बीते सोमवार को इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक पावरप्वाइंट प्रेजेंटेशन के ज़रिए दुनिया के सामने ईरान के खिलाफ कई सबूत पेश किए. इस दौरान उन्होंने दावा किया कि ईरान लंबे समय से दुनिया से झूठ बोलता आ रहा है कि उसने कभी परमाणु हथियार कार्यक्रम शुरू करने की कोशिश नहीं की थी. इजरायली प्रधानमंत्री ने सबूत के तौर पर हजारों फ़ाइलें और सीडी पेश करते हुए कहा कि ये ईरान के गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम से जुड़े दस्तावेज हैं जिन्हें बीती जनवरी में इजरायली खुफिया एजेंसी ने तेहरान में छापेमारी कर हासिल किया था. नेतन्याहू के मुताबिक इन सबूतों से पता चलता है कि ईरान ने दुनिया की नज़रों से छिपाकर परमाणु हथियार बनाने की पूरी कोशिश की थी.

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बेंजामिन नेतन्याहू ने आगे बताया कि ईरान के इस परमाणु हथियार कार्यक्रम का नाम ‘अमद’ था, जिसका लक्ष्य मिसाइलों के लिए पांच परमाणु हथियार बनाकर उनका परीक्षण करना था. उन्होंने यह दावा भी किया कि जुलाई 2015 में ईरान ने विश्व की छह शक्तियों के साथ किये परमाणु करार के बाद भी अपनी इन कोशिशों को जारी रखा. उनके मुताबिक साल 2017 में ईरान ने परमाणु हथियार कार्यक्रम से जुड़े दस्तावेज छिपा दिए ताकि भविष्य में मौका मिलने पर दोबारा इस कार्यक्रम को शुरू किया जा सके.

ये ‘सनसनीखेज’ दावे सवालों के घेरे में क्यों हैं?

बेंजामिन नेतन्याहू ने अपने दावों को कुछ इस अंदाज में पेश किया था जैसे वे बहुत बड़ा खुलासा कर रहे हैं. हालांकि ईरान मामले से जुड़े कई जानकार उनके इन ‘सनसनीखेज’ दावों पर कई तरह के सवाल खड़े करते हैं. इन लोगों का कहना है कि इजरायली प्रधानमंत्री के दावों में कुछ भी सनसनीखेज नहीं है और ये सारी बातें इस मामले से जुड़े सभी पक्षों को पहले से पता हैं. नेतन्याहू अब जिस ‘अमद’ कार्यक्रम की बात कर रहे हैं वह ईरान का गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम था जिसे उसने 2002-03 में शुरू किया था. इन लोगों के मुताबिक यह वही कार्यक्रम है जिसकी वजह से ईरान पर दुनियाभर ने प्रतिबंध लगाये थे और बाद में जर्मनी, रूस, फ़्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन और चीन ने इसे बंद करने के लिए ही ईरान से परमाणु समझौता किया था.

ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) को ईरान की गतिविधियों पर नजर रखने की जिम्मेदारी दी गई है. आईएईए और उसके पूर्व मुख्य जांचकर्ता ओली हेनोन का भी कहना है कि इजरायली प्रधानमंत्री के दावों में कुछ भी नया नहीं है और पता नहीं वे अब अचानक क्यों इन दावों को दुनिया के सामने रख रहे हैं. हेनोन बताते हैं कि वे ये सारी तस्वीरें और सबूत जो नेतन्याहू ने सोमवार को सनसनीखेज बताकर पेश किए आज से दस साल पहले ही देख चुके हैं. साथ ही आईएईए अपनी कई रिपोर्टों में ईरान के ‘अमद’ परमाणु कार्यक्रम के बारे में दुनिया को बता चुकी है. इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया था ईरान ने परमाणु हथियार बनाने और मिसाइलों के जरिये उनके परीक्षण की योजना बना ली थी.

नेतन्याहू के कथित खुलासे के अगले ही दिन आईएईए ने एक बयान जारी कर कहा भी कि जो दावे इजरायली प्रधानमंत्री कर रहे हैं, उनके बारे में वह 2015 में विस्तार से अपनी अंतिम रिपोर्ट में बता चुकी है. आईएईए के मुताबिक उसकी इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि ईरान ने 2009 के बाद से परमाणु हथियार कार्यक्रम शुरू करने की कोई कोशिश नहीं की है.

तो फिर नेतन्याहू की इस कवायद की वजह क्या है?

इस पूरे घटनाक्रम को देखते हुए अब सबसे अहम सवाल यह उठता है कि आखिर बेंजामिन नेतन्याहू ईरान के 15 साल पुराने परमाणु हथियार कार्यक्रम से जुड़े दस्तावेजों को अब सनसनीखेज बनाकर क्यों पेश कर रहे हैं. वे ऐसा करके क्या हासिल करना चाहते हैं. अमेरिका की जानी-मानी पत्रकार और ईरान मामलों की विशेषज्ञ राउला खलफ कहती हैं कि बेंजामिन नेतन्याहू को ड्रामेबाजी करना बहुत पसंद है. वे हमेशा सही वक्त पर अपना ड्रामा शुरू करते हैं. आज से छह साल पहले भी उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में ईरान को दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था. तब एक डायग्राम के जरिये उन्होंने दावा किया था कि ईरान कुछ ही महीनों में बम बनाने के लिए जरूरी 90 फीसदी तक संवर्धित यूरेनियम हासिल करने के करीब पहुंचने वाला है. जबकि, ईरान को लेकर उनका यह दावा आज तक सही साबित नहीं हुआ है.

