जदयू के पूर्व नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव ने दिल्ली में अपनी नई पार्टी लोकतांत्रिक जनता दल को लॉन्च कर दिया है. इस मौके पर शरद यादव ने कहा कि उनकी लड़ाई संविधान को बचाने को लेकर शुरू हुई थी जिसे उनके लोग नई पार्टी के जरिए आगे बढ़ाएंगे. उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार पर हमला करते हुए उसे हर मोर्चे पर नाकाम बताया.

उधर, जदयू के नेताओं ने शरद यादव और उनकी नई पार्टी पर हमला बोला है. पार्टी प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि हारे हुए नेताओं के सहारे पार्टी कैसे आगे बढ़ेगी. जदयू नेता जयकुमार सिंह ने कहा कि शरद यादव ने नई पार्टी राजनीतिक स्वार्थपूर्ति के लिए बनाई है. उधर, कांग्रेस का कहना है कि जदयू के अपने मूल्यों से हटने के कारण शरद यादव ने अपनी अलग राह चुनी है.

शरद यादव ने फिलहाल नई पार्टी की सदस्यता से खुद को अलग रखा हुआ है. माना जा रहा है कि जदयू के चिह्न ‘तीर’ पर कोई फैसला होने के बाद वे इस नई पार्टी की जिम्मेदारी सामने आकर संभाल सकते हैं. फिलहाल इस मामले की सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट में हो रही है. इससे पहले चुनाव आयोग ने ‘तीर’ पर नीतीश कुमार के गुट का अधिकार बताया था जिसे शरद यादव ने चुनौती दी है. इसके अलावा राज्य सभा की सदस्यता रद्द किए जाने को भी उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी हुई है. जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार की सिफारिश पर सदन के सभापति वेंकैया नायडू ने उनकी सदस्यता रद्द कर दी थी.

‘शरद यादव की पॉलिटिकल वैल्यू है लेकिन, इलेक्टोरल वैल्यू कुछ नहीं हैं. उनका जनता के बीच कोई आधार नहीं है. वे लगातार दूसरे नेताओं के साथ होने की जगह से लोक सभा या राज्य सभा में आते रहे हैं.’   

बीते साल जुलाई में जदयू प्रमुख नीतीश कुमार द्वारा राजद का साथ छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का हाथ थामने के बाद शरद यादव ने इस पर नाराजगी जताई थी. उन्होंने इसे बिहार के साथ धोखा बताया था. इसके बाद वे नीतीश से छिटक गए. उनका ताजा ऐलान कइयों को राष्ट्रीय के साथ-साथ राज्य की राजनीति में अपनी एक बड़ी भूमिका तलाशने की कोशिश जैसा दिखता है. कभी एनडीए के संयोजक रहे शरद यादव इससे पहले राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों को एक साथ लाने की कोशिश करते हुए दिख चुके हैं.

लेकिन क्या वे इसमें सफल हो पाएंगे? बिहार की राजनीति को करीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर की मानें तो नई पार्टी के गठन के बाद भी शरद यादव की सूबे की राजनीति में कोई अहम भूमिका नहीं होगी. उनके मुताबिक शरद को लालू प्रसाद यादव से जोड़कर ही देखा जा रहा है. बिहार में गैर-एनडीए दलों को एक साथ लाने की कवायद पर सुरेंद्र किशोर कहते हैं, ‘एनडीए विरोधी दलों को साथ लाने में उनकी कोई भूमिका नहीं होगी. जो होगी वह लालू प्रसाद यादव की ही होगी. हालांकि, अपनी अहमियत दिखाने के लिए शरद यादव कुछ लोगों को साथ लाने की कोशिश कर सकते हैं.’

उधर, ‘नरेंद्र मोदी : एक शख्सियत, एक दौर’ नाम की किताब के लेखक और वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय भी सुरेंद्र किशोर की बातों को आगे बढ़ाते हुए दिखते हैं. सत्याग्रह से बातचीत में वे कहते हैं, ‘शरद यादव की पॉलिटिकल वैल्यू है लेकिन, इलेक्टोरल वैल्यू कुछ नहीं हैं. उनका जनता के बीच कोई आधार नहीं है. वे लगातार दूसरे नेताओं के साथ होने की वजह से लोक सभा या राज्य सभा में आते रहे हैं.’ गैर-एनडीए दलों को एक साथ लाने में शरद यादव की संभावित भूमिका पर वे कहते हैं, ‘इस तरह का गठबंधन पहले से ही है और इसके लिए शरद यादव की जरूरत ही नहीं है. हालांकि, इससे वाम दल अलग हैं लेकिन, बिहार की राजनीति में उनकी कोई अहमियत नहीं रह गई है.’

