प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच दो दिन तक चलने वाली अनौपचारिक बैठक शुक्रवार से शुरू हो गई. हाल में डोकलाम मुद्दे पर दोनों देशों के बीच पैदा हुए तनाव के बाद दोनों देशों के मुखियाओं की यह मुलाकात रिश्तों में सुधार का संकेत मानी जा रही है. नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच यह मुलाकात मध्य चीन के शहर वुहान में हो रही है.

आम तौर पर इस तरह की मुलाकातें राजधानियों में होती हैं. लेकिन यह मुलाकात वुहान शहर में क्यों हो रही है, इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं. वुहान से प्रकाशित होने वाले दैनिक अख़बार ‘द चेंगझिआंग डेली’ की मानें तो इसका मतलब यह है कि वुहान अब अंतरराष्ट्रीय स्तर की कूटनीतिक बैठकों का ठिकाना बन रहा है. अखबार ने ध्यान दिलाया है कि बीते जनवरी में ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने अपना चीनी दौरा भी वुहान से ही शुरू किया था. इसके अगले ही महीने फ्रांस के प्रधानमंत्री बर्नार्ड केजेनुवे भी यहां आए थे.

अखबार के मुताबिक वुहान को मिल रहे इस महत्व का कारण इसकी भौगोलिक स्थिति भी है. यह मध्य चीन का सबसे बड़ा शहर है. मध्य चीन में पहला विदेशी दूतावास भी इसी शहर में बना था जो फ्रांस का था.

उधर, चीनी सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि वुहान जाकर नरेंद्र मोदी से मिलने का शी जिनपिंग का फैसला एक असाधारण कदम है. अखबार के मुताबिक यह मुलाकात 1988 में हुई पूर्व चीनी नेता डेंग शाओपिंग और राजीव गांधी की मुलाकात जितनी ऐतिहासिक हो सकती है.

कहा यह भी जा रहा है कि 1954 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी वुहान आए थे और यहां दोनों देशों के बीच शांति से मिल-जुलकर रहने की सहमति बनने के साथ पांच नियमों पर भी दस्तखत हुए थे. जानकारों के मुताबिक इसलिए वुहान का चुनाव शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी की मुलाक़ात की गंभीरता को भी दिखाता है.

उधर, उप-विदेश मंत्री कांग शुआनयो ने एक बयान में वुहान को चुने जाने की एक और वजह बताई है. उनके मुताबिक अपनी पिछली यात्राओं में नरेंद्र मोदी चीन के दक्षिण-पूर्वी और उत्तर-पश्चिमी शहरों में आ चुके हैं, लेकिन मध्य चीन उनसे छूटा हुआ था. दूसरी तरफ चीन के विदेश मंत्रालय का एक और बयान आया है जिसमें वुहान के चुनाव के बारे में कहा गया है कि दोनों देशों से पूछकर ही इस मुलाकात के इंतजाम किए गए हैं.