसाब से बात करें तो पता चलता है कि तमाम तरह के सख्त कानून बनने के बाद भी भारत में बलात्कार की घटनाएं लगातार बढ़ती ही जा रही हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार 2015 में बच्चियों से बलात्कार के जहां लगभग 11 हजार मामले दर्ज हुए थे तो 2016 में यह आंकड़ा 20 हजार हो गया. बलात्कार, हत्या, यौन शोषण, एसिड हमला और दहेज़ प्रताड़ना जैसे किसी भी अपराध में कड़े कानून बनने के बाद भी कोई कमी नहीं आई बल्कि उल्टे बढ़ोतरी ही हो रही है.

चारों तरफ स्त्री को ‘यौन वस्तु’ के रूप में पेश करने और पुरुष की यौनेच्छा को बढ़ाने के लिए जितने इंतजाम किये गए हैं, उन सबका बलात्कार के बढ़ते प्रतिशत से सीधा संबंध है  

ऐसे में इस बात की उम्मीद न के बराबर ही है कि मौत की सजा बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाओं को कम कर देगी. असल में हम सभी बलात्कार को सिर्फ एक समस्या के तौर पर ही देख रहे हैं. नि:संदेह बलात्कार अपने आप में गंभीर समस्या तो है ही, लेकिन उससे भी ज्यादा यह ‘समस्याओं का परिणाम’ है. बलात्कार जैसी अमानवीय समस्या को खत्म करने के लिए उसे समस्या से ज्यादा ‘समस्याओं के परिणाम’ के तौर पर देखे जाने की सख्त जरूरत है.

पहले उन समस्याओं पर गौर करते हैं जिनका परिणाम बलात्कार है. पहली समस्या है कि समाज में स्त्री को ज्यादातर ‘मजा देने वाली’ और ‘संतुष्ट करने वाली देह’ यानी ‘यौन वस्तु’ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है. बाजारीकरण ने स्त्री को यौन वस्तु के रूप में बदलने में पूरी ताकत लगाई है. अखबारों, पत्रिकाओं और टीवी में आने वाले विज्ञापन, फिल्में, अश्लील गाने, साहित्य, समाचार, फोटो, फिल्मी संवाद, इंटरनेट हर जगह स्त्री को देह के रूप में परोसा जा रहा है. यहां तक कि बच्चों के कार्टूनों तक में महिला पात्रों की सामान्य के बजाए सेक्सी छवि ही दिखाई जाती है.

दूसरी समस्या है पुरुषों की यौनेच्छा हद से ज्यादा बढ़ना. आइटम नंबरों पर नाचने वाली नायिकाएं और फिल्मों-विज्ञापनों में निहायत गैरजरूरी देहप्रदर्शन करती स्त्रियां पुरुष दर्शकों और श्रोताओं की पहले से ही बेलगाम कामेच्छा को और भी ज्यादा उकसाने में लगी हैं. इंटरनेट पर पोर्न और अस्वस्थ सेक्स की अथाह सामग्री मौजूद है, जो हर क्षण बढ़ती ही जा रही है. उधर, इसके खतरों से आगाह करने वाली व्यवस्था न के बराबर दिखती है.

चारों तरफ स्त्री को ‘यौन वस्तु’ के रूप में पेश करने और पुरुष की यौनेच्छा को बढ़ाने के लिए जितने इंतजाम किये गए हैं, उन सबका बलात्कार के बढ़ते प्रतिशत से सीधा संबंध है. इन्हीं सब चीजों का नतीजा है कि सेक्स की मांग बेतहाशा तरीके से बढ़ गई है. इसकी पूर्ति की भी सीमा है. किशोरों, लड़कों और पुरुषों की बढ़ी हुई यौनेच्छा को पूरा करने के लिए, समाज द्वारा यौनेच्छा की पूर्ति के लिए किये गए विवाह और वेश्यावृत्ति जैसे इंतजाम बहुत कम पड़ते हैं.

इसी कारण बेकाबू हुई यौनेच्छा से ग्रसित पुरुष आसान शिकार ढूंढ़ते रहते हैं. कई बार तो वे परिवार और रिश्तेदारी में मौजूद छोटे-छोटे बच्चों को भी शिकार बना लेते हैं. यानी स्त्री की ‘यौन वस्तु की छवि’ और पुरुष की ‘बेलगाम यौनेच्छा’ का परिणाम सिर्फ बलात्कार के रूप में ही सामने नहीं आ रहा है, बल्कि यह बाल यौन शोषण को भी खतरनाक तरीके से बढ़ा रहा है. ज्यादातर पुरुष कोई भी तरीका अपनाकर अपनी बेलगाम हुई यौनेच्छा को शांत करने में लगे हैं. लेकिन वह अतृप्त इच्छा पूरी नहीं होकर और भी ज्यादा बेकाबू ही हो रही है.