क्या शरद यादव जदयू को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं? इस सवाल के जवाब में सुरेंद्र किशोर हालिया बिहार उपचुनाव का उदाहरण देते हैं. वे कहते हैं, ‘शरद यादव तो चुनाव से पहले से ही पार्टी से बाहर हो गए थे लेकिन, नतीजों ने बता दिया कि जनता किनके साथ है. अररिया संसदीय क्षेत्र की छह में से चार सीटों सहित भभुआ विधानसभा सीट पर एनडीए की जीत हुई. इसके अलावा जहानाबाद सीट राजद के खाते में आई. यानी विधानसभा सीटों के लिहाज से एनडीए 5-3 से आगे रहा. इन बातों को देखते हुए शरद यादव की ताजा पहल का जदयू को कोई नुकसान होता हुआ नहीं दिखता.’ हालांकि, माना जा रहा है कि चुनाव से पहले कुछ असंतुष्ट नेता जदयू से अलग हो सकते हैं. लेकिन, उनके शरद यादव के साथ न जाकर राजद में मिलने की संभावना अधिक दिखती है.

‘शरद यादव की जो पॉलिटिकल कैपिटल है, वह अगर किसी अन्य दल के साथ मिल जाती है तो जदयू-भाजपा को थोड़ा-बहुत नुकसान हो सकता है.  

वहीं, नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं, ‘शरद यादव की जो पॉलिटिकल कैपिटल है, वह अगर किसी अन्य दल के साथ मिल जाती है तो जदयू-भाजपा को थोड़ा-बहुत नुकसान हो सकता है. इसके अलावा उनकी पहचान एंटी-नीतीश कुमार खेमे के साथ ही रहेगी, चाहे अलग पार्टी के रूप में हो या फिर किसी गठबंधन के साथ.’

बिहार की राजनीति में शरद यादव कभी बड़ी भूमिका में नहीं रहे. माना जाता है कि जब तक नीतीश कुमार ने चाहा तब तक ही वे जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहे. जदयू से अलग होने के बाद अब लालू प्रसाद यादव के साथ ही उनके बने रहने की अधिक संभावना है. सुरेंद्र किशोर कहते हैं, ‘शरद यादव राजनीतिक परजीवी रहे हैं यानी राजनीतिक ताकत हासिल करने के लिए वे दूसरे नेताओं पर निर्भर रहे हैं. साथ ही, जनता पर भी उनकी पकड़ नहीं रही है. संसदीय चुनाव में भी अपनी जीत के लिए वे जनता पर अपनी पकड़ की जगह राजनीतिक तालमेल और पार्टी की मजबूती पर निर्भर दिखे हैं.’ 2014 के लोक सभा चुनाव में मधेपुरा सीट से राजद प्रत्याशी पप्पू यादव के हाथों उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. हालांकि, इससे पहले 2009 के आम चुनाव में एनडीए प्रत्याशी के तौर पर उन्होंने जीत हासिल की थी. सूत्रों की मानें तो इस बार भी वे अपनी राजनीतिक पारी के लिए राजद पर निर्भर रह सकते हैं. साथ ही, वे अपने बेटे शांतनु बुंदेला को मधेपुरा सीट से उतार सकते हैं.

उधर, नीलांजन मुखोपाध्याय का भी मानना है कि बिहार की राजनीति में अपनी भूमिका पुख्ता करने के लिए शरद यादव को किसी के साथ जुड़ना होगा. वे कहते हैं, ‘यदि उनको राजद के साथ जुड़ने से राजनीतिक तकलीफ होगी तो वे अलग से एक छोटे दल के रूप में बने रह सकते हैं, लेकिन इसकी कोई वैल्यू नहीं होगी.’ नीलांजन मुखोपाध्याय की मानें तो शरद यादव की अहमियत सभी विपक्षी दलों के साथ आने में ही है.