हाल ही में लखनऊ के कैप्टन मनोज पांडे सैनिक स्कूल में लड़कियों को दाखिला दिया गया है. लड़कियों को दाखिला देने वाला यह देश का पहला सैनिक स्कूल है. इससे पहले सैनिक स्कूलों में लड़कियों को दाखिला लेने की अनुमति नहीं थी. प्रवेश परीक्षा के बाद 2018-19 के शैक्षणिक सत्र में कक्षा नौ के लिए देश भर से विभिन्न वर्ग की 15 छात्राओं को चुना गया है.

स्कूल के प्रिंसिपल अमित चटर्जी का कहना है ‘ये लड़कियां बहुत अलग-अलग फैमिली बैकग्राउंड से आई हैं. इन छात्राओं के पिता डाॅक्टर, पुलिसमैन, टीचर और यहां तक कि किसान भी हैं. ये सभी छात्राएं इस संस्थान का हिस्सा बनकर गर्व महसूस कर रही हैं.’

देश में 26 सैनिक और पांच मिलिट्री स्कूल हैं. ये एक तरह के सरकारी बोर्डिंग स्कूल हैं जो भारत के रक्षा मंत्रालय के तहत आते हैं. लेकिन लखनऊ का यह सैनिक स्कूल रक्षा या सेना के बजाय राज्य सरकार के अधीन है. उत्तर प्रदेश सरकार इसकी फंडिंग करती है. इस सैनिक स्कूल से पिछले 57 सालों के दौरान 1000 से ज्यादा छात्र सेना में अधिकारी नियुक्त हो चुके हैं. इन स्कूलों की स्थापना का मुख्य लक्ष्य समाज के सभी वर्गों के बच्चों की सेना में बतौर अधिकारी भर्ती होने में मदद करना है. इसी उद्देश्य से इन स्कूलों में छात्रों को स्कूली शिक्षा के साथ-साथ सेना में अधिकारी बनने के लिए भी ट्रेनिंग दी जाती है.

भारत में पहली बार 1992 सेना में नॉन मेडिकल महिला अधिकारियों की भर्ती हुई थी. आज हमारे देश की थल सेना में लगभग चार, जल सेना में पांच और वायु सेना में करीब में 13 फीसदी महिला अधिकारी हैं. लेकिन इतनी संख्या में महिलाओं के सेना में प्रवेश के बाद भी सेना में भर्ती की तैयारी कराने वाले स्कूलों में लड़कियों का दाखिला लेना बहुत दूर की कौड़ी है.

जानकारों का कहना है कि सेना में महिलाओं की भर्ती को लेकर समाज का रवैया कोई बहुत सकारात्मक नहीं है. भारतीय समाज में अभी भी सेना को सिर्फ लड़कों का ही कार्यक्षेत्र समझा जाता है. इसी कारण सिर्फ लड़कों को ही सेना में भेजने में मदद करने के ख्याल से इन सैनिक और मिलिट्री स्कूलों में आज तक सिर्फ उनका ही दाखिला होता रहा है.

सैनिक स्कूलों में लड़कियों की भर्ती में इतनी देर इशारा करती है कि परिवारों की तरह शिक्षा संस्थान भी लड़कियों की व्यावसायिक सफलता में लिंगभेदी रवैया अपनाते हैं. ये सैनिक स्कूल इस बात का बहुत अच्छा उदाहरण हैं कि कैसे हमारा समाज और संस्थाएं लड़के-लड़कियों को व्यावसायिक सफलता के बराबर मौके नहीं देती. वैसे यह केवल सेना की ही बात नहीं है. ज्यादातर क्षेत्रों में व्यावसायिक सफलता के जितने मौके लड़कों को मिलते हैं उतने लड़कियों को नहीं मिलते.

