प्रसिद्ध चेक उपन्यासकार मिलान कुंदेरा के उपन्यास ‘द बुक ऑफ़ लॉफ्टर एंड फॉर्गेटिंग’ के शुरु में एक व्यक्ति अपने गांव जा रहा है ताकि वह अपनी स्मृतियों को ताज़ा कर सके. एकाधिकारवादी सत्ता के तहत रहते-रहते उसे लगता है कि वह अपनी स्मृति को खो रहा है. वह कहता है - सत्ता के ख़िलाफ़ संघर्ष भूलने के ख़िलाफ़ संघर्ष है.

मिलान कुंदेरा अगले साल नब्बे के हो जाएंगे. पिछले क़रीब 50 साल से वे फ़्रांस में रह रहे हैं. तत्कालीन चेकोस्लोवाकिया की कम्युनिस्ट सरकार ने उन्हें बेदख़ल कर दिया था. मिलान साम्यवाद के विरोधी रहे हैं, इसका अर्थ यह नहीं है कि वे पूंजीवादी सत्ताओं के समर्थक हैं. उनका मानना रहा है कि सत्ताएं अक्सर व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने के लिए एक से तरीक़े अपनाती हैं.

कुंदेरा के लेखन में निजी और सामूहिक स्मृति का बड़ा महत्व है. उनके लेखन में यह बात बार बार उभरती है कि सत्ताएं व्यक्ति और समाज पर राज करने के लिए उनकी स्मृतियों को नियंत्रित करना चाहती हैं. व्यक्ति हो या समाज, उनका व्यक्तित्व उनकी स्मृतियों से ही बनता है. अगर उनकी स्मृतियों को अपनी मर्ज़ी के अनुसार बदला जा सके तो फिर उन्हें अपनी मर्ज़ी के अनुसार चलाया भी जा सकता है. कुंदेरा एक जगह कहते हैं कि इसीलिए जो एकाधिकारवादी सत्ताएं आपके भविष्य को बदलने का दावा करती हैं, वास्तव में उनका सारा ज़ोर आपके अतीत पर होता है.

भारत में इन दिनों इतिहास को लेकर जैसी सिरफुटौव्वल मची है उसे इस संदर्भ में समझा जा सकता है. इसलिए इस बात से हैरान होने की जरूरत नहीं है कि हमारी सरकार और उससे जुड़े लोग जो हमारे लिए अच्छे दिन लाने का वादा करके सत्ता में आए थे वे इतिहास पर क्यों जुटे पड़े हैं. इन्हें कोई यह क्यों नहीं पूछता कि भाई अच्छे दिन तो भविष्य में आने चाहिए, तो आप इतिहास पर क्यों इतना ज़ोर लगा रहे हैं?

वास्तविकता यह है कि इन ताकतों का उद्देश्य देश का भविष्य नहीं, अतीत बदलना है. यदि आप समाज की स्मृतियों की अपने हिसाब से प्रोग्रामिंग करने में कामयाब हो गए तो आप उसके भविष्य की गतिविधियों और चिंतन को भी अपनी मर्ज़ी से प्रोग्राम कर पाएंगे. अगर किसी समाज में स्मृतियों के अनेक स्तर हैं, उनमें विविध प्रवाह हैं तो उसे नियंत्रित करना आसान नहीं होगा. उसमें स्वतंत्र चिंतन और गति की संभावनाएं बनी रहेंगी.

अभी भारत में जो लोग एक नया इतिहास बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वे हिंदुत्ववादी हैं. अगर हम यह देखें कि उनके निशाने पर इतिहास के कौन से कालखंड हैं तो यह समझ में आ जाएगा कि उनकी कोशिश क्या है. उनके निशाने पर भारतीय इतिहास के दो कालखंड हैं-पहला आज़ादी की लड़ाई का दौर और दूसरा मुग़ल काल.

हिंदुत्ववादी राजनीति का आधार ही हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य और दुश्मनी है और इन दोनों कालखंडों में भारत के इतिहास में सर्वधर्मसमभाव का पक्ष प्रबल रहा है. आज़ादी की लड़ाई के दौर में महात्मा गांधी के नेतृत्व में जो आंदोलन था, वही सबसे प्रबल था और हिंदू मुस्लिम एकता उसके मुख्य आधारों में से एक रही है. जो लोग सशस्त्र संघर्ष की राह पर चल रहे थे उनके भी बुनियादी सिद्धांतों मे धर्मनिरपेक्षता थी. हिंदुत्ववादी या मुस्लिम लीगी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़ाई में कहीं नहीं थे. इसी वजह से पाकिस्तान में जो इतिहास पढ़ाया जाता है उसमें आज़ादी की लड़ाई ही ग़ायब है और हिंदू-मुस्लिम विरोध केंद्र में है.

हमारे यहां यह संभव नहीं था कि आज़ादी के आंदोलन को ग़ायब कर दिया जाता क्योंकि आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले लोगों के हाथ ही सत्ता आई.जवाहरलाल नेहरू से हिंदुत्ववादियों का विरोध इसलिए है क्योंकि आज़ादी और सांप्रदायिक आधार पर विभाजन के बावजूद उन्होंने आज़ादी के आंदोलन के धर्मनिरपेक्षता के मूल्य को आज़ाद भारत में भी बनाए रखा इसके अलावा उन्होंने एक सच्चे लोकतांत्रिक नेता की तरह वैचारिक और सांस्कृतिक विविधता को प्रोत्साहित किया. इसलिए नेहरू, सरदार पटेल और भगत सिंह को लेकर तरह-तरह की कहानियां गढ़ी जाती हैं.

यह भी दिलचस्प है कि हिंदुत्ववादियों का विरोध मुग़ल काल और उसमें भी अकबर को लेकर है. तुग़लक़ या लोदी वंश के राज को लेकर वे बात नहीं करते. इसकी वजह यह है कि अकबर हिंदू-मुस्लिम विद्वेष की अवधारणा के ख़िलाफ़ खड़े दिखते हैं जो कि हिन्दुत्ववादी सिद्धांत की बुनियाद है. अकबर के ही इस सिलसिले को काफी हद तक जहांगीर और शाहजहां ने भी जारी रखा. छत्रपति शिवाजी ने औरंगज़ेब को जो पत्र लिखवाकर भेजा उसमें उन्होंने यही लिखा था कि औरंगज़ेब सम्राट अकबर, जहांगीर और शाहजहां जैसे महान पूर्वजों की सर्वधर्मसमभाव की नीति पर नहीं चल रहे हैं.

अकबर, गांधी और नेहरू भारतीय इतिहास में सर्वधर्मसमभाव के सबसे महान और यशस्वी उदाहरण हैं. अगर इन्हें बदनाम कर दिया जाए तो पिछले हज़ार साल के इतिहास के हिंदू-मुस्लिम द्वंद्व का इतिहास साबित करना उतना मुश्किल नहीं होगा. यह हमारी सामूहिक स्मृति को विकृत करके उसे मनचाही दिशा में मोड़ने की कोशिश है.

अब यह हमारे ऊपर है कि हम अपनी स्वाभाविक स्वतंत्र स्मृति को बनाए रखते हैं या किसी कंप्यूटर की तरह अपने को प्रोग्राम करने और अपना इस्तेमाल करने का हक़ किसी को दे देते हैं.