टाइम मशीन एक अत्याधुनिक संकल्पना है और लोक-परलोक एक प्राचीन अवधारणा. लेकिन हमारी दुनिया इतनी अद्भुत है कि इस पर न तो भौतिक विज्ञान के नियम सौ फीसद काम करते हैं और न सौ फीसद आध्यात्म के. सो नियमों की इसी भसड़ में कुछ ऐसा हुआ कि परलोक में शाहजहां को टाइम मशीन मिल गई और उन्होंने फैसला किया कि वे एक बार फिर अपने वक़्त वाला हिंदुस्तान देखेंगे. अब ये इत्तफाक देखिये कि बादशाह सलामत ने यह फैसला उसी दरमियान लिया जब हिंदुस्तान की लोकतांत्रिक हुकूमत ने लाल किला एक निजी कंपनी को गोद दे दिया. चूंकि अपने देश मे चीजों ने ठीक से न होने का फैसला कर रहा है. सो इस समय-यात्रा में भी ऐसा ही हुआ. कुछ चीजें बदलीं, कुछ नहीं बदलीं. और सबसे बड़ी बात लाल किले के रखरखाव का जिम्मा बीते वक्त में भी उसी निजी कंपनी और उसके मुलाजिमों के हाथ में ही रह गया. बाकी शाहजहां अपने लाव लश्कर के साथ आ धमके. पेश हैं उसके बाद के कुछ वाकये...

वेलकम जहांपनाह! ग्लैड टू मीट यू...

टाइम ट्रैवलिंग कर शाहजहां किला-ए मुबारक (शाहजहां लाल किले को इस नाम से ही जानते थे) पहुंच गए. वहां कंपनी के टाई-कोटधारी प्रतिनिधियों ने उनका स्वागत किया. रिप्रेजेंटेटिव लोगों में सरदार से दिखने वाले एक शख्स ने शाहजहां के आगे हाथ बढ़ाकर कहा - वेलकम जहांपनाह. ग्लैड टू मीट यू. अपनी नारी सुलभ चंचलता और कारपोरेट दायित्व निभाने की विकलता के चलते एक कन्या ने बादशाह के आगे बुके बढ़ाते हुए कहा - नाइस टू मीट यू. सर, यू आर लुकिंग सो गॉर्जियस इन दिस ड्रेस. अपने आने की घोषणा करने वाली बाबुलंद आवाज़ और करीब डेढ़ हजार सलामों को अनसुना करके तख़्ते-ताउस तक पंहुचने के आदी रहे शाहजहां इस पर भड़क उठे. उन्होंने चीखते हुए कहा - दूर हट गुस्ताख़. सल्तनत-ए-मुग़लिया की ऐसी बेहुरमती. गले में चीथड़े से लटकाए ये कौन शख्स बादशाह सलामत से जान की भीख मांगने के बजाय उनके आगे हाथ बढ़ा रहा है. वे गुस्से में बेकाबू होते इससे पहले ही एक होशियार दरबारी ने मामला संभाल लिया. उसने बादशाह के कान में कहा - इनकी नादानी मुआफ़ फ़रमाये हुज़ूर. ये लोग उस कंपनी के मुलाजिम हैं जिन्होंने किले को गोद लिया है. जबान-ए-फिरंग में आपका इस्तकबाल कर रहे हैं. जबान तो बादशाह को समझ आई ही नहीं थी यह बात भी उनके सर के ऊपर से निकल गई. चौंककर उन्होंने कहा - किला गोद ले लिया है! क्या हिन्दुस्तान की ये खूबसूरत इमारत कोई अनाथ बच्चा है, जिसे किसी को गोद लेना पड़े.

