कार्ल मार्क्स अपने जन्मस्थान जर्मनी के ट्रीयर शहर में वापस आ गये हैं. 17 वर्ष की उम्र में ठीक 183 वर्ष पूर्व जब उन्होंने ट्रीयर छोड़ा था, तब वे जर्मनी के बॉन विश्वविद्यालय में क़ानून की पढ़ाई करने गये थे. वापस लौटे हैं चीन में बनी 4.40 मीटर ऊंची और 2.3 टन भारी भूरे रंग की एक कांस्य-प्रतिमा के रूप में. यह विशालकाय प्रतिमा उनके जन्म की दो- सौवीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में चीन के उन कम्युनिस्ट नेताओं ने ट्रीयर को भेंट की है जो अब चीन में पूंजीवाद का पोषण कर रहे हैं.

चीन की इस भेंट ने एक लाख की जनसंख्या वाले ट्रीयर की नगरपालिका को ‘मान न मान, मैं तेरा मेहमान’ वाले धर्मसंकट में डाल दिया. मार्क्सवाद के नाम पर पिछले सौ वर्षों में दुनिया भर में जो दमन और अत्याचार हुए हैं, ख़ून और आंसू बहे हैं, उनके कारण ट्रीयर के निवासियों को ही नहीं, जर्मनों के एक बहुत बड़े बहुमत को भी इस बात पर गर्व की जगह शर्म महसूस होती है कि कार्ल मार्क्स जन्म से एक जर्मन थे.

चीन से मिली भेंट का कद छोटा किया

चीन द्वारा भेंट की गयी मार्क्स की प्रतिमा को ठुकरा देना क्योंकि एक महाशक्ति बन गये चीन को नीचा दिखाने जैसा होता, इसलिए ट्रीयर शहर ने इस शर्त पर प्रतिमा को स्वीकार कर लिया कि वह 6.30 मीटर के बदले चार मीटर 40 सेंटीमीटर ही ऊंची होगी. आज ‘पोर्टा निग्रा’ कहलाने वाले ट्रीयर शहर के लगभग 1800 वर्ष पुराने और 29 मीटर ऊंचे नगर-द्वार के पास, इस प्रतिमा का विधिवत अनावरण होगा.

अनावरण के समय इस प्रतिमा को बनाने वाले चीनी राष्ट्रीय संग्रहालय के निदेशक वेइशान वू भी उपस्थित रहेंगे. इस डर से कि मार्क्स या मार्क्सवाद के विरोधी इस प्रतिमा को उसके अनावरण से कहीं पहले ही क्षत-विक्षत या विकृत नहीं कर दें, उसे पांच मई से पहले स्थापित नहीं किया गया. मार्क्स का जन्मस्थान होने के कारण हर साल क़रीब डेढ़ लाख चीनी ट्रीयर शहर देखने आते हैं. भविष्य में भी वही मार्क्स की चीनी प्रतिमा को सबसे अधिक निहारेंगे, न कि जर्मन लोग.

मार्क्स दुनिया को बदलना चाहते थे

इसमें कोई संदेह नहीं कि 1867 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘दास कपिटाल’ (द कैपिटल) लिख कर दुनिया भर में जितनी उथल-पुथल कार्ल मार्क्स ने पैदा की, उतनी उनसे पहले या बाद में कोई चिंतक, विचारक या अर्थशास्त्री नहीं कर सका. मार्क्स का कहना था, ‘दार्शनिकों ने दुनिया की केवल अलग-अलग व्याख्या की है, ज़रूरत है दुनिया को बदलने की.’ मार्क्स दुनिया को बदलना चाहते थे. वास्तव में अधिकतर वही लोग दुनिया को बदलना चाहते हैं, जो खुद को या तो परिपूर्ण समझते हैं, बदल नहीं पाते या बदलना नहीं चाहते. उनके सारे उपदेश केवल दूसरों के लिए होते हैं, अपने लिए नहीं. मार्क्स भी इस नियम का अपवाद नहीं थे.

