केंद्र सरकार ने जस्टिस केएम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश नियुक्त करने की कॉलेजियम की सिफारिश पुनर्विचार के लिए वापस भेज दी है. जैसा कि मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) दीपक मिश्रा कह चुके हैं, यह सरकार का अधिकार है. हालांकि सरकार का यह कदम न्यायपालिका की स्वस्थ कार्यप्रणाली और सरकार से उसके स्वतंत्र अस्तित्व से जुड़े मसलों पर कई चिंताएं पैदा करने वाला है.

कॉलेजियम ने इस साल जनवरी के दौरान सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति के लिए दो नामों की सिफारिश की थी, जिनमें से उत्तराखंड हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जोसेफ का नाम सरकार ने मंजूर नहीं किया है. सरकार का यह फैसला असामान्य है और इसकी एक वजह तो यही है कि उसने सिफारिश भेजे जाने के तीन महीने बाद इस पर फैसला किया. सरकार की तरफ से अपने इस फैसले के पक्ष में कुछ और जजों की वरिष्ठता और शीर्ष न्यायालय में विविधता कायम रखने की दलील दी गई है. लेकिन इन दलीलों में कोई दम नहीं है क्योंकि उच्च न्यायालय में नियुक्ति रोकने के लिए इनको आधार नहीं बनाया जा सकता.

2016 में केएम जोसेफ ने उत्तराखंड से राष्ट्रपति शासन हटाकर कांग्रेस की सरकार बहाल की थी. इस वजह से अगर सुप्रीम कोर्ट में उनकी नियुक्ति में अडंगा लगाने की कोशिश को उनके लिए कोई इशारा समझा जाए तब तो यह कवायद और भी चिंताजनक है. एक तरह से यह सभी जजों को संकेत है कि सरकार के लिए असुविधाजनक फैसले देने की कीमत उन्हें चुकानी पड़ सकती है.

अब इस मामले में गेंद न्यायपालिका के पाले में है या कहें कि अपने संस्थान को बचाने की जिम्मेदारी अब मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) दीपक मिश्रा की अदालत पर ही है. अब कम से कम यह तो होना ही चाहिए कि सरकार ने जो दलीलें दी हैं, न्यायपालिका अपनी संस्थागत व्यवस्था यानी कॉलेजियम में उन पर विचार करे. हालांकि पिछले दिनों सीजेआई अपने साथी जजों द्वारा उठाए गए इन सवालों को खारिज कर चुके हैं कि सरकार न्यायपालिका के कामों में दखल दे रही है या उस पर हावी होने की कोशिश कर रही है.

इस साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे वरिष्ठ जजों ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी और यह बताया था कि देश की शीर्ष अदालत में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा. फिर मार्च में जस्टिस जे चेलमेश्वर ने सीजेआई को एक पत्र लिखा था. इसमें उन्होंने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि कर्नाटक में एक न्यायिक अधिकारी की हाई कोर्ट में प्रोन्नति रोकने के लिए केंद्र दखल दे रहा है, जबकि कॉलेजियम इस अधिकारी के नाम पर मोहर लगा चुका है.

वहीं अप्रैल में जस्टिस कूरियन जोसेफ ने सीजेआई को पत्र लिखकर न्यायपालिका पर मंडराते खतरे को लेकर चिंता जताई थी. और कल ही केंद्र द्वारा कॉलेजियम की एक सिफारिश वापस भेजने पर जस्टिस रंजन गोगोई और मदन लोकुर ने सीजेआई से कहा है कि उन्हें इस मसले पर ‘फुल कोर्ट’ बुलानी चाहिए. फुल कोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के सभी न्यायाधीश शामिल होते हैं. लेकिन जस्टिस दीपक मिश्रा द्वारा इन सीनियर जजों की चिंताओं के जवाब में कोई प्रतिक्रिया न देने से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वे न्यायपालिका को दबाने की कोशिश के खिलाफ खड़े होना नहीं चाहते.

यह 2014 की बात है जब एनडीए की सरकार गठित हुए कुछ ही समय बीता था. तब उसके पास सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियों के लिए कॉलेजियम की सिफारिशें आई थीं और इनमें पूर्व सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम का नाम भी शामिल था. सुब्रमण्यम 2002 के गुजरात दंगों में राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल उठाने वाले लोगों में शामिल रहे हैं और सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में उन्हें गुजरात हाई कोर्ट ने एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) भी नियुक्त किया था.

उस समय केंद्र सरकार ने तीन नामों को तो मंजूर कर लिया, लेकिन गोपाल सुब्रमण्यम की सिफारिश वाली फाइल कॉलेजियम को पुनर्विचार के लिए भेज दी थी. तब तत्कालीन सीजेआई आरएम लोढा ने केंद्रीय कानून मंत्री को पत्र लिखकर सरकार के इस ‘एक-तरफा’ फैसले पर असहमति दर्ज की थी. उन्होंने इस पत्र में लिखा था, ‘भविष्य में कार्यपालिका द्वारा इस तरह की प्रक्रिया नहीं अपनाई जानी चाहिए.’

भारत की शीर्ष अदालत द्वारा अपनी गरिमा और स्वतंत्रता कायम रखने की एक लंबी परंपरा रही है. वर्तमान सीजेआई मिश्रा को भी इसको कायम रखना चाहिए. आज न सिर्फ उनकी, बल्कि इस संस्थान की विश्वसनीयता भी दांव पर लगी हुई है. (स्रोत)