बीते हफ्ते केंद्र सरकार ने देश के सभी गांवों तक बिजली पहुंचा देने का दावा किया है. हालांकि उसके इस दावे के बाद सोशल मीडिया में एक जंग सी छिड़ गई है. एक ओर विपक्ष है जो केंद्र के इस दावे पर कई तरह से संदेह जता रहा है, वहीं सरकार समर्थक लोग इसे अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रहा है. वैसे इस घमासान में एक तथ्य साफ हुआ है कि बिजली पहुंचाने का यह दावा केवल ‘सेंसस (जनगणना)‘ गांवों के बारे में ही है.

यह देखकर कइयों के मन में एक सवाल उभर रहा है कि क्या सरकारी रिकॉर्ड में गांव भी अलग-अलग तरह के होते हैं. यदि हां तो ये वर्गीकरण क्या हैं और इनके आधार क्या होते हैं? इसके अलावा एक सवाल और उभरता है कि क्या सरकारी रिकॉर्ड में शहर भी अलग-अलग तरह के होते हैं?

सेंसस गांव बनाम राजस्व गांव

सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि सरकार की नजर में गांव क्या होता है. हर 10 साल पर देश की जनगणना करने वाला संस्थान ‘भारत के महापंजीयक और जनगणना आयुक्त का कार्यालय’ लोगों के साथ-साथ घरों, गांवों और शहरों की संख्या की भी गिनती करता है. केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाली इस संस्था को संक्षिप्त में ‘जनगणना आयुक्त का कार्यालय’ भी कहते हैं.

जनगणना आयुक्त के कार्यालय के अनुसार कोई गांव वैधानिक रूप से चिह्नित वह इकाई होता है जिसकी एक निश्चित सीमा और अलग भू-रिकॉर्ड हो. इसलिए सरकार देश के सभी गांवों को ‘राजस्व गांव’ के नाम से भी बुलाती है. हालांकि गांव की इस परिभाषा में कहीं भी रहवासी (या उनके घरों) की अनिवार्यता का कोई जिक्र नहीं है. इसका यह मतलब हुआ कि किसी इलाके के ‘गांव’ कहलाने के लिए यह कतई जरूरी नहीं है कि वहां लोग भी रहते हों. वैसे जिस गांव में लोग भी रहते हों उसे रिकॉर्ड में ‘सेंसस गांव’ के रूप में एक अलग दर्जा दिया गया है. इसका मतलब यह हुआ कि सेंसेस गांव का अर्थ हम सबके अनुभव में आने वाले सामान्य गांव से है.

देश की जनगणना केवल इन्हीं गांवों में होती है. बिजली, पानी, शौचालय, स्कूल जैसी बुनियादी जनसुविधाओं के लिए भी केवल ऐसे ही गांवों का महत्व होता है. इसलिए जनगणना रिकॉर्ड में यहां की जनसुविधाओं का पूरे विस्तार से जिक्र होता है. दूसरी ओर जिन गांवों में लोग नहीं रहते जनगणना वाले रिकॉर्ड में केवल इनके नाम, एरिया कोड, क्षेत्रफल (हेक्टेयर में) और भू-उपयोग आंकड़े लिखे जाते हैं. इसके अलावा रिकॉर्ड में यहां की जनसुविधाओं के लिए ‘शून्य’ लिख दिया जाता है.

शहरों के भी कई प्रकार होते हैं

जनगणना आयुक्त का कार्यालय के अनुसार देश में दो तरह के शहर हैं. पहली तरह के शहरों को वह ‘वैधानिक’ शहर कहता है. इनमें नगर निगम, नगर पालिका, कैंटोनमेंट बोर्ड और अधिसूचित शहरी क्षेत्र आते हैं. वहीं दूसरी तरह के शहर को वह ‘सेंसस’ शहर कहता है. इसमें पहले वर्ग से बचे वैसे शहर आते हैं जहां की आबादी न्यूनतम 5,000 और जनघनत्व 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से ज्यादा का हो. इसके साथ ऐसे शहरों में से 75 फीसदी आबादी का खेती से इतर कामों में लगा होना जरूरी होता है. हालांकि जनगणना आयुक्त का कार्यालय जनसंख्या के लिहाज से देश के सभी शहरों को छह भागों में बांटता है. यह एक अलग तरह का वर्गीकरण है.

देश में अभी कितने गांव और शहर हैं?

जनगणना आयुक्त के कार्यालय द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं कि 2011 की जनगणना के अनुसार 31 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले इलाके में गांवों की कुल संख्या 6,40,932 है. हालांकि इनमें से केवल 5,97,608 गांव ही बसे हुए यानी सेंसस गांव हैं. उधर बाकी के 43,324 गांवों में 2011 में कोई भी इंसान रहता हुआ नहीं पाया गया. इसका मतलब यह हुआ कि देश के कुल राजस्व गांवों में से छह फीसदी से ज्यादा जनशून्य हैं. इस जनगणना के मुताबिक सारे गांवों में करीब 16.86 करोड़ परिवार हैं जिनमें करीब 83.4 करोड़ लोग रहते हैं. इनमें पुरुषों की संख्या करीब 42.8 करोड़ और महिलाओं की 40.6 करोड़ है.

दूसरी ओर, इस जनगणना के अनुसार देश के 1.02 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले सभी तरह के शहरों की कुल संख्या 7,933 है. इनमें आधे से थोड़े कम यानी 3,894 सेंसस शहर के रूप में दर्ज किए गए हैं. जहां तक शहरों में रहने वाले कुल परिवारों की बात है तो 2011 में यहां आठ करोड़ से ज्यादा परिवार रहते हुए पाए गए. वहीं शहरों की कुल आबादी 37.71 करोड़ से ज्यादा पाई गई है.

सरकारी ऐलान में आखिर 144 गांव कम क्यों?

दिलचस्प बात यह है कि इस हफ्ते देश के सभी गांवों में बिजली पहुंचाने का दावा करते वक्त केंद्र ने गांवों का जो आंकड़ा पेश किया है वह 2011 की जनगणना से मेल नहीं खा रहा है. सरकार की इस घोषणा में कहा गया है कि 5,97,464 सेंसस गांवों में बिजली पहुंचा दी गई है और इस तरह देश के सभी गांवों तक बिजली का संपर्क हो गया है. हालांकि यह आंकड़ा 2011 की जनगणना से 144 कम है.

इस तरह केंद्र सरकार के इस ऐलान में 144 गांवों के छूट जाने की गुत्थी अभी तक जानकारों के लिए ‘रहस्य’ बनी हुई है. जानकारों का सीधा सवाल है कि जब मौजूदा जनगणना के अनुसार देश के 5,97,608 गांवों में लोगों का वास है तो सरकार ने केवल 5,97,464 गांवों तक बिजली पहुंचा कर कैसे दावा कर दिया कि हर गांव तक यह सुविधा पहुंच गई है. मजे की बात है कि सरकार की हर घोषणा पर बारीक निगाह रखने वाले विपक्ष की भी आंकड़ों के इस ‘मिसमैच’ पर अब तक नजर नहीं पड़ी है.