‘दास कपिटाल’ में कार्ल मार्क्स ने सिद्ध करने का प्रयास किया है कि पूंजीवाद - यानी वह अर्थव्यवस्था, जो निजी स्वामित्व, लाभ कमाने की लालसा और उद्योगपति द्वारा निर्णय लेने की निजी स्वतंत्रता पर आधारित होती है - अपनी क़ब्र खुद ही खोदती है. उनका कहना था कि वह पूंजी, जो किसी खून चूसने वाले जीव की तरह श्रम के शोषण से फलती-फूलती है अंततः आत्मघाती सिद्ध होती है. मार्क्स मानते थे कि पूंजीवाद निरंतर बढ़ते हुए संकटों के भंवर में फंस कर चरमराता हुआ एक न एक दिन खुद ही ढह जायेगा. दूसरी ओर, श्रमिक वर्ग अधिकाधिक संगठित हो कर क्रांति करते हुए एक दिन पूंजीवादी जर्जर राज्यसत्ता को भी धूल चटा देगा.

रूसी समाजवादी क्रांति

कार्ल मार्क्स के लाख चाहते हुए भी उनके जीते-जी तो ऐसी कोई क्रांति नहीं हो पायी. हां, 14 मार्च 1883 को लंदन में उनकी मृत्यु के 34 साल बाद रूस में एक ऐसी क्रांति ज़रूर हुई. उस समय ज़ार (सम्राट) कालीन रूसी राजशाही, 1914 से चल रहे प्रथम विश्वयुद्ध के कारण, इतनी जर्जर हो चली थी कि ‘रूसी सोशल डेमोक्रैटिक श्रमिक पार्टी’ (एसडीएपीआर) के भीतर लेनिन के नेतृत्व वाले ‘बोल्शेविक’ गुट को 1917 में लगा कि अब सत्ता हथियाने का समय आ गया है. तथाकथित ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ के द्वारा लेनिन के बोल्शेविकों ने, अक्टूबर 1917 में, रूस की सत्ता हथिया ली और वहां मार्क्स के सपनों का साम्यवाद (कम्युनिज़्म) लाने से पहले उनके बताये समाजवाद को समझाना शुरू कर दिया.

रूस में लेनिन की ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ की सफलता के साथ ही दुनिया दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाले राजनैतिक खेमों में बंट गयी – पूंजीवादी और समाजवादी. दोनों खेमे अपनी श्रेष्ठता का सिक्का जमाने के तौर-तरीकों में उचित-अनुचित या मनवीय-अमानवीय का कोई भेद करना भूलने लगे. दुनिया के उन जनगणों को जो, ग़रीब थे या किसी पूंजीवादी देश के उपनिवेश थे, मार्क्सवाद आकर्षित करने लगा. जो देश अमीर या उपनिवेशवादी थे, वे हर क़ीमत पर मार्क्सवाद के प्रचार-प्रसार को रोकने लगे.

नैतिकतापूर्ण राजनीति का अभाव

जहां तक अमीर पूंजीवादी और साम्राज्यवादी देशों का प्रश्न था, उनसे किसी नैतिकतापूर्ण राजनीति की अपेक्षा वैसे भी नहीं की जाती थी. लेकिन रूस जैसे जो देश अपने आप को मज़दूरों-किसानों की, सर्वहारा की सरकार बताते थे, उनसे यह अपेक्षा स्वाभाविक ही थी कि वे मानव गरिमा की रक्षा करेंगे. हिंसा और दमन से परहेज़ करेंगे. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकार बनेंगे.

पर, ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ. अपने आप को मार्क्सवादी या समाजवादी कहने वाली सरकारें हर बात पर ‘’वर्गचेतना’’ का खोखला बहाना बता कर अपनी जनता का किसी पूंजीवादी सत्ता से भी अधिक नृशंसतापूर्वक दमन करने लगीं. उनकी बर्बरता और नीचता का सारा कच्चा चिट्ठा तब सामने आया, जब रूसी नेता मिख़ाइल गोर्बाचोव की वजह से 1990 में समाजवादी पूर्वी जर्मनी और पूंजीवादी पश्चिम जर्मनी का एकीकरण होते ही, सोवियत संघ के विघटन सहित उसकी छत्रछाया वाले पूर्वी यूरोप के सभी समाजवादी देशों की सरकारों का पतन हो गया.

