डालमिया भारत समूह द्वारा लाल किले के रख-रखाव की जिम्मेदारी लेने की घटना ने ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण से जुड़ी एक जरूरी बहस फिर शुरू कर दी है. केंद्र सरकार की ‘एडॉप्ट ए हेरिटेज’ योजना के तहत यह कॉरपोरेट समूह किसी ऐतिहासिक स्थल को गोद लेने वाला देश का पहला व्यापारिक घराना है. इस समूह ने 25 करोड़ रुपये में लाल किले के रख-रखाव का कॉन्ट्रेक्ट जीता है. यह कॉन्ट्रेक्ट पांच साल के लिए है और इस दौरान इस रकम से लाल किले के ‘लाइट एंड साउंड शो’ का संचालन होगा, साथ ही यहां पर्यटकों के लिए जनसुविधाओं का विकास किया जाएगा.

इस घटना के बाद सरकार की इस योजना पर कई सवाल उठ रहे हैं. मसलन – क्या किसी निजी प्रतिष्ठान को ऐतिहासिक स्थलों या स्मारकों के रख-रखाव की जिम्मेदारी दी जा सकती है? क्या सदियों पुराने अवशेषों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता? और क्या एएसआई के पास अपने काम के लिए फंड, विशेषज्ञता और सबसे महत्वपूर्ण, स्मारकों के संरक्षण के लिए जरूरी इच्छाशक्ति है भी?

एएसआई डेढ़ सौ साल से ज्यादा पुरानी एजेंसी है और आधिकारिक रूप से भारत के 3600 ऐतिहासिक स्थलों-स्मारकों के रख-रखाव का काम देखती है. लेकिन इस काम में इसकी असफलता का सबसे बड़ा उदाहरण आए दिन सुर्खियां बटोरता रहता है. एएसआई ताज महल को सालों से प्रदूषण के प्रभाव से बचाने की कोशिश कर रही है और इस दौरान उसकी वैज्ञानिक शाखा की अक्षमता भी लगातार उजागर हुई है. 1994 से एएसआई के कामगार पूरी मेहनत के साथ इस इमारत के गुंबद और मीनारों पर एक विशेष प्रकार की सामग्री का लेप लगा रहे हैं, ताकि इसकी खूबसूरती बरकरार रहे, लेकिन यह कोशिश अब भी एक तात्कालिक इलाज ही है.

दिक्कत ये है कि आज एएसआई को लगता है कि उसका मुख्य काम स्मारक देखने आ रहे लोगों पर निगरानी रखना और इन स्थलों को अवैध अतिक्रमण से बचाना भर है. हैरानी वाली बात है कि वह इस काम में भी बुरी तरफ असफल साबित हुई है. नियंत्रक और लेखा महापरीक्षक (कैग) ने 2013 में बताया था कि एएसआई के संरक्षण के जिम्मे आने वाले 90 स्मारक ‘गायब’ हो चुके हैं. वहीं पिछले साल संस्कृति और पर्यटन राज्य मंत्री ने लोक सभा में जानकारी दी थी कि 24 और स्मारकों का अस्तित्व खत्म हो चुका है.

आज अगर कॉरपोरेट समूहों को ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण के काम में शामिल किया जा रहा है तो इस पहल को एएसआई की असफलता के लिहाज से भी देखे जाने की जरूरत है. एक बात यह भी है कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में व्यापारिक घराने ऐतिहासिक विरासतों को सहेजने-संवारने के काम में शामिल किए जाते हैं.

भारत में ही पिछले दिनों आगा खान ट्रस्ट और दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने दिल्ली स्थित हुमायूं के मकबरे की मरम्मत का काम किया था. सरकार से बाहर की एजेंसियों को ये सब काम सौंपे जाने चाहिए, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि सरकार इन कामों की अच्छे से निगरानी करे. हुमायूं के मकबरे की मरम्मत के काम की निगरानी एएसआई ने की थी, हालांकि 2013 की कैग रिपोर्ट के मुताबिक उसके इस काम में भी भारी कोताही बरती गई थी. तो फिर ऐसे में सवाल है कि क्या अब इस सरकारी एजेंसी ने जरूरी सबक सीखलिए हैं? या फिर ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासतों के संरक्षण के लिए और बड़े और हटके कुछ कदम उठाने की जरूरत है? (स्रोत)