भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अंदर पिछले कुछ दिनों से एक चर्चा जोर पकड़ रही है. चर्चा यह है कि जाने-माने भोजपुरी गायक और अभिनेता मनोज तिवारी की दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पद से विदाई होने वाली है. इसकी कई वजहें बताई जा रही हैं. लेकिन उन वजहों में जाने से पहले दिल्ली की राजनीति में मनोज तिवारी के सक्रिय होने और उनके प्रदेश अध्यक्ष बनने से संबंधित पृष्ठभूमि की थोड़ी जानकारी जरूरी है.

2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव हो रहे थे. उस वक्त भाजपा के कई नेताओं ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर यह दबाव बनाया कि पूर्वांचल के लोगों को ठीक-ठाक संख्या में टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारा जाए. बताया जाता है कि जिन नेताओं ने केंद्रीय नेतृत्व को बार-बार यह सलाह दी उनमें एक प्रमुख नाम आरके सिन्हा का है जो फिलहाल बिहार से राज्यभा सांसद हैं. लेकिन उस विधानसभा चुनाव में टिकटों के बंटवारे में इस सलाह की कोई खास कद्र नहीं की गई.

इसके बाद जब 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए टिकटों को लेकर भाजपा के अंदर मंथन शुरू हुआ तो पार्टी में इस बात पर लगभग सहमति बन गई कि दिल्ली की सात लोकसभा सीटों में से कम से कम एक सीट पर पूर्वांचल के किसी व्यक्ति को टिकट दिया जाए. फिर इस पर माथापच्ची शुरू हुई कि वह सीट कौन सी हो. लेकिन आम आदमी पार्टी की ओर से जब यह साफ हो गया कि उत्तर पूर्वी दिल्ली की सीट से बनारस के रहने वाले और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर रहे आनंद कुमार उम्मीदवार होंगे तो फिर भाजपा ने भी तय कर लिया कि इसी सीट पर पूर्वांचल का उम्मीदवार उतारा जाए.

लोकसभा चुनावों के कुछ महीने पहले ही मनोज तिवारी भाजपा में शामिल हुए थे. भाजपा में आने से पहले से वे समाजवादी पार्टी की ओर से लोकसभा चुनाव लड़ चुके थे, लेकिन नाकाम रहे थे. भाजपा सूत्रों का कहना है कि मनोज तिवारी को भाजपा में लाने का माध्यम आरके सिन्हा बने. जब दिल्ली की एक सीट पर पूर्वांचल का उम्मीदवार देने की बात आई तो पार्टी के कई प्रमुख नेताओं ने मनोज तिवारी का नाम सुझाया. मनोज तिवारी को चुनाव लड़ाने का फायदा यह था कि लोग उन्हें नाम और चेहरे से पहचानते थे. जबकि दूसरा ऐसा कोई और उम्मीदवार उस वक्त पार्टी के पास नहीं था.

हालांकि, मनोज तिवारी खुद इस सीट से चुनाव नहीं लड़ना चाह रहे थे. सूत्रों के मुताबिक उनकी पसंद बिहार की बक्सर सीट थी. बिहार भाजपा भी चाहती थी कि मनोज तिवारी बक्सर से चुनाव लड़ें. लेकिन ऐन मौके पर अश्विनी कुमार चौबे के दबाव में बक्सर का टिकट उन्हें दे दिया गया. ऐसे में मनोज तिवारी के पास उत्तर पूर्वी दिल्ली से चुनाव लड़ने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा. मनोज तिवारी के एक करीबी की मानें तो जब मनोज तिवारी को यह पता चला कि उन्हें उत्तर पूर्वी दिल्ली से उम्मीदवार बनाया जा रहा है तो उस रात वे पहली बार अपना संसदीय क्षेत्र देखने गए.

लोकसभा चुनाव जीतने के बाद 2015 के विधानसभा चुनावों के दौरान एक बार लगा कि मनोज तिवारी के सितारे गर्दिश में आ रहे हैं. उस वक्त उन्होंने पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार किरण बेदी को लेकर एक विवादास्पद बयान दिया था. उन्होंने तब इस पर शक जताया था कि भाजपा किरण बेदी को मुख्यमंत्री बनाएगी. बताया जाता है कि उस बयान पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मनोज तिवारी को बुलाकर फटकार लगाई थी. उसके बाद ऐसा लगा कि मनोज तिवारी के लिए दिल्ली की राजनीति में टिक पाना आसान नहीं है.

लेकिन 2016 का अंत आते-आते स्थितियां मनोज तिवारी के पक्ष में बनती गईं और उन्हें दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बना दिया गया. पार्टी का आकलन यह था कि भाजपा के पारंपरिक समर्थक तो उसके साथ हैं ही, लेकिन मनोज तिवारी को आगे करने से पूर्वांचल के लोग एक वोट बैंक के तौर पर भाजपा के साथ आ जाएंगे. 2017 के निगम चुनावों में भाजपा की कामयाबी का श्रेय मनोज तिवारी के समर्थकों ने उन्हें दिया. हालांकि पार्टी के दूसरे नेताओं का कहना है कि निगम में तो भाजपा हमेशा से जीतती आई है, प्रदेश अध्यक्ष चाहे कोई भी रहा हो.

दिल्ली प्रदेश भाजपा के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व का यह समीकरण अब गड़बड़ाता दिख रहा है कि पूर्वांचल के व्यक्ति को प्रदेश भाजपा की कमान देने के बावजूद पार्टी के पारंपरिक मतदाता उसके साथ बने रहेंगे. दिल्ली भाजपा में पारंपरिक तौर पर स्थानीय नेताओं का दबदबा रहा है जिनकी जड़ें पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रही हैं. मदनलाल खुराना से लेकर साहिब सिंह वर्मा और बाद की पीढ़ी में अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, विजय गोयल, हर्षवर्धन और जगदीश मुखी जैसे नेताओं के नाम इसी कड़ी में लिए जा सकते हैं.’

इन पदाधिकारी की मानें तो दिल्ली प्रदेश भाजपा के पारंपरिक नेता, कार्यकर्ता और समर्थक मनोज तिवारी को अपने नेता के तौर पर स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं. इसकी एक वजह यह भी है कि ये लोग खुद को दिल्ली का मानते हैं और पूर्वांचल के लोगों को बाहर का. इस खींचतान में पार्टी का नुकसान हो रहा है और कई बार प्रदेश भाजपा एक स्वर में बोलती हुई नहीं दिखती है. उदाहरण के लिए विजय गोयल दिल्ली विश्वविद्यालय में दिल्ली के छात्रों के लिए आरक्षण की मांग करते हैं तो मनोज तिवारी इसका विरोध करते हैं. वैसे भी विजय गोयल और मनोज तिवारी एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं देखना चाहते. दोनों के समर्थकों में कुछ मौकों पर टकराव भी हुए हैं.

भाजपा के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी कहते हैं, ‘हमें उम्मीद थी कि मनोज तिवारी सभी वर्गों को साथ लेकर चलेंगे. अध्यक्ष होने के नाते मतभेदों को दूर करने की पहल भी कई बार खुद ही करनी पड़ती है. अगर वे ऐसा करते तो इससे उनका राजनीतिक कद और बढ़ता. लेकिन ऐसा करने में मनोज तिवारी नाकाम रहे हैं.’ मनोज तिवारी को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए जाने के सवाल पर वे कहते हैं, ‘कई प्रदेशों में प्रदेश नेतृत्व पार्टी ने बदले हैं. दिल्ली में भी मांग उठ रही है. कर्नाटक चुनाव के बाद संभव है कि इस बारे में कोई निर्णय हो.’