जर्मन मार्क्सवाद को पसंद नहीं करते

जर्मन केवल इसीलिए मार्क्स और उनके मार्क्सवाद को पसंद नहीं करते कि 1990 में जर्मनी के एकीकरण से पहले, 40 वर्षों तक पूर्वी जर्मनी की एक करोड़ 80 लाख जनता, रूसी मार्क्सवादियों द्वारा थोपी गयी कम्युनिस्ट सरकार की बंधक थी. वे इसलिए भी मार्क्स से छिटकते हैं कि उनकी विचारधारा से प्रेरित दुनिया के विभिन्न देशों की सरकारें 20वीं सदी के दौरान जितने लोगों की मौत के लिए ज़िम्मेदार हैं, उनकी कुल संख्या, दोनों विश्वयुद्धों में मारे गये लोगों की कुल संख्या से यदि अधिक नहीं, तो उससे कम भी नहीं है. हर देश के बारे में अचूक या आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, पर पिछले कुछ दशकों में प्रकाशित आंकड़ों ओर शोधकार्यों के अाधार पर विशेषज्ञों ने जो अनुमान लगाये गये हैं, वे इस प्रकार हैंः

प्रथम विश्वयुद्ध में तीन करोड़ 70 लाख और द्वितीय विश्वयुद्ध में छह करोड़ 60 लाख लोग मारे गये थे. विभिन्न मार्क्सवादी देशों में विचारधारात्मक कारणों, राजनैतिक अभियानों या ऊलजलूल निर्णयों के कारण मारे गये लोगों का विवरण इस तरह है

  •   चीन में 1949 से 1987 के बीच के माओ-काल में 3,52,36,000      
  •   सोवियत संघ (रूस) में 1918 से 1922 तक चले गृहयुद्ध में 62,10,000  और 1922 से 1991 के बीच 5,86,27,000  
  •   उत्तर कोरिया में 31,63,000 + 1995 से 1998 के बीच भूख से मरे 25,00,000  
  •   कंबोडिया में 1975 से 1987 तक चले पोल पोट शासन के दौरान 26,27,000  
  •   अफ़ग़ानिस्तान में 1978 से 1992 तक की रूस समर्थक सरकारों के दौरान 17,50,000  
  •   वियतनाम में 1945 से 1987 तक (वियतनाम युद्ध के अलावा) 16,70,000  
  •   इथियोपिया में 1974 से 19191 के बीच 13,43,000  
  •   भूतपूर्व युगोस्लाविया में 1945 से 1992 के बीच 10,72,000  
  •   मोज़ाम्बीक में 1975 से 1990 के बीच 7,00,000  
  •   रोमानिया में 1947 से 1989 के बीच 4,35,000  
  •   बुल्गारिया में 1946 से 1990 के बीच 2,22,000  
  •    अंगोला में 1975 से 1992 के बीच 1,25,000  
  •   मंगोलिया में 1924 से 1992 के बीच 1,00,000  
  •   अल्बानिया में 1946 से 1991 के बीच 1,00,000  
  •   क्यूबा में 1961 से अब तक 73,000  
  •   भूतपूर्व पूर्वी जर्मनी में 1949 से 1990 के बीच 70,000  
  •   भूतपूर्व चेकोस्लोवाकिया में 1948 से 1990 के बीच 65,000  
  •   लाओस में 1975 से अब तक 56,000  
  •    हंगरी में 1949 से 1989 के बीच 27,000  
  •   पोलैंड में 1948 से 1989 के बीच 22,000  

स्टालिन के शासनकाल में दो करोड़ मौतें

रूसी इतिहासकार रॉय मेद्वेदेव ने रूसी पत्रिका ‘आर्गुमेन्ती इ फ़ाक्ती’ में 1989 में प्रकाशित अपने एक लेख में लिखा था कि स्टालिन वाले शासनकाल के सोवियत संघ में लोगों को सजा देने के लिए उन्हें श्रम शिविरों में भेजने, किसानों को सामूहिक खेती के लिए मजबूर करने, अकाल पड़ने और गोली से उड़ा देने के मनमाने अभियानों से कुल दो करोड़ लोगों को मरना पड़ा. लगभग इतने ही सोवियत नागरिक द्वितीय विश्व युद्ध में हिटलर के सैनिकों के हाथों मारे गये थे.

