इस स्तंभ के तहत मैंने पिछले दोनों आलेख प्रिवेंटिव हेल्थ चेकअप पर लिखे हैं. इसके बाद मैं इस किस्से को अपनी तरफ से तो खत्म ही मान बैठा था. लेकिन किस्सा अभी खत्म नहीं हुआ था, यह बात मुझे खुद भी बाद में मालूम पड़ी जब कुछ पाठकों ने फोन पर यह पूछा कि आपने किसी भी लेख में उस टेस्टिंग के बारे में तो कुछ बताया ही नहीं जिसे करने के बाद एंजेलिना जोली को पता चल गया था कि उसे आने वाले वर्षों में, जरूर ही जरूर, स्तन कैंसर होगा!

आपने भी मीडिया में इसके बारे में पढ़ा-सुना होगा कि विख्यात हॉलीवुड अभिनेत्री एंजेलिना जोली के परिवार में स्तन कैंसर की बड़ी स्ट्रांग फैमिली हिस्ट्री थी. इसी के चलते उन्होंने अपनी जेनेटिक जांचें कराईं. इसमें उनके शरीर में स्तन कैंसर पैदा करने वाला जीन पॉजिटिव पाया गया. इसका मतलब? मतलब यही कि यह जेनेटिक टेस्ट संकेत दे रहा था कि भविष्य में कभी, एंजेलिना को ब्रेस्ट कैंसर होने के चांस बहुत ज्यादा रहेंगे. फिर डॉक्टरों की सलाह पर एंजेलिना ने अपनी दोनों ब्रेस्ट ही ऑपरेशन करवा के निकलवा दीं. ब्रेस्ट ही नहीं होंगी तो फिर कैंसर कहां होगा!

पिछले दो आलेखों को पढ़ने वाले कई पाठक मुझसे इसी जेनेटिक काउंसिलिंग के बारे में जानना चाहते हैं. मुझे भी लगा कि यदि मैं लगे हाथों जेनेटिक काउंसिलिंग जैसे अपेक्षाकृत नये से विषय पर भी बात कर ही लूं तो प्रिवेंटिव हेल्थ चेकअप का डिस्कशन फिर वास्तव में पूरा हो जायेगा. तो इस बार जेनेटिक काउंसिलिंग के बारे में कुछ निहायत बुनियादी बातें जानने-समझने की कोशिश करते हैं.

जेनेटिंग काउंसिलिंग का आधार क्या है?

यह तो हम जानते ही हैं कि स्त्री के गर्भाशय के भीतर करीब नौ माह की एक नियत प्रक्रिया है जिसमें मनुष्य का शरीर बनता है. यह उस एक कोशिका से बनना शुरू होता है जो गर्भाधान के समय मां के अंडे और पिता के शुक्राणु के मिलन से तैयार होती है. इसी सूक्ष्म से सेल में मां तथा पिता के जींस आ जाते हैं जो आगे पूरे शरीर के विकास को नियंत्रित करते हैं.

इस छोटे से सेल की न्यूक्लियर रचना (केंद्रीय भाग) में क्रोमोजोम्स नामक जेनेटिक संरचनायें होती हैं. इन क्रोमोजोम्स में ही हमारे जीन्स स्थित होते हैं.

अब, जींस यानी क्या? इसे ठीक से समझ लें. आप कंप्यूटर समझते हैं न? उसमें कैसे छोटी-सी चिप में पचासों सूचनाएं, फाइलें, काम और स्ट्रक्चर छुपे रहते हैं! ठीक वैसे ही जीन्स को यूं मानें कि खुदा ने कम्प्यूटर चिप को हजारों गुना छोटा कर दिया. यह चिप है छोटी सी पर काम वही करती है, बल्कि उससे भी बेहतर करती है. इसकी स्टोरेज क्षमता तथा कार्य करने का दायरा भी कई सौ गुना ज्यादा होता है. यही जीन हमारे शरीर नामक जैविक कम्प्यूटर की जैविक चिप हैं. यही जीन हमारे शरीर के विभिन्न कामों के लिये जिम्मेदार हैं. शरीर में दिन-रात चल रहे अलग-अलग लाखों कार्यों के लिये लाखों जीन्स होते हैं.

अब इनमें से यदि कोई जीन डिफेक्टिव हो या खराब हो जाये या फिर ठीक न बना हो या उसका म्यूटेशन हो जाए तो इस खराबी से कई बीमारियां होने का खतरा हो जाता है. हर अलग जीन, अलग म्यूटेशन के द्वारा अलग ही बीमारी की आशंका पैदा करता है.