शाहजहां का दरबारी बहुत समझदार था. लोकतांत्रिक भारत में वह सत्ता के दलाल(पावर ब्रोकर) के तौर पर पैदा हो चुका था और सत्ता केंद्रों में उसकी खासी ख्याति थी. वह भी इस वक्त दोनों वक्त में जी रहा था. उसने कहा - आप जिस समय से आये हैं. उसमें गोद लेने का चलन है जहांपनाह. हर सांसद गांव गोद लिए बैठा है. अब वो अलग बात है कि उसे खाने-पीने को कुछ दे रहा है या नहीं. शाहजहां दरबारी की बातों से ज्यादा उसकी बॉडी लैंग्वेज से कन्विंस थे. मध्ययुगीन ही सही लेकिन सत्ता की तिकड़म को वे भी समझते थे. टहलते-टहलते वे अपने सिंहासन तक आ गए. दो बातें वे समझ चुके थे. एक ये कि टाई पहने लड़के-लड़कियां किसी ताकतवर शख्स के मुलाजिम हैं. इनकी गलती पर यह नहीं कहा जा सकता कि - ले जाओ गुस्ताखों को. दस कोड़े लगाओ. दूसरे ये जिस जुबान में उनका इस्तकबाल कर रहे थे वह मौजूदा वक्त की कोई ताकतवर जुबान है. यही सब सोचते हुए उन्होंने जोर से बोला - तखलिया. सभी चले गए.

जहांपनाह अपनी पोशाक में ये लोगो कबूल फरमाएं...

दूसरे दिन बादशाह दीवाने आम में बैठे थे. और किसी माली की कांट-छांट से खुश होकर उसे अपना हीरों वाला हार देने ही जा रहे थे कि एक टाईधारी युवा ने कहा - नहीं जहांपनाह आप ऐसा नहीं कर सकते. ये एमओयू के मुताबिक गलत है. शाहजहां ने गुस्से पर काबू पाते हुए कहा - ये क्या बला है. शाहजहां के आगे एमओयू पढ़ा गया. उन्होंने कहा - इसका फ़ारसी तर्जुमा क्यों नहीं कराया गया. तभी उनके मुंह लगे दरबारी ने कहा - बहुत सख्तजान सरकारी अंग्रेजी है, हुज़ूर. इसका तर्जुमा कौन करता. वैसे भी जब तेल ही बेचना है तो फारसी पढ़ने की मेहनत कोई क्यों करे! बादशाह को ‘पढ़े फ़ारसी, बेचे तेल’ कहावत याद आ गई और वे मुस्करा पड़े.

उनकी मुस्कराहट का फायदा उठाने के लिए कंपनी के तमाम लोग खड़े थे. एक ने तुरंत दरबारी के कान में कुछ फुसफुसा दिया. उन दोनों के बीच हुई गुटरगूं को कोई सुन पाता तो जान पाता कि सत्ता तंत्र कैसे काम करता है. खैर, दरबारी ने तुरंत बादशाह को अदब से सलाम ठोंकते हुए कहा - हुज़ूर की शान में ये कुछ पेश करना चाहते हैं. शान में कुछ पेश करवाना बादशाहों की आदत होती है. उन्होंने सिर हिला दिया. टाई लगाए एक सुदर्शन नौजवान ने डिजाइनर बॉक्स लेकर सलाम ठोंका. उसकी आदत नहीं थी लेकिन दरबारियों को देख वह उनसे भी आगे निकल गया. आधुनिक बाजार में स्किल इसी को कहते हैं. हुज़ूर की खिदमत में पेश है हमारा लोगो. जहांपनाह, हमारा लोगो अपनी पोशाक पर कुबूल फरमाएं. हुज़ूर के ताज और पोशाक में लगकर लोगो की भी शान बढ़ेगी और हुज़ूर भी एक्सक्लूसिव दिखेंगे.

शाहजहां फिर हत्थे से उखड़ गए - हम अपनी पोशाक में ये पैबंद क्योंकर लगाएंगे? दरबारी ने कहा आलमपनाह, एमओयू की शर्त ही कुछ ऐसी है. और इसके लिए ये लोग शाही खजाने में रकम भी जमा करेंगे. शाहजहां शाही खजाने की बात सुन ठिठके, फिर बोले - तो खजाना भरा रहे इसके लिए हम अपने ताज की इज्जत तक को नीलाम कर दें. नये जमाने का खेला-खाया दरबारी अपने पुराने वक्त में बोला - इज्जत तो स्टेट ऑफ माइंड है, सरकार. खजाना भरता हो तो उसे नीलाम करने में कोई बुराई नहीं है. खजाना ही असली हुकूमत है, हुज़ूर. बादशाह जानते थे कि हुकूमत तो दरबारियों की वफादारी और सलाहों से ही चलती है. उन्होंने कहा - तख़्ते-हिंदुस्तान के लिए हम अपनी पोशाक में लोगो का पैबंद भी लगा लेंगे. जहांपनाह की पोशाक पर अब ट्रेड मार्क थे. जगह-जगह लिखा हुआ था - स्पॉन्सर्ड बाई...पावर्ड बाई फलां फलां... अनमने शाहजहां टहलते हुए उस यमुना की तरफ चले गए जिसे भूतकाल में पहुंचाना अब किसी टाइम मशीन के बस की बात नहीं रह गई है. वे बदहवास से होकर बोले - अरे, ये जमना का क्या हाल बना रखा है. इसे कोई गोद क्यों नहीं लेता. जवाब आया - अरे, हुज़ूर अभी तो सरकार ने गंगा को ले रखा है. यमुना का नंबर देखिये कब आये. शाहजहां अब घबराने लगे थे. झटपट टाइम मशीन में बैठे और बोले - परलोक कूच किया जाए.