रॉय मेद्वेदेव ने हिसाब लगाया कि स्टालिन के दमननकारी अत्याचारों से क़रीब चार करोड़ लोगों को भयंकर कष्ट झेलने पड़े. अपने लेख में उन्होंने विभिन्न प्रकार के अत्याचारों के नामों और पीड़ितों की संख्या की एक लंबी सूची दी थी. स्पष्ट है कि इस सब के लिए कार्ल मार्क्स को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. पर यह तो मानना ही पड़ेगा ये सारे अत्याचार हिंसावादी क्रांति की मार्क्स की विचारधारा से ही प्रेरित थे. कुछ इतिहासकारों का तो यहां तक कहना है कि चीन में माओ त्सेदोंग के सनकी आदेशों पर हुए संघर्षों के अलावा उनकी ‘लंबी छलांग’ और ‘सांस्कृतिक क्रांति’ जैसे अभियानों में पिस कर मरने वालों की संख्या हिटलर के यहूदी जातिसंहार और द्वितीय विश्वयुद्ध में मारे गए लोगों से भी ज्यादा है.

मार्क्स की भविष्यवाणी

मार्क्स की भविष्यवाणी थी कि पूंजीवाद अपने ही अंतर्निहित विरोधाभासों के बोझ से चरमरा कर ढह जायेगा. जर्मनी के अधिकांश विद्वानों का कहना है कि पूंजीवाद तो अब भी सरपट दौड़ रहा है, जबकि मार्क्सवादी समाजवाद ही अपने अंतर्निहित विरोधाभासों के बोझ से चरमरा कर ढह गया. इस समय चीन, वियतनाम या क्यूबा जैसे जो दो-चार देश अब भी अपने आप को मार्क्सवादी कहते हैं, उनकी अर्थव्यवस्था भी पूंजीवाद के ढर्रे पर या तो बाज़ारवादी हो गयी है या उसी रास्ते पर है. केवल सत्ता पर उनकी कम्युनिस्ट पार्टियों का बलात एकाधिकार अब भी बना हुआ है, बस.

उलरीके हेरमन बर्लिन से प्रकाशित होने वाले प्रसिद्ध दैनिक ‘दी टागेसत्साइटुंग’ की आर्थिक विशेषज्ञ हैं. उनका कहना है, ‘मार्क्स की यह आशा एक भूल थी कि पूंजीवाद एक दिन दम तोड़ बैठेगा. लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिये कि उनकी पुस्तक ‘दास कपिटाल’ 1867 की है और वे स्वयं 1883 में इस दुनिया से चल बसे थे. उस समय के श्रमिक ग़रीबी-रेखा के नीचे रह कर जीते थे. यदि वह स्थिति बनी रहती, तो पूंजीवाद 19वीं सदी में ही चरमरा गया होता. हम रेलवे से ज़्यादा और कुछ नहीं देख पाये होते. आज कार, विमान, रेडियो, टेलीविज़न या स्मार्ट फ़ोन का आविष्कार ही नहीं हो पाया होता. यह सब इसलिए हो पाया, क्योंकि मार्क्स के बाद के श्रमिक संगठन (ट्रेड यूनियन) आन्दोलन ने पूंजीवाद का उद्धार कर दिया.’

श्रमिक संगठनों ने पूंजीवाद का उद्धार किया

श्रमिक संगठनों द्वारा पूंजीवाद से लड़ने के बदले उसके उद्धार के विरोधाभास को समझाते हुए उलरीके हेरमन कहती हैं कि मार्क्स ने जिस बात की कल्पना नहीं की थी और जो उनके अवसान के बाद होने लगी थी, वह यह थी कि श्रमिक संगठनों के दबाव के कारण श्रमिकों की ज़ेब में पहुंचने वाला शुद्ध वेतन बढ़ने लगा. उन्हें ग़रीबी की रेखा के नीचे रह कर जीने से मुक्ति मिलने लगी.