धीरे-धीरे, जैसे-जैसे मानव जेनेटिक्स में शोध बढ़ा है, मानव क्रोमोजोम्स तथा जीन्स की सूक्ष्म बुनावट को विज्ञान ने और गहराई से समझा है. अब जाकर हमें बहुत-सी पारिवारिक तथा अन्य बीमारियों में जेनेटिक्स की गहन भूमिका और बेहतर ढंग से समझ में आ रही है. हमें अब अंतिम तौर पर पता लग गया है कि बहुत से रोग हमारी जेनेटिक संरचना से ही तय होते हैं. इसका मतलब? इसका मतलब यह हुआ कि यदि मानव शरीर की जेनेटिक संरचना को जानने के सरल और सस्ते टेस्टों की ईजाद हो सके तो लोगों को भविष्य में होने वाली बीमारियों के बारे में वर्षों पूर्व आगाह किया जा सकता है. और यही धारणा प्रिवेंटिव जेनेटिक जांचों और जेनेटिक काउंसिलिंग का आधार है.

इस बात को तनिक और विस्तार में समझें.

आपके शरीर का हर जीन शरीर के किसी न किसी अंग और कार्य की कुंडली जैसा है. हमारे जन्म के समय से ही शरीर में मौजूद ये जीन्स ही हमारे शरीर के रेशे-रेशे की जन्मपत्री जैसे हैं. मानो ये जीन्स ही शरीर के हर अंग के भाग्य को तय करते हैं. (एक नितांत वैज्ञानिक तथ्य को यहां मैंने एक नितांत अवैज्ञानिक उपमा द्वारा समझाया है, यह इसलिए ताकि ज्योतिषियों के रोज के दावों को याद रखते हुये आप मेरी बात को शायद ज्यादा सटीक तौर पर समझ पाएं) ऐसे लगभग बीस हजार जीन्स हमारे शरीर की कोशिकाओं के न्यूक्लियस के क्रोमोजोम्स पर मौजूद होते हैं. ये जीन्स ही हमारे जेनेटिक कम्प्यूटर की हार्ड डिस्क बनाते हैं.

ये जीन्स ही तय करते हैं कि हमें जीवनपर्यंत कौन-सी बीमारियां होने की आशंका रहेगी, हम पर विभिन्न दवाएं और इलाज कारगर होंगे भी कि नहीं? खासतौर पर कई खानदानी बीमारियों में इनकी भूमिका को लेकर आजकल बहुत शोध हो रहा है. नित नया ज्ञान मिल रहा है. निकट भविष्य में अब मेडिकल विज्ञान बड़ी तेजी से न केवल बीमारी का पता करने के लिए जेनेटिक टेस्टों के पैनल लाएगा बल्कि जेनेटिक इंजीनियरिंग के नये कौशल द्वारा जीन्स को रिपेयर करके बहुत सी बीमारियों को होने से ही रोकने की ठान बैठा है. शायद, जेनेटिक चिकित्सा में ही इंसान के अमर हो जाने की कुंजी मिलने की संभावना भी है!

तो क्या ये जेनेटिक जांचें हमें पूरी तरह से बता देंगी कि आगे जाकर हमें यह-वह या कोई और बीमारी पक्के तौर पर होगी ही? भविष्य कितना भी जोरदार हो परंतु आज की जेनेटिक जांचों तथा ज्ञान की फिलहाल तो बहुत सारी सीमायें हैं. इन सीमाओं को जानना भी बहुत जरूरी है.

प्रिवेंटिव जेनेटिक जांचों और जेनेटिक काउंसिलिंग के संदर्भ में कई बातें ध्यान रखने जैसी हैं

  1. अभी कुछ ही बीमारियों के आधे-अधूरे से जेनेटिक टेस्ट उपलब्ध हैं, वे भी मात्र कुछ ही जगहों पर.
  2. अभी ये जांचें बड़ी महंगी हैं. हर एक के बस में नहीं कि इनकी जांच करवाने की सोचे भी. जब तक ये जांचें सहज और सस्ते रूप में उपलब्ध नहीं होंगी, वृहत्तर समाज के लिए बीमारियों को रोकने में फिलहाल इनसे किसी मदद की आशा नहीं की जा सकती.
  3. तीसरी बड़ी बात को और ध्यान से समझने की आवश्यकता है. मान लें कि हमें कुछ बीमारियों की संभावना का पता सालों पूर्व चल भी जाये तो क्या उनको रोकने का कोई इलाज भी मेडिकल साइंस के पास अभी है? ज्यादातर ऐसी बीमारियों की संभावना का पता चलने के बाद हमारे पास उन्हें ठीक करने का कोई सटीक इलाज है नहीं. अभी ऐसी कोई विधि उपलब्ध नहीं जो आगे इनको होने से रोक सके. (ब्रेस्ट कैंसर और एक तरह के थायरॉइड कैंसर के लिए जरूर यह उपाय है कि आपरेशन द्वारा वह अंग ही निकलवा दिया जाये जिसमें आगे जाकर कैंसर की संभावना की चेतावनी जेनेटिक टेस्ट से मिले.)

तो फिर ऐसी जांच का क्या फायदा?

जेनेटिक जांचों के विरूद्ध एक तर्क यह भी है कि ऐसा पता करके हम केवल मनोवैज्ञानिक परेशानियों (तनाव, डिप्रेशन आदि) को आमंत्रण दे रहे हैं. यहां सवाल है कि बीमारी की संभावना का पता चल जाये और उसको रोकने का कोई इलाज नहीं हो तो कहीं ऐसे जेनेटिक टेस्ट से हम परिवार में तनाव और अलगाव ही बढ़ाने का काम तो नहीं कर रहे होंगे? फिर ऐसी जांचों के कारण आम लोगों को हेल्थ इंश्योरेंस और रोजगार मिलने में मेडिकल फिटनेस की तमाम तरह की परेशानियां भी पैदा हो सकती हैं.

