हाल में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब के कई अजीबोगरीब बयानों ने खूब सुर्खियां बटोरीं. इन बयानों में से एक यह भी था कि पढ़े-लिखे नौजवानों ने सरकारी नौकरियों के लिए राजनेताओं के पीछे भागकर अपना अमूल्य समय ख़राब किया है. बिप्लब देब ने कहा कि अगर वे नौकरी के लिए सरकारों के पीछे न भागते और पान की दुकान लगा लेते तो उनके बैंक खाते में अब तक पांच लाख रुपये जमा होते.

यह बात कहते हुए बिप्लब प्रधानमंत्री की मुद्रा योजना का प्रचार करते भी नज़र आए. उन्होंने सुझाव देते हुए कहा कि नौकरी के लिए नेताओं के पीछे-पीछे भागने से अच्छा है कि युवा प्रधानमंत्री की मुद्रा योजना के तहत बैंक से क़र्ज़ लें और पशु संसाधन क्षेत्र की विभिन्न परियोजनाओं को शुरू करके स्वरोज़गार का सृजन करें.

जानकार कहते हैं कि देश के सब युवा तो पशु संसाधन क्षेत्र के तहत स्वरोज़गार प्राप्त नहीं करेंगे, लिहाज़ा त्रिपुरा के मुख्यमंत्री की सलाह को उससे आगे जाकर देखने की ज़रूरत है. वैसे बिप्लब देब ने खुद ही कहा कि युवा पान की दुकान भी खोल सकते हैं. लेकिन सवाल उठता है कि जिस मुद्रा योजना के आधार पर बिप्लब देब युवाओं को सरकारी नौकरी के पीछे भागने के बजाय अपनी-अपनी दुकानें खोलने की सलाह दे रहे हैं उसका हाल क्या है.

योजना की सेहत

करीब दो साल पहले मुद्रा योजना की शुरुआत हुई थी. इसका उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि गरीबों की सबसे बड़ी पूंजी उनका ईमान है और इस ईमान के साथ पूंजी का मेल छोटे उद्यमियों की सफलता की कुंजी होगा.

ऐसा हुआ है या नहीं, यह नहीं कहा जा सकता. लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि दो साल बाद इस योजना की अपनी सेहत जरूर बिगड़ी दिखती है. हाल में आईं कुछ रिपोर्टों के मुताबिक़ छत्तीसगढ़ में मुद्रा योजना के तहत दिए गए क़र्ज़ में से 50 प्रतिशत की वसूली नहीं हो पाई है. यह भी पता चला है कि क़र्ज़ लेने वालों ने अपने आधार में दर्ज स्थायी पते भी बदल लिए. यह देखते हुए अब बैंकों ने भी क़र्ज़ देना मुश्किल कर दिया है. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ उन्होंने ख़ुद से ही मुद्रा योजना में इन्कम टैक्स रिटर्न अनिवार्य कर दिया है. इससे नए बेरोजगारों को क़र्ज़ लेने में ख़ासी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है. सैकड़ों आवेदन लंबित पड़े हैं जिनके आवेदकों को क़र्ज़ नहीं मिल रहा.

जानकारों के मुताबिक यह स्थिति इसलिए बनी कि सरकार का लक्ष्य पूरा करने के लिए बैंकों द्वारा अनाप-शनाप तरीक़े से क़र्ज़ बांट दिए गए. अब हालत यह है कि स्टेट बैंक द्वारा दिए गए 75 प्रतिशत और ग्रामीण बैंक द्वारा दिए गए 99 प्रतिशत मुद्रा लोन डूबने की स्थिति में पहुंच गए हैं. बैंकों ने आधार लिंक के ज़रिये प्राप्त जानकारी को क़र्ज़दारों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. बताया जा रहा है कि बैंक क़र्ज़ नहीं चुकाने वाले खाताधारकों को डिफ़ॉल्टर घोषित करेंगे जिसके बाद उन्हें किसी भी बैंक से क़र्ज़ नहीं मिलेगा.

ज़्यादा क़र्ज़ शिशु वर्ग के तहत मिल रहा है

जूस, पकौड़ा या पान की दुकान खोलनी हो तो यह काम कम रुपयों में हो सकता है, लेकिन थोड़ा बड़ा रोज़गार या बिज़नेस खड़ा करना हज़ारों रुपये का खेल नहीं है. इसके लिए लाखों रुपयों की ज़रूरत पड़ सकती है. लेकिन मुद्रा योजना के तहत बड़े क़र्ज़ मुश्किल से ही मिल पा रहे हैं.

