राजस्थान में नेतृत्व को लेकर चल रही अंदरूनी खींचतान के बीच भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने यह साफ कर दिया है कि वह अगला विधानसभा चुनाव मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के ही नेतृत्व में लड़ेगी. राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और पार्टी के प्रदेश प्रभारी अविनाश खन्ना ने सोमवार को यह बात कही. उन्होंने यह भी साफ किया कि विधानसभा चुनाव-2019 में बहुमत हासिल करने पर राजे ही विधायकों की नेता रहेंगी.

अविनाश खन्ना का यह बयान ऐसे मौके पर आया है जब राजस्थान में भाजपा अध्यक्ष का पद पिछले करीब तीन सप्ताह से खाली है. इसकी वजह प्रदेश की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया और भाजपा शीर्ष नेतृत्व के बीच किसी एक नाम पर सहमति न बन पाने को माना जा रहा है. बताया जाता है कि हाईकमान जोधपुर से सांसद और केंद्रीय कृषि मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को यह जिम्मेदारी सौंपना चाहता है. उधर, वसुंधरा राजे इस पद पर पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी की ही तरह अपने किसी विश्वस्त को देखना चाहती हैं.

जानकार बताते हैं कि हाल में राजस्थान के करीब दो दर्जन बड़े मंत्रियों और नेताओं ने वसुंधरा राजे के समर्थन में कई दिनों तक दिल्ली में डेरा जमाए रखा ताकि आलाकमान पर दबाव बनाया जा सके. विवाद को बढ़ते देख भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने वसुधंरा राजे को दिल्ली बुलवाया, लेकिन यहां भी पार्टी प्रदेशाध्यक्ष को लेकर कोई बात नहीं बनी. बताया जाता है कि दो घंटे चली इस बैठक में शाह के साथ संगठन महामंत्री रामलाल और सह-संगठन महामंत्री वी सतीश ने राजे को मनाने की लाख कोशिश की, लेकिन उनकी यह कवायद बेनतीजा रही.

वसुंधरा राजे के मौजूदा कार्यकाल की ही बात करें तो इस दौरान शायद ही ऐसी कोई छमाही गुज़री होगी जब उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने की चर्चाओं से बाज़ार गर्म नहीं हुए  

सुनने में यह भी आया कि इस बैठक में वसुंधरा राजे ने भी अपनी तरफ से कुछ नाम आगे बढ़ाए थे, लेकिन वे भी अपनी बात मनवाने में कामयाब नहीं हो पाईं. सूत्रों की मानें तो इस मामले में न तो अमित शाह पीछे हटने को तैयार हैं और न ही राजे. विशेषज्ञों का कहना है कि अब इस दिशा में कोई भी बड़ा फैसला कर्नाटक विधानसभा चुनावों के बाद ही लिया जाएगा.

प्रदेशाध्यक्ष के अलावा बीते कुछ दिनों में वसुंधरा राजे और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के बीच खींचतान के और भी कुछ मामले सामने आए, जैसे- वसुंधरा राजे की सिफारिश के बावजूद प्रदेश के मुख्य सचिव एनसी गोयल की सेवाओं को बढ़ाने से केंद्र का इनकार और कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा की तरफ से जारी स्टार प्रचारकों से सूची से राजस्थान की मुख्यमंत्री का नाम नदारद रहना.

वैसे यह पहली बार नहीं था जब राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और भाजपा हाईकमान के बीच मतभेद की खबरें सामनें आईं. राजे के राजनैतिक इतिहास में ऐसे वाकये कई बार खुद को दोहरा चुके हैं. ऐसी घटनाओं के दौरान हर बार उन्हें हटाने की चर्चाएं चलीं और हर बार ये गलत साबित हुईं. इस बार भी ऐसा ही हुआ है.

वसुंधरा राजे के मौजूदा कार्यकाल की ही बात करें तो इस दौरान शायद ही ऐसी कोई छमाही गुज़री होगी जब उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने की चर्चाओं से बाज़ार गर्म नहीं हुए. हालांकि बीच में एक मौका ऐसा भी आया जब पिछली जुलाई में राजस्थान प्रवास पर आए अमित शाह ने वसुंधरा राजे को ग्रोथ इंजन बताते हुए उनकी जमकर तारीफ की. तब माना गया कि पिछले करीब साढ़े तीन सालों से पद से हटाए जाने की जो तलवार राजे के सिर पर लटक रही थी वह हट गई है.