ग़ालिब! आप हमारे एड कंपेन के जिंगल क्यों नहीं लिखते

शाहजहां के टाइम मशीन में आने के बाद औरंगजेब को भी परलोक में ये मौका मिला. लेकिन उसने लाल किला घूमने में कोई दिलचस्पी नहीं ली और इसे फिजूलखर्ची बताया. फिर वो दिल्ली की एक सड़क से अपना नाम हटा देने को लेकर ख़फ़ा भी था. उसके बाद के बादशाहों ने न पहले कुछ किया था जिसे देखा जा सकता और न अब कुछ करने का मन था कि जाया जा सकता. बहादुरशाह जफर को इस बात का मलाल था कि दो गज जमीं भी न मिली कूए-यार में. वे टाइम ट्रैवेल के लिए राजी हो गए और मिर्ज़ा, जौक और मोमिन को भी अपने साथ ले लिया. सभी ने मिलकर टाइम मशीन की चरखी को कुछ ऐसा घुमाया कि अपने वक्त में नहीं, लगभग आज के समय में ही दिल्ली में प्रकट हुए.

लाल किले पहुंचते ही जफर का भी स्वागत उसी अंदाज में हुआ जैसे शाहजहां का हुआ था. तमाम सारे लोग बादशाह से मिलकर ग्लैड हुए और कई सारी महिलाओं को वो गॉर्जियस लगे और उन्होंने रॉयल फील किया. जफर इस किस्म की पोशाक और फिरंगी जबान के जलवे से वाकिफ थे सो उन्हें वैसी हैरत न हुई जैसी शाहजहां को हुई थी. ग़ालिब ने जरूर तंज कसा कि साहबे इंगलिस्तान चले गए लेकिन साहिबी और पोशाकें आप लोगों को दे गए. उस्ताद जौक ने माहौल को शायराना करने के लिहाज से शेर पढ़ दिया - दुनिया ने राहे फना में किसका दिया है साथ/ तुम भी चले चलो जब तक चली चले...साथ चल रही एक महिला एक्जीक्युटिव को ये बताया गया था कि बादशाह जफर के साथ कुछ बड़े पोएट भी आ रहे हैं. उनसे अकॉर्डिंगली पेश आया जाय. इसलिए उसने कुछ न समझ आने के बाद भी कहा - वाऊ, नाइस पोएट्री. आई लव पोएट्री. ग़ालिब ने जौक से पुरानी राइवलरी के चलते फिर तंज कसा. उस्ताद जबान-ए-इंगलिस्तान में वाह-वाह और दाद के अपने मज़े हैं. जफ़र ने दीवाने आम में पहुंचते ही कहा - क्यों न एक मुशायरा हो जाय.