मुद्रा योजना के तहत तीन श्रेणियों में क़र्ज़ दिया जाता है : शिशु, किशोर और तरुण वर्ग. शिशु वर्ग के तहत 50,000 रुपये तक का क़र्ज़ मुहैया कराया जाता है. किशोर वर्ग में पांच लाख तक का लोन लेने की सुविधा है. वहीं, तरुण वर्ग के आवेदक पांच से दस लाख तक का लोन ले सकते हैं. योजना की अच्छी बात यह है कि सरकार क़र्ज़ देने के बदले आवेदकों से उनकी ज़मीन या गहने गिरवी नहीं रखवाती.

लेकिन ग़ौर करने वाली बात यह भी है कि ज़्यादातर क़र्ज़ शिशु वर्ग के तहत दिए जा रहे हैं. 2016-17 के आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि इस वर्ग के तहत आए ऋण आवेदनों में से 90 प्रतिशत से ज़्यादा मंजू़र हो गए और लोगों को आसानी से क़र्ज़ मिल गया. दूसरी तरफ, किशोर और तरुण वर्ग के तहत केवल क्रमशः 19 व 12 प्रतिशत आवेदकों को लोन मिलना संभव हो पाया.

और ये भी केवल छत्तीसगढ़ के आंकड़े हैं. राष्ट्रीय स्तर पर बात करें दो इन दोनों वर्गों के तहत केवल 6.7 (किशोर वर्ग) व 1.4 (तरुण वर्ग) प्रतिशत ऋण आवेदन स्वीकृत हो पाए. इससे साफ़ संकेत मिलता है कि बैंक लोगों को क़र्ज़ देने में आनाकानी कर रहे हैं. जानकार इसकी वजह उनके डर को बताते हैं. डर यह कि पैसा वापस नहीं मिलेगा.

वहीं, शिशु वर्ग के तहत दिए गए क़र्ज़ का औसत निकालें तो पता चलता है कि हरेक आवेदक को औसतन मात्र 23,000 से 30,000 रुपये का ऋण प्राप्त हुआ. उससे पहले के साल में यह राशि 20,000 से भी कम थी. सवाल किया जा रहा है कि भला इतनी कम राशि में कोई बेरोज़गार नया काम-धंधा कैसे शुरू कर सकता है.

भ्रष्टाचार और बैंकों की मनमानी

सरकार की यह योजना बैंककर्मियों की मनमानी और दलालों के फेर में भी फंस गई दिखती है. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ कई मामलों में देखा गया है कि बैंक के लोग अपनी पसंद के आवेदक को लोन दे रहे हैं तो किसी दूसरे व्यक्ति की फ़ाइल में कोई न कोई कमी निकाल कर उसे वापस भेज रहे हैं. इसके अलावा कहीं शासन या प्रशासन द्वारा तय किए गए लक्ष्य को पूरा करने के चक्कर में लोन दिए जा रहे हैं. चूंकि योजना बैंककर्मियों के भरोसे चल रही है इसलिए उनमें से कुछ अपनी जेब भरने में लगे हैं.

राजस्थान के बाड़मेर में पंजाब नेशनल बैंक की दो शाखाओं में इसकी मिसाल देखने को मिली. ख़बरों के मुताबिक़ फ़रवरी में सीबीआई ने यहां 80 लाख रुपये के घोटाले का पर्दाफ़ाश किया था. रिपोर्टों की मानें तो नियमों की अनदेखी करते हुए बाड़मेर शाखा ने 26 खाताधारकों को कुल 62 लाख रुपये का क़र्ज़ दे दिया. नियमानुसार बैंक मैनेजर या किसी अधिकारी को लोन से संबंधित लोकेशन पर जाकर जांच करनी होती है. लेकिन ऐसा किए बिना ही उसका ज़िक्र लोन से जुड़े दस्तावेज़ों में कर दिया गया. योजना के एक नियम के मुताबिक़ कोई बैंक 25 किलोमीटर के दायरे के बाहर लोन नहीं दे सकता. लेकिन रिपोर्टों के मुताबिक़ बैंक ने 100 किलोमीटर दूर रहने वाले खाताधारकों को भी लोन दे दिए.