लेकिन इसी साल राजस्थान की दो महत्वपूर्ण लोकसभा और एक विधानसभा सीट पर हुए उपचुनावों में भाजपा की करारी हार के बाद ये अटकलें फिर से तेज हो गईं. और फिर प्रदेशाध्यक्ष पद को लेकर जिस तरह का रवैया वसुंधरा राजे ने अपनाया, उसे जानकारों ने उनके और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व अमित शाह की जोड़ी के असहज रिश्तों की एक और बानगी के तौर पर देखा.

जानकारों के मुताबिक वसुंधरा राजे और प्रधानमंत्री मोदी के बीच की अनबन सबसे पहले 2008 में सामने आयी थी. उस समय राजस्थान-गुजरात की संयुक्त नर्मदा नहर परियोजना के उद्घाटन के समय, एक ही पार्टी से मुख्यमंत्री होने के बावजूद, मोदी और राजे ने एक दूसरे के कार्यक्रमों में हिस्सा नहीं लिया था.

2014 के विधानसभा उपचुनावों में भाजपा को चार में से सिर्फ एक सीट मिलने के बाद से ही राजनीतिकारों ने यह कयास लगाना शुरू कर दिया था कि प्रदेश में वसुंधरा राजे के दिन लद गए हैं

हालांकि पांच साल बाद इनके बीच रिश्ते सामान्य होने की खबरें भी खूब सुनने को मिलीं जब दोनों ने एक दूसरे के लिए चुनावों में जमकर प्रचार किया था. 2013 में भाजपा को राजस्थान विधानसभा चुनावों में जबर्दस्त बहुमत मिला. और अपनी लय बरकरार रखते हुए पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनावों में प्रदेश की सभी 25 सीटों पर भी कब्जा कर लिया. जानकारों की मानें तो जब इस जीत का श्रेय लेने की बारी आई तो दोनों एक-दूसरे को फिर खटकने लगे. प्रदेश में इस जीत पर अपना-अपना दावा करते राजे और मोदी समर्थक कई मौकों पर एक दूसरे को आंखें तरेरने से भी नहीं चूके.

लोकसभा चुनाव में पार्टी के शानदार प्रदर्शन को देखते हुए वसुंधरा राजे को उम्मीद थी कि उनके पुत्र और झालावाड़ से सांसद दुष्यंत सिंह को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह जरूर मिलेगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. प्रतिक्रिया के तौर पर वसुंधरा राजे खुद दिल्ली पहुंच गईं और प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण से पहले उन्होंने राजस्थान से चुने गए सभी सांसदों की बैठक बुलाई. हालांकि ख़बरों में कहा गया कि राजे, हाईकमान से नाराज सांसदों को मनाने के लिए दिल्ली आईं थीं लेकिन, कई जानकारों ने इसे उनके शक्तिप्रदर्शन के तौर पर ज्यादा देखा. बताया जाता है कि तभी से वे नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की नजरों में खटकती चली आ रही हैं.

उसके बाद 2014 के विधानसभा उपचुनावों में भाजपा को चार में से सिर्फ एक सीट मिलने के बाद से ही राजनीतिकारों ने यह कयास लगाना शुरू कर दिया था कि प्रदेश में वसुंधरा राजे के दिन लद गए हैं. लेकिन तब केंद्र के लिए यह कदम आसान नहीं था. दरअसल उसी समय उत्तर प्रदेश में भी उपचुनाव हुए थे जहां राजस्थान की तरह लोकसभा में जबर्दस्त प्रदर्शन के बावजूद भाजपा उपचुनाव नहीं जीत सकी थी. जानकारों के मुताबिक ऐसे हालात में केंद्र को दोनों राज्यों में समान कार्रवाई करनी पड़ती. इसके अलावा दिल्ली के विधानसभा चुनाव सिर पर होने की वजह से भाजपा किसी तरह की अंतर्कलह नहीं चाहती थी. यही कारण था कि उस समय राजे को लेकर भाजपा शीर्ष ने चुप्पी साध ली.

लेकिन वसुंधरा राजे आसानी से चुप होने वालों में से नहीं थी. उपचुनाव हारने के अगले महीने ही उन्होंने मीडिया के सामने एक चौंकाने वाला बयान दिया. उन्होंने कहा, ‘कोई व्यक्ति इस गुमान में न रहे कि उसकी वजह से पार्टी राजस्थान में लोकसभा की 25 और विधानसभा की 163 सीटें जीती हैं. जनता जिताने निकलती है तो दिल खोलकर और हराने निकलती है तो घर भेज देती है.’ हालांकि इस बयान में उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया था लेकिन राजनीतिकार भांप गए कि चुनावों में मिली जीत का सेहरा प्रधानमंत्री के सिर बांधा जाना उन्हें रास नहीं आया.