ट्रेड यूनियन आंदोलन के प्रभाव से एक ऐसी सर्वथा नयी प्रवृत्ति उभरने लगी, जिसे आज हम उपभोक्तामुखी पूंजीवाद (कंज़्यूमर कैपिटलिज़्म) कहते हैं. आय बढ़ने से श्रमिक भी उपभोक्ता बनते गये. एक व्यापाक आयाम धारण कर चुका यही उपभोक्तावाद आज वैश्विक (ग्लोबल) पूंजीवाद को पोषित कर रहा है. ट्रेड यूनियन आन्दोलन का उदय सर्वथा अनपेक्षित था और उतना ही अनपेक्षित था श्रमिकों की आय बढ़ाने की उनकी मांगों के कारण पूंजीवाद का और भी फलना-फूलना.

श्रम की मंहगाई ने संपन्नता बढ़ाई

उलरीके हेरमन का तर्क है कि प्राचीनकालीन रोमन सभ्यता से लेकर 18वीं सदी तक दुनिया में न तो प्रतिव्यक्ति आय कहीं बढ़ रही थी और न ही लोगों का औसत जीवनकाल 30 वर्ष से ऊपर जा रहा था. श्रम की मंहगाई ने ही 19वीं सदी में एक तरफ़ मशीनों के आविष्कार को प्रोत्साहित किया, तो दूसरी तरफ श्रमिकों की क्रयशक्ति बढ़ाकर पूंजीवाद को और पुष्ट भी किया. उलरीके हेरमन कहती हैं, ‘पूंजीवाद एक ऐसी चमत्कारिक व्यवस्था है, जिसने एक ऐसे तरीके से खुशहाली और तकनीकी प्रगति पैदा की, जिसे मानव समाज पहले कभी नहीं जानता था. लेकिन यह भी सच है कि पूंजीवाद को निरंतर आर्थिक वृद्धि चाहिये, जबकि इस सीमित पृथ्वी पर हम प्राकृतिक संसाधनों का असीमित दोहन नहीं कर सकते. इसीलिए प्राकृतिक संसाधन और पर्यावरण एक न एक दिन पूंजीवीद के अंत का कारण अवश्य बनेंगे.’

सच यह भी है कि प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण की सीमाओं के बारे में कार्ल मर्क्स या लेनिन-माओ जैसे उनके अनुयायियों ने भी कभी नहीं सोचा था. पूर्वी बर्लिन में कम्युनिस्ट अत्याचार-पीड़ितों के एक संग्रहालय के प्रमुख हुबेर्टुस क्नाबे तो इस बात को भी एक शर्मनाक कांड मानते हैं कि ट्रीयर जैसे ‘एक पश्चिमी जर्मन शहर में (कार्ल मार्क्स की मूर्ति के रूप में) एक ऐसा स्मारक बन रहा है, जो कम्युनिस्ट अत्याचार-पीड़ितों के लिए असहनीय है.’ अंतरराष्ट्रीय मनवाधिकार नाम की एक संस्था ने भी ट्रीयर में ‘मार्क्स की देवमूर्ति’ स्थापित करने की निंदा की है. जबकि भूतपूर्व पूर्वी जर्मनी के समय के अब भी प्रकाशित हो रहे दैनिक ‘नोए डोएचलांड’ ने ‘धन्यवाद चीन’ शीर्षक वाला एक अग्रलेख प्रकाशित किया है.

बौद्धिक प्रतिभा पर मुग्ध, चरित्र पर क्षुब्ध

जर्मनी के वामपंथी मार्क्स के गुणगान कर रहे हैं, तो दक्षिणपंथी उनकी अनुयायी रही विश्व की कम्युनिस्ट सरकारों द्वारा मार डाले गये करोड़ों शहीदों और अत्याचार-पीड़ितों को श्रद्धांजलि दे रहे हैं. कुछ लोग मार्क्स की बौद्धिक प्रतिभा पर मुग्ध हैं, तो कुछ दूसरे उनके चरित्र पर क्षुब्ध हैं. उनके चरित्र को कोसने वाले कह रहे हैं कि वे तो अपने मित्रों और परिजनों के पैसों पर जीने वाले परजीवी थे. यहां तक कि अपनी विधवा मां के बचे-खुचे पैसे पर हाथ साफ़ करते समय भी उन्हें कोई शर्म नहीं आयी. जल्द ही मर नहीं रहे अपने वयोवृद्ध रिश्तेदारों को वे ‘वसीयत के अड़ंगेबाज़’ कहा करते थे.