मुशायरा मतलब इवेंट. इवेंट मतलब इवेंट मैनेजमेंट. मैनेजमेंट मतलब खर्चा. और किसी का खर्चा मतलब किसी की कमाई. तुरंत ही लाल किले को गोद लेने वाली कंपनी के एक बहादुर ने हिसाब लगा लिया. औपचारिक तौर पर बहादुर शाह जफ़र को एमओयू के कागज़ात दिखाने की कोशिश की गई. लेकिन उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि बादशाही के दौर में अंग्रेजी में लिखे हुए अपने पेंशन के कागज़ात देख कर ही छक चुका हूं. तभी एक मैनेजर ने कहा कि मुशायरे के बाबत बादशाह सलामत से कुछ कहना चाहता हूं. इजाजत है. हुज़ूर हम चाहते हैं कि मुशायरे में टिकट लगा दिया जाय. जौक-ग़ालिब के साथ आप को सुनने के लिए भीड़ टूट पड़ेगी. सुखन सुनने के लिए पैसे. ये तो सुनने-सुनाने वाले दोनों की बेइज्जती है. उधर से जवाब मिला कि इसके बगैर खजाने की माली हालत मुशायरे की इजाजत नहीं देती. थक-हारकर बादशाह ने टिकट वाली बात मान ली. तो फ़िर उन्हें बताया गया कि बीच-बीच में हम ऐसे भी करेंगे कि मिर्ज़ा ग़ालिब के इस मतले के प्रायोजक हैं, फलां-फलां. पोएट्री ऑफ उस्ताद जौक पावर्ड बाई फलां. अपनी वाह-वाह इस नंबर पर एसएमएस कीजिये और जीतिए लाखों के इनाम.

जफ़र के पास शर्त मान लेने के अलावा कोई चारा न था. मुशायरा हुआ.बादशाह को इसमें कितना आनंद आया पता नहीं, लेकिन कमर्शियली यह बहुत हिट रहा. इवेंट मैनेजमेंट की दुनिया में इसने तहलका मचा दिया. इसे आयोजित कराने वालों को कंपनी ने शानदार इन्क्रीमेंट के साथ बोनस भी दिया.

इसी बीच लाल किले का रखरखाव करने वालों ने पता लगा लिया कि ग़ालिब एक बड़ा ब्रांड हैं और तंगहाली में भी हैं. बाकी जौक तो बादशाह के उस्ताद हैं और उनके साथ कॉन्ट्रेक्ट आसान नहीं है. तो आर्ट एंड कल्चर में डील करने वाली एक मोहतरमा ने ग़ालिब से मिलने का वक़्त मुकर्रर कर लिया. एक्सक्यूज मी सर. हाऊ स्वीट योर पोएट्री इज. ऐसे कुछ उनकी बात शुरू हुई. ग़ालिब ने उनकी बात समझी तो कहा - स्वीट कहां है मेरी शायरी. मैंने तो दुनिया भर के गम कहे हैं. जी, मैं समझती हूं. अगर आप लोन आई मीन कर्ज में जी रहे हों तो दुख तो आ ही जाता है शायरी में. मैं तो एक ईएमआई में ही दुखी हूं. और आप पर तो दिल्ली के हर बाजार का कर्ज है. वैसे आप के लिए मेरे पास एक प्लान है. आप इतने अच्छे शायर हैं. आप हमारे एड कंपेन के लिए क्यों नहीं लिखते. ये देखिये रेडियो, टीवी पर हम आपकी पोएट्री को कैसे इस्तेमाल करेंगे उसका पूरा डिज़ायन है मेरे पास. आप हां कर दें आपके सारे कर्ज तुरंत क्लीयर हो जाएंगे. और हम आपको चेक देंगे सो अलग. डोंट वरी. हैंडसम अमाउंट होगा. फिर आप वो वाला शेर अपने दीवान से हटा भी सकते हैं. कर्ज की पीते थे...जस्ट जोकिंग. बस आप कोशिश करें कि आप थोड़ा आसान आई मीन हिंगलिश में शायरी करें.

कर्ज से मुक्ति की बात सुनते ही ग़ालिब सोच में पड़ गए. बादशाह जफ़र चुपचाप ये बातें सुन रहे थे. वे यह सोच कर घबरा गए कि कर्ज उतारने के चक्कर मे ग़ालिब कहीं एफएम रेडियो के लिए जिंगल न लिखने लगे. उन्होंने तुरंत हुक्म दिया. वापसी. सारे शायर टाइम मशीन में बैठाये गए और वापस परलोक पहुंच गए.

फुटनोट

बाद में लाल किले को गोद लेने वाली कंपनी ने इन सब वाक़यात का लाइट एंड साउंड शो तैयार करवा लिया. इनके टिकट से बढ़िया मुनाफा आ रहा था. योजना की सफलता के बारे में प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से तफसील से बताया. कृतज्ञ राष्ट्र ने अपील की कि उसकी बाकी राष्ट्रीय धरोहरें भी किसी न किसी कंपनी की गोद में डाल दी जाएं.