गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी का कहना है कि गूगल नारद की तरह जानकारी का स्रोत है क्योंकि उसे सब पता है कि दुनिया में कहां क्या हो रहा है. इस पर नारद मुनि के भक्त और समर्थक खासे नाराज हैं. यहां पर भक्त और समर्थक शब्दों को उनके मूल अर्थों में ही लें. ये भक्तनुमा समर्थक या समर्थक मार्का भक्त नहीं हैं. खैर, इनका कहना है कि नेता जी का ऐसा कहना महर्षि का अपमान और भारतीय संस्कृति को खतरे में डालने वाला है. इस अतार्किक तुलना को कुछ तर्कों के तराजू में रखकर वे हमें बताते हैं कि क्यों सहस्त्र गूगल और उसके हजारों भाई-बहन मिलकर भी एक नारद जी की बराबरी नहीं कर सकते.

नारद जी की क्षमताओं में विश्वास करने वालों का कहना है कि उनके पास केवल गूगल जितनी जानकारी थी, यह कहना गलत और एक महान हस्ती का अपमान है. इनका कहना है कि गूगल के पास तो केवल धरती पर मौजूद चीजों के बारे में ही जानकारी है जबकि नारद मुनि तो अखिल ब्रह्मांड के ज्ञाता हैं. महर्षि नारद को न सिर्फ हमारी बल्कि हर आकाशगंगा में चलने वाली पॉलिटिक्स, ग्रहों की पिछली-अगली चाल और ब्लैकमनी से भी गहरे ब्लैकहोलों के रहस्य मालूम हैं. ऐसे ज्ञानी श्रषि की तुलना गूगल से करना उन्हें बहुत कम करके आंकना है.

इसके अलावा गूगल पर लाखों लोग रोज जानकारियां अपलोड करते हैं. यानी यह इंसानों द्वारा किया जाने वाले दुनियावी काम है. गूगल इस अपलोडेड जानकारी को जरूरतमंदों तक पहुंचाता है, इस तरह वह एक तरह से जानकारियों को आगे बढ़ाने वाला एक यंत्र मात्र है. इसके उलट महर्ष नारद तो खुद जानकारियों के स्रोत हैं. इसीलिए वे तमाम श्रषि-मुनियों से ऊपर रखे जाते हैं. यहां तक कि उनके बगैर शेषशय्या पर सोए भगवान विष्णु भी बहुत सी सूचनाओं से वंचित रह सकते हैं. कुल मिलाकर ज्ञान का प्रवाह उन्हीं से शुरू होता है और उन्हीं के माध्यम से प्रवाहित होता है. ऐसे में उनकी तुलना गूगल जैसी किसी ऐसी चीज से करना जो बहुत सीमित है और करोड़ों मनुष्यों के प्रयासों से चलती है, गलत नहीं तो और क्या है!

इसके अलावा अगर नारद जी के प्रोफाइल पर ध्यान दिया जाए तो वे न सिर्फ सर्च इंजन गूगल से कहीं ज्यादा जानकारी रखते हैं बल्कि व्हाट्सएप और फेसबुक वाला काम भी चुटकियों में कर सकते हैं. अगर आपको याद हो तो तमाम मानव और असुर तपस्वियों को अजीबो-गरीब वर मांगने की सलाह देना और फिर देवराज इंद्र तक उनकी सूचना पहुंचाने का काम नारद मुनि के ही हिस्से रहा है. इसकी वजह से स्वर्ग में वैसे ही सुर-असुर संग्राम हुए हैं जैसे व्हाट्सएप के कारण इहलोक में होते रहते हैं. देवताओं, मनुष्यों और राक्षसों के बीच फेसबुक मार्का फेक न्यूज पहुंचाकर उनका कल्याण करने का काम भी नारद मुनि ही करते रहे हैं. ऐसे में नारद मुनि केवल गूगल नहीं बल्कि गूगल, फेसबुक, इन्स्टाग्राम, व्हाट्सएप और इस और उस तरह के अब तक नहीं बन सके और कभी न बन सकने वाले सभी सॉफ्टवेयर और एप एक साथ हैं.

भारतीय संस्कृति कलह के पीछे कल्याण खोजने वालों की संस्कृति रही है और नारद मुनि इसके सबसे बड़े प्रतीक हैं. भारतीय नेतागण गूगल से उनकी तुलना करके उनकी महानता औऱ ज्ञान को एक खांचे में फिट करना चाहते हैं. जबकि उनकी विशेषताएं अनगिनत हैं और सारी की सारी अतुलनीय और असीमित भी. राजनीति अपने फायदे के लिए उनका इस्तेमाल करने से तो बाज आने से रही लेकिन एक भारतीय होने के नाते उनकी लीगेसी पर किसी तरह की आंच न आने देना हम सभी सनातनधर्मियों की जिम्मेदारी है.