उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने कर्नाटक के लिए अपना चुनावी अभियान शुरू कर दिया है. माना जा रहा है कि वे गुजरात चुनाव की तरह ही दक्षिण के इस सूबे में करीब तीन दर्जन रैलियां और रोड शो करेंगे. आदित्यनाथ कई मंदिरों और मठों के दरवाजे पर भी माथा टेकते हुए नजर आ सकते हैं. इससे पहले वे दिसंबर, 2017 में भी कर्नाटक की यात्रा कर चुके हैं. राज्य में होने वाले चुनाव के मद्देनजर भाजपा के स्टार प्रचारकों की सूची में आदित्यनाथ, नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ शीर्ष पर हैं.
बीते मार्च में भाजपा द्वारा उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर संसदीय सीट न बचा पाने के बाद आदित्यनाथ आलोचकों के निशाने पर थे. इस हार को लेकर उन पर हमला इसलिए भी तेज था कि गोरखपुर सीट उनका गढ़ रही है. इसके बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री के सिद्धारमैया ने आदित्यनाथ पर निशाना साधा था. उन्होंने कहा था कि इस हार के बाद वे कर्नाटक के लोगों से क्या कहेंगे. लेकिन, भाजपा नेतृत्व ने कर्नाटक में जिस तरह की भूमिका आदित्यनाथ के लिए तय की है, उससे यह माना जा सकता है कि उनके पास मतदाताओं से कहने को काफी कुछ है.
पुराना सिलसिला आगे बढ़ाने की संभावना
भाजपा के फायरब्रांड नेता आदित्यनाथ ने जब अपना पिछला कर्नाटक दौरा किया था उस वक्त उन्होंने तटीय कर्नाटक में पड़ने वाले हुबली में एक रैली की थी. इसमें कांग्रेस की नीतियों पर हमला करते हुए उन्होंने कहा था, ‘कर्नाटक की भूमि बजरंग बली हनुमान जी की भूमि है. वे (कांग्रेस) हनुमान जी की नहीं बल्कि, टीपू सुल्तान की पूजा कर रहे हैं. यह मानसिकता का अंतर है.’ उन्होंने आगे कहा कि यदि कर्नाटक कांग्रेस को एक सिरे से खारिज कर देगा तो टीपू सुल्तान की पूजा करने वाला कोई दूसरा नहीं आएगा. इससे पहले कांग्रेस ने राज्य स्तर पर टीपू सुल्तान की जयंती मनाई थी.
राजनीतिक मामलों के जानकारों की मानें तो आदित्यनाथ अब कर्नाटक चुनाव अभियान में अपनी दिसंबर वाली कड़ी को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाते हुए दिख सकते हैं. माना जा रहा है कि उनके चुनावी अभियान का मुख्य केंद्र तटीय कर्नाटक ही होगा. विधानसभा की 224 सीटों में से 19 इस इलाके के तीन जिलों - दक्षिणी कन्नड़, उत्तरी कन्नड़ और उडुपी में पड़ती हैं. इनमें दक्षिण कन्नड़ को भाजपा का मुख्य गढ़ माना जाता है. इन तीनों जिलों में अल्पसंख्यकों की अच्छी-खासी आबादी है और उन्हें अपनी पहचान को लेकर काफी सजग भी माना जाता है. यह इलाका सांप्रदायिक लिहाज से कितना संवेदनशील है, इसे ऐसे समझा जा सकता है कि श्रीराम सेना सहित अन्य कट्टर हिंदू संगठनों का उभार इन्हीं इलाकों में हुआ है. इसके अलावा लव-जिहाद का मुद्दा मुख्य रूप से तटीय कर्नाटक से ही जुड़ा हुआ है.