यदि समाज सच में स्त्रियों के प्रति बढ़ते बलात्कार और यौन हिंसा से चिंतित है, तो उसे स्त्री को यौन वस्तु के रूप में दिखाने वाली हर एक चीज का सख्त विरोध तत्काल प्रभाव से करना पड़ेगा  

असल में एक किशोर इंटरनेट, फिल्म, विज्ञापन तथा पोर्न आदि सभी जगहों में स्त्रियों को जिस तरह से देखता है, तो उससे उनके मन में स्त्री की पहली छवि ‘यौन वस्तु’ के रूप में ही बननी शुरू होती है. किशोर से पुरुष बनने की प्रक्रिया में शायद ही कभी वे लड़की को अपनी साथी के रूप में देखते-समझते हैं. स्त्री का साथी रूप सबसे ज्यादा आनंदकारी है, ऐसा कोई ख्याल उन्हें छूता भी नहीं क्योंकि अक्सर ही ऐसी चीजें किशोरों को समाज में देखने को नहीं मिलतीं जिनसे वे महसूस करें कि लड़कियां भी उनकी ही तरह इंसान हैं, उनकी साथी हैं. इसलिये वे उनके साथी नहीं बनना चाहते, बल्कि सिर्फ उन्हें भोगना चाहते हैं. इसके लिए तरह-तरह के रिश्तों के जाल बुनते जाते हैं या फिर बलात संबंध बनाते हैं. निःसंदेह अपवाद भी हैं, लेकिन पुरुषों का एक बड़ा हिस्सा, लड़कियों/स्त्रियों को अक्सर ही भोगना चाहता है. देश-दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों से जब-तब आतीं यौन शोषण की अंतहीन खबरें इस बात की पुष्टि करती हैं.

उपभोक्तावाद, बाजारवाद और असीमित लाभ की प्रवृत्ति ने मिलकर जो माहौल बनाया है वह स्त्री-पुरुष को परस्पर एक-दूसरे का सहयोगी समझने की बजाए, पुरुषों को स्त्री को भोगने के लिए उकसा ज्यादा रहा है. इसलिए अपराधी और सजा का हकदार सिर्फ बलात्कारी नहीं है. अपराधी वे तमाम तरीके हैं जो पुरुष की यौनेच्छा को बेलगाम करने की जमीन तैयार कर रहे हैं, जो स्त्री को यौन वस्तु के रूप में पेश कर रहे हैं, जो अपराधी को अपराधबोध से बचा रहे हैं और पीड़िता को अपराधबोध में डाल रहे हैं...और वे भी, जो खुली आंखों देख कर भी अपराधी को बचाने के लिए हर बार ‘सबूत नहीं है-सबूत नहीं है’ चिल्ला रहे हैं.

इसलिए यदि समाज सच में स्त्रियों के प्रति बढ़ते बलात्कार और यौन हिंसा से चिंतित है, तो उसे स्त्री को यौन वस्तु के रूप में दिखाने वाली, सेक्समय माहौल बनाने वाली और यौन कुंठा को बढ़ाने वाली हर एक चीज का सख्त विरोध तत्काल प्रभाव से करना पड़ेगा. दोनों हाथ में लड्डू में नहीं रह सकते. ऐसा नहीं हो सकता कि अतृप्त यौनेच्छा को सहलाने के लिए हर किस्म की मादकता भी आंखों के सामने रहे और घर की स्त्रियां भी सुरक्षित रहें. किसी एक को चुना होगा और चुने हुए को लागू करना-कराना होगा.

क्या बलात्कार के खिलाफ जब-तब बड़े-बड़े प्रदर्शन करने वाले पोर्न सामग्री, अश्लील गानों, उत्तेजित करने वाले विज्ञापनों, और ऐसी तमाम सामग्रियों के विरोध में भी तत्काल खड़ा होने का साहस करेंगे? उपेक्षा और अनुपयोग अकेले ऐसे हथियार हैं जो किसी भी चीज का अस्तित्व खतरे में डाल सकते हैं. क्या हम हर उस चीज की उपेक्षा करने को तैयार हैं जो स्त्री को भोग की वस्तु की तरह दिखा-बता रही है और समाज में सेक्समय माहौल बना रही है?

असल में समाज लगातार बलात्कारी पैदा होने से रोकने की अपनी विफलता का मातम सरकार, पुलिस और न्याय व्यवस्था को कोसकर बखूबी मना रहा है. पर क्या कोई उससे पूछने वाला है कि बलात्कारी पैदा होने से रोक पाने के लिए उसने अपने स्तर पर क्या, कितने और कैसे प्रयास किये. समाजशास्त्रियों का प्रबल विश्वास है कि जब तक समाज की इस यौन कुंठा और सेक्समय माहौल को कम नहीं किया जाएगा तब तक सिर्फ सजा का डर दिखाकर इसमें हो रहे यौन अपराधों की संख्या कम करना जरा भी संभव नहीं है.