निर्देशक : उमेश शुक्ला

लेखक : सौम्य जोशी

कलाकार : अमिताभ बच्चन, ऋषि कपूर, जिमित त्रिवेदी

रेटिंग : 3/5

आप जीना कब शुरू करते हैं? अगर आपका जवाब है कि पैदा होने के बाद से मरने के पहले तक? तो चलिए बताइए कि इस पूरे वक्त में आप कितनी बार दूसरों के हिसाब से चलते हैं, कितने मौकों पर अपनी खुशियों के लिए किसी और का सहारा खोजते हैं या कब-कब अपने आलस या डर के चलते किसी बदलाव को न बोल देते हैं? ये सवाल पूछने की वजह आपको यह बताने का इरादा है कि जब-जब कोई ऐसा करता है, वह थोड़ा सा मरता है या कहें कम जीता है. यहां पर आप कह सकते हैं कि ऐसा कहने वाले हम कौन होते हैं... तो भइया, हम कोई नहीं हैं. यह तो ‘102 नॉट आउट’ है जो कुछ इस तरह की बातें और सवाल कर आपको क्लीन बोल्ड कर सकती है.

जिंदगी जीने की जिस सीख को तमाम फिल्में अपने नए-पुराने तरीकों से दोहराती रहीं है, ‘102 नॉट आउट’ इसे जरा विचित्र तरीके से कहती है. 102 साल के पिता और 75 साल के बेटे की कहानी दिखाते हुए यह फिल्म कहीं पर भी अपना बचपना, अपनी ताजगी नहीं खोती और आपको एकदम नव-युवा सिनेमा देखने को मिलता है. यह देखना बेहद दिलचस्प है कि सौ पार का एक किरदार अपने बेटे को वृद्धाश्रम सिर्फ इसलिए भेजना चाहता है क्योंकि वह दुनिया में सबसे ज्यादा जीने वाले इंसान का रिकॉर्ड तोड़ना चाहता है. और क्योंकि उसे लगता है कि बुढ़ापे में बूढ़ों की तरह उदासीन-सा व्यवहार करने वाला उसका बेटा माहौल को खुशनुमा नहीं रहने देगा और ऐसा न होने पर वह ज्यादा वक्त तक जी नहीं पाएगा और रिकॉर्ड नहीं तोड़ पाएगा, इसलिए उसे दूर करने का प्लान बनाता है.

दुनिया में पहली बार बेटे को वृद्धाश्रम भेजने के इस लाख टके के आइडिया के आसपास कौड़ी-कौड़ी जिंदगी बुनकर बनाई गई इस कहानी में गुदगुदाने वाले कई मौके आते हैं जो मनोरंजन की दर बढ़ाते जाते हैं. आश्रम जाने से बचने के लिए पिता की शर्तें मानने को मजबूर वृद्ध बेटा उन्हें पूरा करते हुए ऐसी कई कौड़ियां बटोरता-बिखेरता दिखता है. इस दौरान जिंदगी की छोटी-छोटी चीजें घटते हुए बड़ी कीमती और जरूरी लगती हैं चाहे वह पत्नी को लिखे लवलेटर में पिता पर गुस्सा निकालना हो, अपनी फेवरेट चादर काटकर कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने की कवायद हो या बंबई की सड़कों पर घूमते हुए वक्त में पीछे चले जाने का मौका हो. हद दर्जे की मासूमियत समेटे इन सीक्वेंसेज के संवाद हिंदी, अंग्रेजी और जरा-सी गुजराती में लिखे गए हैं. आप चाहें तो इस बात की शिकायत कर सकते हैं कि फिल्म में एक भी मौका ऐसा नहीं आता जब आपको लगे कि फिल्म ने अपनी चतुरई से आपको चौंका दिया है, लेकिन वो ऐसा इरादतन करती है.

वैसे, बेटे की उमर कितनी भी हो बाप, बाप होता है. यह बात अमिताभ बच्चन बड़े आराम से जीकर दिखाते हैं. इस फिल्म में उनके काम की खासियत यह नहीं है कि वे 76 साल के होते हुए 102 साल के बूढ़े का किरदार निभाते दिखे हैं, बल्कि खासियत यह है कि सौ पार के इस किरदार में जो छब्बीस साला एनर्जी है, वह उनमें कूट-कूटकर भरी नजर आती है.

दूसरी तरफ फिल्म का शीर्षक भले ही पिता को समर्पित हो, लेकिन असल में यह कहानी बेटे की है और इसे दिखाते हुए कैमरे का फोकस ज्यादातर वक्त ऋषि कपूर पर रहता है. 65 साल के ट्विटर-सैवी कपूर इतनी तरह के नए एक्सप्रेशन्स दिखाते हैं जो किसी उम्रदराज व्यक्ति के चेहरे पर शायद ही कभी आपको देखने को मिलें.

अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर करीब तीन दशक के बाद एक साथ किसी फिल्म में आए हैं. उस दौर की फिल्मों में भले ही अमिताभ तब के इस चॉकलेटी हीरो पर भारी पड़े हों, लेकिन ‘102 नॉट आउट’ में कई लोगों को ऋषि कपूर बिग बी से ज्यादा प्रभावी लग सकते हैं. इस फिल्म में बच्चन से पंगों के अलावा जिमित त्रिवेदी के साथ उनका लव-हेट रिलेशनशिप भी आपको मजा देता है. अपनी भूमिका में त्रिवेदी भी अच्छा अभिनय करते हैं और सिनेमा के दो दिग्गजों की मौजूदगी में भी अपनी उपस्थिति बनाए रखते हैं.

सीमित किरदारों वाली इस फिल्म में एक किरदार मुंबई शहर भी है. यहां के बीचेस, हैप्पी स्ट्रीट्स, सिटी बेकरी, मरीन ड्राइव और यहां तक कि बीएमसी की बसें भी फिल्म में किरदारों-सी आती-जाती लगती हैं. बेहद खूबसूरत फिल्मांकन, बहने वाला संगीत और बीच-बीच में नजर आने वाले खूबसूरत इलस्ट्रेशन फिल्म की खासियत हैं. इनके अलावा निर्देशक उमेश शुक्ला की यह फिल्म सबसे ज्यादा अपनी सरलता से आपको मोह लेती है. मूल रूप से सौम्य जोशी के लिखे इस गुजराती नाटक में ड्रामा, इमोशन और इसके साथ कुछ बेहद कमाल के संवाद हैं. अगर कमी बताना जरूरी हो तो कहा जा सकता है कि फिल्म में अमिताभ बच्चन के किरदार की बैकस्टोरी आपको पता नहीं चलती. लेकिन इस पता नहीं चलने से कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. और, इस तरह ‘102 नॉट आउट’ गर्मी की छुट्टियों में परिवार के साथ बैठकर जरूर देखी जाने वाली फिल्म बन जाती है.