त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब का एक और बयान चर्चा का विषय बन गया है. उनका यह बयान रबींद्रनाथ टैगोर पर आया है. बुधवार को उदयपुर में एक आयोजन में बिप्लब देब ने कहा, ‘एक विश्व प्रसिद्ध कवि होने के अलावा रबींद्रनाथ टैगोर एक ऐसे व्यक्ति के रूप में भी जाने जाते हैं जिन्होंने ब्रिटिश सरकार के विरोध में नोबेल पुरस्कार को अस्वीकार कर दिया था.’

बिप्लब देब के इस बयान पर विपक्ष ने उन्हें इतिहास ठीक से पढ़ने की नसीहत दी है. इसकी वजह यह है कि रबींद्रनाथ टैगोर ने नोबेल नहीं बल्कि ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई नाइटहुड या सर की उपाधि लौटाई थी. 1919 में हुए जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद ब्रिटिश सरकार के विरोध में उन्होंने यह कदम उठाया था. नोबेल पुरस्कार उन्हें 1913 में दिया गया था जिसे उन्होंने जीवन के अंतिम समय तक अपने साथ रखा.

वैसे यह पहला मौका नहीं है जब त्रिपुरा के मुख्यमंत्री अपने विवादास्पद बयानों से चर्चा में आए हैं. महाभारतकाल में इंटरनेट होने से लेकर युवाओं को पान की दुकान खोलने के सुझाव जैसे तमाम बयानों की वजह से न सिर्फ उनकी किरकिरी हो रही है बल्कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को भी आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है. जाहिर है कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व इससे परेशान है. त्रिपुरा के मुख्यमंत्री के तौर पर बिप्लब देब के चयन पर पार्टी के अंदर ही कुछ नेता सवाल उठा रहे हैं. पार्टी को बाहर से भी बिप्लब को मुख्यमंत्री बनाने के निर्णय के लिए आलोचनाओं का शिकार होना पड़ रहा है. सोशल मीडिया पर भी बिप्लब देब और भाजपा का खूब मजाक उड़ाया जा रहा है.बीती दो मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें दिल्ली भी तलब किया था.

लेकिन भाजपा नेताओं से बातचीत करने पर पता चलता है कि पार्टी को असली चिंता बिप्लब देब के बारे में मिल रही दूसरी शिकायतों से है. जब त्रिपुरा में भाजपा ने चुनाव जीता तो उस वक्त भी वहां मांग उठ रही थी कि किसी आदिवासी नेता को मुख्यमंत्री पद दिया जाए. लेकिन पार्टी के त्रिपुरा प्रभारी सुनील देवधर की पसंद बिप्लब थे. इस वजह से पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने भी उनकी बात मान ली.

अब त्रिपुरा भाजपा के कार्यकर्ता और वहां चुनाव में लगे पार्टी के दूसरे लोग दिल्ली आकर यह शिकायत कर रहे हैं कि बिप्लब देब की सरकार में उनकी सुनी नहीं जा रही है. इनका यह भी कहना है कि पार्टी कार्यकर्ताओं के छोटे-मोटे काम भी त्रिपुरा में भाजपा सरकार होने के बावजूद नहीं हो पा रहे हैं. भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं को त्रिपुरा के स्थानीय पार्टी कार्यकर्ता आकर यह कह रहे हैं कि न तो मुख्यमंत्री उनकी सुन रहे हैं और न ही दूसरे मंत्री, और इस वजह से सरकारी अधिकारी पार्टी कार्यकर्ताओं को बिल्कुल भाव नहीं दे रहे हैं.

बताया जा रहा है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की असल चिंता यही है. भाजपा को लगता है कि विवादास्पद बयानों से तो कोई खास राजनीतिक नुकसान नहीं होगा, लेकिन अगर कार्यकर्ताओं का गुस्सा बढ़ा तो यह पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में भी फैलेगा. ऐसा होने पर भाजपा के लिए पूर्वाेत्तर की 25 लोकसभा सीटों में से 21 पर जीत हासिल करने का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो जाएगा.

पार्टी के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘कई बार किसी राज्य में जब पार्टी की सरकार पहली बार बनती है तो कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं बहुत अधिक होती हैं. लेकिन जो लोग सरकार चला रहे होते हैं, उन्हें सरकारी तंत्र के अंदर की सीमाओं का भी अहसास होता है. इस वजह से कई बार कार्यकर्ताओं की उम्मीदों के मुताबिक काम नहीं होता और उनका असंतोष बढ़ता है. त्रिपुरा की सही स्थिति क्या है, इस बारे में वहां सरकार में शामिल लोगों का पक्ष जाने बगैर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना गलत होगा. कई बार ऐसा भी होता है कि जिन लोगों को पहले सरकार चलाने का अनुभव नहीं होता उनसे कुछ गलतियां अनजाने में हो जाती हैं.’

इस बात से यह स्पष्ट संकेत मिल रहा है कि बिप्लब कुमार देब की विवादास्पद बयानों और उनकी सरकार से कार्यकर्ताओं के बीच उपजे असंतोष पर पार्टी में चिंता तो है लेकिन, उन पर कार्रवाई करने के मूड में अभी पार्टी नहीं है. ऐसे में ज्यादा संभावना इसी बात की है कि एक बार फिर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं द्वारा उन्हें अधिक सावधानी के साथ बोलने और काम करने की नसीहत दी जाए.