उधर, सीबीआई को यह भी शक है कि जिन खातों में क़र्ज़ की रक़म भेजी गई वे फ़र्ज़ी हो सकते हैं. बाड़मेर में पंजाब नेशनल बैंक की एक दूसरी शाखा में हुई गड़बड़ी के मामले में पाया गया कि बैंक द्वारा एक खाताधारक के खाते में भेजा गया पैसा प्राप्ति वाले दिन ही किसी दूसरे व्यक्ति के खाते में ट्रांसफ़र कर दिया गया. बताया गया कि शाखा के मैनेजर के परिवारवालों के खातों में भी रक़म भेजी गई.

फ़रवरी में ही टाइम्स ऑफ इंडिया ने राजस्थान के जयपुर में मुद्रा योजना के तहत दिए गए क़र्ज़ में 64 करोड़ रुपये की गड़बड़ी की ख़बर दी थी. सीबीआई ने उस मामले में पीएनबी की एक शाखा के बैंक मैनेजर के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया था. जांच एजेंसी ने मैनेजर के ठिकानों पर छापे भी मारे थे.

कुछ यही हाल दूसरे राज्यों में भी है. फ़रवरी में ही बिहार में योजनाओं (किसान क्रेडिट कार्ड, मुद्रा योजना आदि) के नाम पर पांच सरकारी बैंकों (बैंक ऑफ इंडिया, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक, पंजाब नेशनल बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा) को 500 करोड़ रुपये का चूना लगने की ख़बर आई थी. इन बैंकों के कर्मचारियों पर आरोप था कि उन्होंने बिचौलियों के साथ मिलकर फ़र्ज़ी प्रमाणपत्र और अन्य संदिग्ध दस्तावेजों के ज़रिये बैंकों से लोन बांट कर उन्हें नुक़सान पहुंचाया.

सरकार को मिल रहे फ़र्ज़ी आंकड़े

मोदी सरकार दावा कर रही है कि उसने 11 करोड़ युवाओं को क़रीब पांच लाख करोड़ रुपये का मुद्रा लोन दिया. लेकिन जानकार सवाल कर रहे हैं कि उनमें से कितने वास्तविक ज़रूरतमंदों को लोन मिला और जिनको मिला उनकी ज़िंदगी में कितना बदलाव आया. इस योजना को लेकर बैंककर्मियों की मनमानी और भ्रष्टाचार को देखते हुए कई जानकार इस पर सवाल खड़ा करते हैं.

फ़र्स्ट पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ वॉशिंगटन स्थित मिडिल ईस्ट मीडिया रिसर्च इंस्टीट्यूट में सीनियर फेलो तुफ़ैल अहमद बताते हैं कि मुद्रा योजना के तहत बैंकों द्वारा दिए जा रहे आंकड़े फ़र्ज़ी हैं और ग़लत आंकड़े ऊपर (सरकार) तक पहुंचाए जा रहे हैं. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि बैंक मुद्रा योजना के नाम पर जो लोन दिखा रहे हैं वे वास्तव में साधारण लोन हैं, लेकिन बताया यह जा रहा है कि ये मुद्रा योजना के तहत दिए गए. रिपोर्ट की मानें तो क़र्ज़ के लिए आवेदकों को इन्कम टैक्स रिटर्न और सिक्योरिटी देनी पड़ रही है. सवाल किया गया कि अगर ऐसा है तो फिर उन्हें मुद्रा लोन कैसे कहा जा सकता है.

रोज़गार सृजन की नाकामी छिपाने का बहाना?

सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में बेरोज़गारों की संख्या तीन करोड़ के पार जा चुकी है. बढ़ती बेरोज़गारी मौजूदा सरकार की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है जिससे निपटने में वह अब तक कामयाब नहीं हो पाई है. राजनीतिक विरोधी और आलोचक कहते हैं कि इसी नाकामी को छिपाने के लिए भाजपा नेता (जैसे बिप्लब कुमार देब) अब मुद्रा योजना का सहारा ले रहे हैं. 2014 के चुनाव के समय हर साल दो करोड़ रोज़गार देने का वादा किया गया था, लेकिन इस मोर्च की विफलता और अगले आम चुनाव को देखते हुए रोज़गार को अब स्वरोज़गार में बदला जा रहा है.