नयी जानकारियों के अनुसार, अपनी पत्नी और बच्चों के प्रति मार्क्स का व्यवहार प्रायः बहुत चिड़चिड़ा होता था. उनके घर में अक्सर कुहराम मचा रहता था. इसका एक प्रमुख कारण संभवतः यह था कि मार्क्स का अपने बच्चों की दायी हेलेना देमुट के साथ अवैध संबंध था. दोनों के बीच अवैध संबंध से 1851 में हेनरी फ्रेडरिक नाम का एक बच्चा भी पैदा हुआ था.

अवैध संतान के साथ घटिया व्यवहार

मार्क्स ने हेलेना देमुट को मजबूर कर दिया कि वे हेनरी फ्रेडरिक को पालन-पोषण के लिए एक दूसरे परिवार को दे दें. हेनरी को जब भी अपनी मां से मिलना होता था, तो वह ‘किसी कुत्ते की तरह’ घर के पिछवाड़े वाले दरवाज़े से आकर रसोई वाले कमरे में अपनी मां से मिला करता था. जो व्यक्ति अपने आप को दार्शनिक समझता था, पर अपने घर-परिवार का भला नहीं सोच पा रहा था, वह दुनिया भर के सर्वहारा का भला कितना भला कर पाता!

कार्ल मार्क्स के माता-पिता ईसाई बनने से पहले यहूदी थे. लेकिन, अपने परम मित्र फ्रीड्रिश एंगेल्स को लिखे कई पत्रों के अनुसार मार्क्स यहूदियों से उसी तरह की नस्लवादी घृणा करते थे जिस तरह उनके समय के सामान्य जर्मन किया करते थे. फेर्डिनांड लसाल उनके समय के एक ऐसे यहूदी थे, जिसने जर्मन श्रमिकों को एकजुट करने की एक संस्था बना रखी थी. वे 1862 में मार्क्स से लंदन में मिले थे. क्योंकि मार्क्स भी अपने आप को जर्मन मज़दूर वर्ग का एक नेता मानते थे, इसलिए वे लसाल से जलते थे. एंगेल्स के नाम अपने पत्रों में वे लसाल के लिए ‘यहूदी नीग्रो’ (हब्शी) जैसे घटिया शब्दों का प्रयोग करते थे.

यहूदी को हब्शी कहा

मार्क्स ने ऐसे ही एक पत्र में लसाल के बारे में लिखा, ‘मेरे लिए तो बिल्कुल साफ़ है कि उसके सिर की जिस तरह की बनावट है और जैसे उसके बाल हैं, वह भी ऐसे ही किसी नीग्रो की संतान है, जो मिस्र से चले मूसा (मोज़ेस) वाले झुंड के साथ हो लिया था.... उसकी ढिठाई भी ठेठ हब्शियों जैसी ही है.’ इसी तरह अपनी बेटी जेनी के नाम एक पत्र में मार्क्स ने क्यूबा की एक क्रिओल मां की संतान अपने दामाद पॉल लफ़ार्ज को ‘निग्रेलो’ और ‘किसी गोरिल्ला की संतान’ बताया.

मार्क्स को जानने वाले यही पूछते हैं कि जो व्यक्ति अपने निजी जीवन में इतने तुच्छ विचारों का कायल रहा हो, क्या वह सार्वजनिक जीवन में अपेक्षित उच्च आदर्शों के साथ न्याय कर पाता. इसीलिए उनके एक सुपरिचित ने भांप लिया था कि मार्क्स अपने जीते-जी यदि कभी स्वयं बहुत प्रभावशाली बन गये होते, तो बहुत संभव था कि वे भी एक तानाशाह ही बन जाते. मार्क्स स्वयं तो अपने घर से बाहर तानाशाह नहीं बन पाये, पर उनके मार्क्सवाद को अपनाने वालों की तानाशाही ने विचारधारा के नाम पर मानवजाति के इतिहास में प्राणों की जो अपूर्व बलि ली है, वह भी दुनिया की आंखें खोलने के लिए कतई कम नहीं है.