खेल, सेना, पैरा मिलिट्री फोर्स, पुलिस, राजनीति, प्रबंधन आदि बहुत से क्षेत्रों को तो एक बड़ी आबादी आज भी लड़कियों का कार्यक्षेत्र नहीं समझती. बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि भारतीय समाज के एक बड़े हिस्से में आज भी लड़कियों को सिर्फ स्कूल की अध्यापिका बनने के लिये ही प्रोत्साहित किया जाता है. निसंदेह घर, परिवार और बच्चे की जिम्मेदारियों के साथ अध्यापिका की नौकरी सबसे ज्यादा सहयोगी होती है. लेकिन बात यह है कि पति और परिवार के सहयोग से आज बहुत सी महिलाएं सभी व्यवसायों में सफलतापूर्वक काम कर रही हैं.

समाज और सामाजिक संस्थाओं का यह दायित्व बनता है कि वे लड़कियों को भी लड़कों के समान सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ने का सामान अवसर दें. न कि यह तय करें कि लड़कियों को कौन सा व्यवसाय अपनाना चाहिये और कौन सा नहीं.व्यावसायिक सफलता की सबसे बुनियादी जरूरत है अच्छी शिक्षा. लेकिन भारतीय समाज में ज्यादातर परिवार आज भी लड़कियों की शिक्षा की लेकर बहुत सजग नहीं हैं. या तो उन्हें ज्यादा पढ़ाया ही नहीं जाता या फिर सिर्फ शादी करने भर के लिये उन्हें कोई भी डिग्री दिलवा दी जाती है.

लड़कों के भविष्य को लेकर हमेशा ही परिवार वाले बहुत पहले से सजग होते हैं और उसी दिशा में स्कूली या व्यावसायिक शिक्षा उन्हें दी जाती है. लेकिन इसके बिल्कुल विपरीत लड़की के करियर को लेकर अक्सर ही घर वालों का रवैया बेहद लापरवाही भरा होता है. यह भी देखने में आता है कि बेटों को अक्सर ही महंगे, अंग्रेजी माध्यम वाले प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाया जाता है जबकि लड़कियों को अक्सर ही हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूलों में. हालांकि तेजी से शहरी होते भारत में अब यह स्थिति बदल रही है.

उच्च और व्यावसायिक शिक्षा के सभी अवसरों पर अक्सर ही पहला हक घर के लड़कों का होता है. आज भी बहुत से लोगों का सोचना यही है कि लड़की को तो शादी के बाद सिर्फ रसोई संभालनी है और बच्चे पैदा करने हैं, इसलिये उसे अच्छी, ऊंची और व्यावसायिक शिक्षा की क्या जरूरत है. शिक्षा की यह कमजोर बुनियाद और कोई व्यावसायिक डिग्री न होना, वैवाहिक संबंध बिगड़ने के समय लड़कियों के लिये सबसे बड़ी टीस बनके उभरता है.

समाज और शैक्षिक संस्थाओं को लड़कियों की व्यावसायिक सफलता को एक बड़े दायरे में देखने की जरूरत है. कोई नौकरी करना लड़कियों को न सिर्फ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाता है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था के समग्र विकास में भी अहम भूमिका निभाता है. स्त्री-पुरुष का एक साथ काम करना उन्हें जीवन में और ज्यादा एक-दूसरे के प्रति अनुकूल और सहयोगी बनाता है. इस लिहाज से सैनिक स्कूल में पहली बार लड़कियों का दाखिला सिर्फ बराबरी का मामला नहीं है.

लखनऊ के सैनिक स्कूल ने सेना में प्रवेश की इच्छा रखने वाली लड़कियों को लड़कों के बराबर मौका देकर एक सराहनीय प्रयास किया है. उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में बाकी के 30 सैनिक और मिलिट्री स्कूल भी इस लीक पर चलेंगे. सैनिक स्कूलों में लड़कियों का प्रवेश शिक्षा संस्थाओं में लैंगिक भेदभाव को दूर करने की तरफ एक ठोस कदम भी है.