जानकारों के मुताबिक इन सब बातों को देखते हुए तटीय कर्नाटक में आदित्यनाथ जैसे फायरब्रांड नेता की भूमिका काफी अहम होती दिखती है. माना जा रहा है कि वे एक खास समुदाय को लेकर कांग्रेस की नीतियों की आलोचना करने के साथ ही भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले और लव-जिहाद के मुद्दे को भी जोर-शोर से उठा सकते हैं. भाजपा का दावा है कि अकेले तटीय कर्नाटक में साल 2015 से लेकर अब तक उसके करीब 24 कार्यकर्ताओं की हत्या की गई है. बीते दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस इलाके में हुई एक रैली में यह मुद्दा उछाला था. उनका कहना था कि भाजपा ईज ऑफ डूइंग की संस्कृति पर आगे बढ़ रही है लेकिन, कांग्रेस ईज ऑफ डूइंग मर्डर की संस्कृति को बढ़ावा दे रही है.
फायदे कई मोर्चों पर
जानकारों के मुताबिक आदित्यनाथ के चलते भाजपा को सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का ही फायदा नहीं होगा बल्कि उनका ‘कर्नाटक कनेक्शन’ भी पार्टी के लिए मददगार हो सकता है. बताया जाता है कि एक साल पहले जब आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश की कमान संभाली थी तो लखनऊ से करीब 2200 किलोमीटर दूर मंगलुरू स्थित कदली मठ में खुशियां मनाई गई थीं. इस मठ का संबंध आदित्यनाथ के नाथ संप्रदाय से माना जाता है. इसके अलावा पुराने मैसूर स्थित आदि चुनचनागिरी मठ का संबंध भी उनसे है. 12वीं सदी में गोरखनाथ के साथ नाथ संप्रदाय के योगियों ने भी पूरे भारत का भ्रमण किया था. इस दौरान ही उन्होंने तटीय कर्नाटक सहित अन्य क्षेत्रों में कई मठों की स्थापना की थी. माना जाता है कि राज्य में पहचान की राजनीति के उभार के साथ ही इनकी ताकत भी बढ़ गई है. इसके अलावा इन इलाकों में भाजपा के पितृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सक्रियता भी आदित्यनाथ और उनकी पार्टी के लिए मददगार साबित हो सकती है.
इन बातों के साथ तटीय कर्नाटक में लिंगायतों की बड़ी आबादी होने की वजह से आदित्यनाथ की अहमियत और भी बढ़ जाती है. इसकी वजह कांग्रेस सरकार द्वारा लिंगायतों को अपनी ओर खींचने को लेकर लिया गया हालिया फैसला है. इसके तहत सिद्धारमैया की सरकार ने वोक्कालिगा और लिंगायत संप्रदायों को अलग धर्म का दर्जा दे दिया है. ऐसे में भाजपा को आशंका है कि लिंगायत नेता बीएस येद्दियुरप्पा के भाजपा के साथ होने के बाद भी उन्हें इसका नुकसान हो सकता है. राज्य के कुल मतदाताओं में लिंगायतों की संख्या करीब 20 फीसदी है. माना जा रहा है कि इस स्थिति में यदि आदित्यनाथ तटीय कर्नाटक के इलाकों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने में सफल होते हैं तो इस संभावित नुकसान को भी कम किया जा सकता है.
उधर, कर्नाटक चुनाव में आदित्यनाथ की भूमिका का अहसास कांग्रेस और मुख्यमंत्री के सिद्धारमैया को भी है. ‘यदि वे यहां आते हैं तो भारतीय जनता पार्टी के लिए नुकसानदायक होगा. उन्होंने यूपी में क्या किया. बीते एक साल में वे विफल साबित हुए हैं. उन्हें यहां आने और कुछ करने की जरूरत क्या है?’ जानकार बताते हैं कि सिद्धारमैया का आदित्यनाथ पर इस तरह लगातार हमला करना ही बताता है कि उनकी इस चुनाव में कितनी अहम भूमिका है.
इससे पहले त्रिपुरा चुनाव के दौरान भी आदित्यनाथ ने वहां की सात सीटों पर चुनाव प्रचार किया था और इन सभी पर भाजपा गठबंधन को जीत हासिल हुई थी. इन सीटों पर बड़ी संख्या में नाथ संप्रदाय के अनुयायी थे. तटीय कर्नाटक की राजनीतिक परिस्थितियां और त्रिपुरा चुनाव का यह उदाहरण देखें तो भाजपा की आदित्यनाथ से उम्मीदें गैरवाजिब नहीं दिखतीं.
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