संयुक्त राष्ट्र आम सभा में डायग्राम के जरिये ईरान द्वारा संवर्धित यूरेनियम हासिल करने का दावा करते इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू
संयुक्त राष्ट्र आम सभा में डायग्राम के जरिये ईरान द्वारा संवर्धित यूरेनियम हासिल करने का दावा करते इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू

ईरान मामलों के कई विशेषज्ञ कहते हैं कि इजरायली प्रधानमंत्री ने एक बार फिर मौका देखकर यह ड्रामा शुरू किया है. इनके मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को 12 मई को ईरान परमाणु समझौते को जारी रखने वाले दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने हैं. ट्रंप को हर 90 दिन में यह प्रमाणित करना होता है कि ईरान परमाणु समझौते का पालन कर रहा है. इससे पहले वे चार बार इसे प्रमाणित कर चुके हैं. लेकिन, बीते जनवरी में उन्होंने इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के बाद कहा था कि वे ऐसा आखिरी बार कर रहे हैं.

जानकारों की मानें तो बेंजामिन नेतन्याहू ट्रंप का रुख देखकर पहले से यह मानकर चल रहे थे कि अमेरिका ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से बाहर निकल आएगा. लेकिन इजरायली प्रधानमंत्री की इस कॉन्फ्रेंस के ठीक तीन दिन पहले जब फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों अमेरिका की यात्रा पर थे तो यहां उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप की उपस्थिति में कहा कि उन्हें आशा है कि ईरान परमाणु समझौता बना रहेगा और इससे जुड़ी अमेरिका की चिंताएं भी दूर की जायेंगी. उनके इस बयान से यह संदेश गया कि यूरोपीय देश डोनाल्ड ट्रंप को इस बार भी मनाने और ईरान परमाणु समझौता बचाने में सफल हो जाएंगे. कुछ अमेरिकी पत्रकार कहते हैं कि हर हाल में ईरान डील तुड़वाने की कोशिश में लगे नेतन्याहू को इसके बाद इस बार भी अपने अरमानों पर पानी फिरता दिखा. और इसी वजह से उन्होंने आनन-फानन में डोनाल्ड ट्रंप का ध्यान अपनी ओर खींचने और ईरान विरोधी चर्चा को हवा देने के लिए पुराने सबूत सनसनीखेज बनाकर पेश कर दिए.

यह भी दिलचस्प है कि इजरायली प्रधानमंत्री के सबूत पेश करने के तुरंत बाद ही डोनाल्ड ट्रंप का भी बयान आया. इसमें उनका कहना था, ‘मैंने ईरान परमाणु कार्यक्रम के बारे में जो कुछ भी जाना था, नेतन्याहू के दावों में वही दिख रहा है. इसका मतलब है कि मैं 100 प्रतिशत सही था.’ ट्रंप के इस बयान से पता चलता है कि पहली नजर में नेतन्याहू ट्रंप को प्रभावित करने में कामयाब हुए हैं. लेकिन, क्या इस बार उनकी यह कोशिश पूरी तरह से सफल होगी, इसका पता 12 मई को ही लगेगा.

यूरोपीय देश ईरान के परमाणु समझौता जारी रखने के हिमायती हैं

90 दिनों के बाद जब भी अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा ईरान परमाणु समझौते को प्रमाणित करने का समय आता है तब दो धड़ों (एक में यूरोपीय देश और दूसरे में सऊदी अरब और इजरायल) के बीच ट्रंप को प्रभावित करने की होड़ लग जाती है. इस मामले में जहां यूरोपीय देश चाहते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप इस समझौते को न तोड़ें. वहीं, सऊदी अरब और इजरायल का मानना है कि इस समझौते में ईरान को काफी सहूलियत दी गई है इसलिए इसे तोड़ कर नया और सख्त समझौता तैयार किया जाए.

यूरोपीय देशों द्वारा इस समझौते को टूटने से बचाने के कई कारण हैं. इन देशों का कहना है कि ईरान द्वारा बैलिस्टिक मिसाइल बनाने और अन्य देशों को हथियार बेचने की बात कहकर (ट्रंप यही कहते हैं) परमाणु समझौता नहीं तोड़ा जा सकता क्योंकि समझौते की शर्तों में ये बातें शामिल ही नहीं थी. इनके मुताबिक बावजूद इसके अगर यह समझौता टूटता है तो ईरान पर फिर दबाव बनाकर उसे नए समझौते के लिए राजी करवाना मुश्किल हो जाएगा. साथ ही ऐसे में ईरान द्वारा गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम फिर शुरू किए जाने का भी खतरा है.

यूरोपीय देशों के परमाणु समझौता न टूटने देने की दूसरी वजह इन देशों द्वारा पिछले दो सालों में ईरान में किया गया अरबों डॉलर का निवेश है. जाहिर है कि अमेरिका के परमाणु समझौते से हटने और ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाने से अरबों डॉलर का यह निवेश डूबने के कगार पर आ जाएगा. साथ ही इसका सीधा प्रभाव इन सभी देशों की अर्थव्यवस्था और रोजगार पर पड़ेगा. ऐसे में ये देश कतई नहीं चाहते कि यह परमाणु समझौता टूटे.