इसके अलावा वसुंधरा राजे ने केंद्र के महत्वाकांक्षी स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत भी राजस्थान में देर से की थी. बताया जाता है कि इसके लिए जब उनसे दिल्ली से जवाब मांगा गया तो उनका रुख किसी विपक्षी मुख्यमंत्री जैसा था. राजे ने सार्वजनिक तौर पर कहा, ‘ये तो अब कर रहे हैं. हमने अपने बजट में इसका प्रावधान किया है. हमने 2003 में ही झाड़ू लगाकर इसकी शुरुआत कर दी थी.’ हालांकि केंद्र ने वसुंधरा राजे के इस बयान को भी दरकिनार करते हुए कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी.

ओम माथुर मोदी-शाह के अलावा आरएसएस के भी चहेते हैं. ऐसे में संभावनाएं जताई गयीं कि माथुर की राजस्थान में ‘रीएंट्री’ वसुंधरा राजे के लिए परेशानी का सबब बन सकती है  

लेकिन 2015 की गर्मियां वसुंधरा राजे के माथे पर पसीना लाने वाली साबित हुईं. ललित मोदी कांड में जब उनका नाम उछला तो तय माना गया कि इस बार पार्टी आलाकमान उन्हें नहीं बख्शेगा. हालांकि इस बार भी वसुंधरा राजे को क्लीन चिट दे दी गई लेकिन चारों तरफ उनकी जमकर किरकिरी होने के बाद. इसकी प्रमुख वजह उनकी अपने विधायकों पर जबरदस्त पकड़ को माना गया. इसके अलावा पहले ही दिल्ली विधानसभा चुनावों में करारी हार का सामना कर चुकी भाजपा की नजर बिहार के चुनावोंं पर थी. ऐसे में राजस्थान में उठाया कोई भी बड़ा कदम बिहार में फूंक-फूंक कर कदम रख रहे नरेंद्र मोदी और अमित शाह का ध्यान हटा सकता था.

हालांकि जानकार मानते हैं कि यह सही मौका था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक तीर से दो शिकार कर सकते थे क्योंकि ललित मोदी मामले में उनकी एक और विरोधी माने जाने वालीं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का भी नाम उछाला जाने लगा था. लेकिन पार्टी के दो बड़े नेताओं को एक साथ हटाने पर विपक्ष को अपने आरोप सही साबित करने का मौका मिल जाता, जो कि बिहार चुनाव में पार्टी की छवि को धक्का पहुंचाने के लिए काफी रहता. इस तरह मुख्यमंत्री राजे भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का कोप भाजन होने से एक बार फिर बच गयीं.

लेकिन अगले ही साल जब भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओम माथुर ने राज्यसभा सांसद के लिए राजस्थान से चुनाव लड़ा तो फिर से अटकलों का बाजार गर्म होना शुरु हो गया. ओम माथुर मोदी-शाह के अलावा आरएसएस के भी चहेते हैं. ऐसे में संभावनाएं जताई गयीं कि माथुर की राजस्थान में ‘रीएंट्री’ वसुंधरा राजे के लिए परेशानी का सबब बन सकती है. ललित मोदी कांड के समय भी मुख्यमंत्री पद के लिए ओम माथुर का नाम पहले ही सामने आ चुका था. फिर जब उत्तर-प्रदेश चुनावों के बाद राजस्थान भाजपा प्रदेश कार्यालय के बाहर माथुर के बड़े पोस्टर दिखाई दिए तो इसे वसुंधरा राजे की कुर्सी पर एक बड़ा संकट माना गया. उनके प्रति पार्टी नेतृत्व की बेरुखी तब और स्पष्ट हो गई जब वे उत्तर प्रदेश विजय की बधाई देने दिल्ली पहुंचीं. उन्हें संगठन के बड़े नेताओं के बजाय भीड़ में जगह मिली. इसके बाद एक वर्ग में चर्चा चलने लगी थी कि विधानसभा चुनावों से पहले उनके पर कतरे जा सकते हैं.

लेकिन अब अविनाश खन्ना के बयान से साफ हो गया है कि अब चुनावों तक उनकी कुर्सी को कोई खतरा नहीं है. जानकारों के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी भाजपा में इकलौती ध्रुव जैसी बन चुकी हो, लेकिन राजस्थान में आज भी भाजपा का पर्याय वसुंधरा राजे ही हैं जिनका विकल्प ढूंढना हाल-फिलहाल पार्टी आलाकमान के बूते के बाहर की बात दिखता है.