एक महत्वपूर्ण बात और है.

ऐसा भी हो सकता है कि बीमारी वाले जीन्स मिलने के बाद भी कभी संबंधित व्यक्ति को वह बीमारी हो ही न, क्योंकि बीमारी पैदा होने और न होने के लिये अन्य कारण भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं. इसीलिये किसी शख्स में बीमारी की आशंका बढ़ाने वाले जीन्स मिलें तो भी यह कैसे मान लिया जाये कि उसे कभी न कभी वह बीमारी पैदा होनी ही है. दरअसल उस बीमारी का पैदा होना आगे बहुत सी अन्य बातों पर भी निर्भर रहेगा. हमारे आसपास की आबोहवा, प्रदूषण, हमारे भोजन की गुणवत्ता, व्यायाम करने की आदत तथा शरीर के अन्य जीन्स के साथ इस बीमारी वाले जीन का इन्टरएक्शन आदि अनेक कारक आखिर में बीमारी पैदा करने का काम करते हैं.

इस बात हम डायबिटीज के उदाहरण से समझ सकते हैं.

आप जानते हैं कि डायबिटीज खानदान में चलने वाली बीमारी है. इसके चार-पांच जीन्स को अब तक पहचान लिया गया है. इन्हीं जीन्स का म्यूटेशन डायबिटीज पैदा करता है. इनका म्यूटेशन इंसुलिन पैदा करने वाली हमारी पेंक्रियाज की कोशिकाओं को खराब करता है जिससे डायबिटीज हो जाती है.

वहीं विभिन्न अध्ययनों और सर्वे द्वारा हमें दशकों से पता है कि यदि खानदान में डायबिटीज की स्ट्रांग हिस्ट्री है तो आगे पैदा हुए बच्चों को भी डायबिटीज होने के चांस रहते हैं. याद रहे कि सब बच्चों में वही जीन्स हैं. वही जींस होते हुये भी, इनमें से कुछ बच्चे बड़े होकर डायबिटिक होते हैं और कुछ डायबिटीज से बच जाते हैं. ऐसा क्यूं होता है? दरअसल डायबिटीज से बचने वाले वे लोग होते हैं जिनके जीन्स बीमारी वाले तो हैं लेकिन ये लोग आगे संतुलित जीवन जीते रहे. ये नियमित व्यायाम करते रहे और अपना खानपान ठीक रखा. इन्होंने अपना वजन नहीं बढ़ने दिया और एक सक्रिय जीवन जीते रहे.

इसके विपरीत उसी खानदान के अन्य रक्त संबंधियों को डायबिटीज हो जाती है क्योंकि वे जीवनभर अल्लम गल्लम खाते रहे, बढ़िया मुटाते रहे और भरपूर आलसी जीवन जिया. इनका शरीर भूकंप के डर से ही कभी झटके में हिला हो तो हिला हो वरना हमेशा ही लौंदे की तरह पड़ा रहा.

तो बीमारी केवल जीन्स से ही नहीं, आपके बहुत सारे अन्य कर्मों- कुकर्मों का भी फल है. यह भी ठीक कुंडली और जन्मपत्री जैसा ही केस है. आपकी कुंडली में कितना भी मजबूत धन योग हो, काम और मेहनत किए बिना पैसा नहीं बनेगा. भाग्य में खूब लम्बी उम्र दर्ज हो पर आप यदि कुतुब मीनार से कूदने की ठान ही लें तो भाग्य आकर आपको नहीं बचायेगा. भाग्य केवल एक संभावना या आशंका है, बस. इसी तरह जीन्स भी बीमारी की प्रबल आशंका मात्र हैं, बस. इनके अलावा आगे ढेर सारे अन्य कारकों का भी बीमारी पैदा होने में बड़ा रोल रहेगा.

तो फिर इस पूरी चर्चा का लब्बोलुआब क्या निकलता है?

यही कि अभी प्रिवेंटिव जेनेटिक टेस्टिंग का रोल कुछ बीमारियों तक ही (ब्रेस्ट कैंसर, बड़ी आंत का कैंसर, चमड़ी का मेलेनोमा नामक कैंसर, फैमिली पोलियो, डीप वेन थ्रॉम्बोसिस, फैमिलियल हाइपरकोलेस्ट्रोलीमिया आदि) सीमित है. हालांकि वह भी आसानी से उपलब्ध नहीं है. पर यह तो शुरूआत है. ढलती उम्र के कारण मैं तो शायद वह दिन न देख पाऊं पर मुझे विश्वास है कि आगे, मेरे बच्चों के जीवन में यही जेनेटिक मेडिसिन, स्वास्थ्य और अमरता की नई संभावनाओं के सिंहद्वार अवश्य खोलेगी.