उत्तर प्रदेश में एक के बाद एक उपचुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन से मात खा चुकी भारतीय जनता पार्टी कई रणनीतियों पर काम कर रही है. इनमें से एक है दूसरे दलों के प्रमुख और प्रभावशाली नेताओं को भाजपा में शामिल कराना. भाजपा नेताओं के मुताबिक यह रणनीति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की है. लेकिन जानकारों के मुताबिक अमित शाह को मालूम है कि सिर्फ इससे बात नहीं बनने वाली इसलिए वे वर्षों पहले भाजपा के उस समय के संगठन महामंत्री गोविंदाचार्य और मौजूदा गृह मंत्री राजनाथ सिंह के फाॅर्मूले की ओर लौटते दिख रहे हैं.

दरअसल, 1980 के दशक में जब भाजपा दो सांसदों वाली पार्टी थी तो संगठन को विस्तार देने के मकसद से गोविंदाचार्य ने सोशल इंजीनियरिंग का एक फाॅर्मूला निकाला था. उनका मानना था कि भाजपा को अपनी उस पारंपरिक पहचान को बदलना होगा जिसके तहत उसे ब्राह्मणों और बनियों की पार्टी माना जाता है. उन्होंने उस दौर में संगठन के स्तर पर यह कोशिश की कि पिछड़े और दलित वर्ग में जिन जातियों का उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं है, उन्हें भाजपा अपने साथ जोड़ने की कोशिश करे.

उत्तर प्रदेश के लिए गोविंदाचार्य की सोशल इंजीनियरिंग यह थी कि गैर यादव पिछड़ों और गैर जाटव दलितों को भाजपा के साथ जोड़ा जाए. पार्टी के अंदर और बाहर के लोग भी यह मानते हैं कि गोविंदाचार्य के इस फाॅर्मूले से भाजपा को एक राष्ट्रीय पार्टी बनने की प्रक्रिया में काफी लाभ मिला. लेकिन जब 2000 में गोविंदाचार्य भाजपा से बाहर हुए तो भाजपा उनके फाॅर्मूले पर उतने योजनाबद्ध तरीके से आगे नहीं बढ़ पाई जितने योजनाबद्ध तरीके से वे पार्टी को इस रास्ते पर आगे ले जा रहे थे.

इस बीच जब उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री की कुर्सी कल्याण सिंह और रामप्रकाश गुप्त से होते हुए राजनाथ सिंह के पास पहुंची तो उन्होंने गोविंदाचार्य के फाॅर्मूले में एक नया आयाम जोड़ा. राजनाथ सिंह ने यह फाॅर्मूला दिया था कि ओबीसी कोटे के अंदर तीन श्रेणियां बनाकर आरक्षण के लाभ को तीन हिस्सों में बांट दिया जाए. ताकि आरक्षण का लाभ अन्य पिछड़ा वर्ग की हर जरूरतमंद जाति तक पहुंच सके. लेकिन मुख्यमंत्री रहते राजनाथ सिंह भी अपने फाॅर्मूले को लागू नहीं कर पाए.

इसके बाद उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी करने में भाजपा को तकरीबन डेढ़ दशक का वक्त लग गया. सत्ता में वापसी के बावजूद इस फाॅर्मूले की ओर पार्टी का ध्यान नहीं गया था. लेकिन धुर विरोधी रही सपा-बसपा के गठबंधन और इनके साथ कांग्रेस और राष्ट्रीय लोक दल को मिलाकर बनने वाले संभावित महागठबंधन की चुनौती से निपटने के लिए भाजपा अब वहीं से सोशल इंजीनियरिंग को आगे बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है जहां गोविंदाचार्य और राजनाथ सिंह ने इसे छोड़ा था.

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार इस योजना पर काम कर रही है कि पिछड़े वर्ग की 17 जातियों को अनुसूचित जाति की सूची में डाल दिया जाए. सूत्रों के मुताबिक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के निर्देश पर राज्य सरकार ने पिछड़े वर्ग की काफी ज्यादा पिछड़ी 17 जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की योजना पर काम शुरू कर दिया है ताकि उन्हें आरक्षण का लाभ और अन्य सुविधाएं अनुसूचित जाति के कोटे के तहत मिल पाएं. कभी उत्तर प्रदेश में पार्टी का काम देखने वाले भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष की पहल पर उत्तर प्रदेश सरकार यह काम करने जा रही है. इसके लिए जो भी जरूरी प्रक्रिया है, उसे अपनाया जाएगा.’

इससे पार्टी को होने वाले फायदों के बारे में वे कहते हैं, ‘निश्चित तौर पर इसका लाभ हमें मिलेगा. जिन वर्गों में भाजपा के खिलाफ अविश्वास पैदा करने की कोशिश विपक्ष की ओर से हो रही है, उन वर्गों में यह संदेश जाएगा कि भाजपा हर वर्ग को अपने साथ लेकर चलने वाली पार्टी है. उत्तर प्रदेश के पिछड़े वर्ग में गैर यादवों की हालत बुरी है और यही स्थिति गैर जाटव दलितों की है. इन दोनों समाजों से उत्तर प्रदेश के जो दो बड़े नेता निकले उन्होंने सिर्फ अपनी जाति का हित-अहित देखा. दूसरी जातियों की उन्होंने परवाह ही नहीं की.’

यह पूछे जाने पर कि क्या भाजपा यह कदम सपा-बसपा गठबंधन के दबाव में उठा रही है, उत्तर प्रदेश भाजपा के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘यह कहना सही नहीं है कि भाजपा ने दलितों और पिछड़ों को अपने साथ लाने की योजना को छोड़ दिया था. 2014 के लोकसभा चुनावों के टिकटों का बंटवारा हो या फिर 2017 के विधानसभा चुनावों के टिकटों का बंटवारा हो, इन दोनों चुनावों में भाजपा ने सामाजिक समीकरणों का ख्याल रखा था. हां, अब राष्ट्रीय अध्यक्ष की यह रणनीति जरूर है कि भाजपा अपनी कोशिशों को और पक्का करे ताकि विपक्ष भाजपा पर पिछड़ा विरोधी और दलित विरोधी होने का आरोप न लगा सके.’

इसके अलावा उत्तर प्रदेश में भाजपा ने अपने स्तर पर भी जातिगत समीकरणों को उस तरह से साधने की कोशिश की है जिससे उसे चुनावी लाभ मिल सके. पार्टी ने जिन लोगों को उत्तर प्रदेश से पिछले दिनों राज्यसभा सांसद बनाया, उसमें भी जातिगत समीकरणों का ध्यान रखा गया. यही काम एमएलसी के लिए टिकट बांटते वक्त भी भाजपा की ओर से हुआ. लेकिन ये सारी कोशिशें, भाजपा को सपा-बसपा गठबंधन से मुकाबला करने में कितना सक्षम बनाती हैं, यह तो आने वाले चुनावों में ही पता चल पाएगा.