बीते मंगलवार को अमेरिका ने ईरान परमाणु समझौते से खुद को अलग कर लिया. साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगाने की घोषणा भी कर दी. जुलाई 2015 में ईरान ने यह समझौता जर्मनी, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, रूस और अमेरिका के साथ किया था. इस समझौते के तहत ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को रोकने पर सहमत हुआ था जिसके बदले इन सभी देशों ने उस पर सालों से लगे प्रतिबंधों को हटा दिया था.

इस मामले पर गौर करने वाली बात यह है कि अमेरिका का करीबी यूरोप उसके इस फैसले के खिलाफ खड़ा हो गया है. मंगलवार को ही परमाणु समझौते से अमेरिका के हटने के बाद यूरोपीय देशों ने साफ कर दिया कि वे अमेरिकी विरोध के बाद भी ईरान परमाणु समझौते को बनाए रखने का हर संभव प्रयास करेंगे.

यूरोप इस मामले पर इससे पहले भी कई बार अमेरिका को चेतावनी दे चुका है. बीते साल नवंबर में जर्मनी के विदेश मंत्री जिगमार गैब्रिएल का कहना था, ‘हमें अमेरिका को यह बताने की जरूरत है कि ईरान के मुद्दे पर उसका व्यवहार हम यूरोपीय लोगों को रूस और चीन के अमेरिका विरोधी रुख के करीब ले जाएगा.’ यह भी माना जाता है कि अपने यूरोपीय साथियों के चलते ही डोनाल्ड ट्रंप इस डील को अब तक नहीं तोड़ पाए थे.

हालांकि, अमेरिका के साथ गलबहियां करने वाले यूरोप का ईरान परमाणु डील पर यह व्यवहार कइयों के लिए चौंकाने वाला हो सकता है, लेकिन, उसके ऐसे रुख के पीछे कई वाजिब वजहें भी हैं.

समझौता तोड़ने का आधार मजबूत नहीं

यूरोपीय देशों का कहना है कि ट्रंप परमाणु समझौता तोड़ने की जो वजहें बता रहे हैं उनका कोई मजबूत आधार नहीं है. अमेरिकी राष्ट्रपति का दावा है कि ईरान उसे मिल रही परमाणु सामग्री का इस्तेमाल हथियार बनाने के लिए कर रहा है. जबकि, इस दावे से उलट संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी और यूरोपीय संघ दोनों का कहना है कि वे ईरान की गतिविधियों पर लगातार निगाह बनाए हुए है और वह परमाणु समझौते के अनुसार अपना वादा निभा रहा है.

ट्रंप का यह भी कहना है कि इस समझौते के बाद भी ईरान गैर परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल का निर्माण कर रहा है. साथ ही वह सीरिया, यमन और इराक में शिया लड़ाकों और हिजबुल्लाह जैसे संगठनों को लगातार हथियार सप्लाई कर रहा है. उनके मुताबिक ऐसे में ईरान की इन हरकतों को रोकने के लिए इस समझौते को रद्द कर इसे और कठोर बनाया जाना चाहिए.

ट्रंप की इस बात पर यूरोपीय देशों का कहना है कि ईरान द्वारा बैलिस्टिक मिसाइल बनाने और अन्य देशों को हथियार बेचने की बात कहकर भी यह परमाणु समझौता नहीं तोड़ा जा सकता क्योंकि समझौते की शर्तों में ये बातें शामिल ही नहीं थी. इन देशों का यह भी मानना है कि अब अगर यह समझौता टूटता है तो ईरान पर फिर दबाव बनाकर उसे नई शर्तों पर राजी करवाना बेहद मुश्किल हो जाएगा. साथ ही ऐसे में ईरान द्वारा गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम फिर शुरू किए जाने का खतरा भी बना रहेगा.

ईरान में पश्चिमी देशों का भारी निवेश

यूरोपीय देशों के ईरान डील पर अमेरिका के खिलाफ जाने की सबसे बड़ी वजह इन देशों द्वारा पिछले दो सालों में ईरान में किया गया अरबों डॉलर का निवेश है. जनवरी, 2016 में ईरान से प्रतिबंध हटने की घोषणा के बाद ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी ने यूरोपीय देशों से अरबों डॉलर के व्यापारिक समझौते किये थे. ईरान ने अपने सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार इटली के साथ ऊर्जा, स्टील, भवन निर्माण और यात्री विमानों की खरीद और तेल गैस के निर्यात सहित 20 बिलियन डॉलर यानी एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के समझौते किये थे.

वहीं ईरान ने फ्रांस की तेल कंपनी ‘टोटल’ के साथ 4.8 बिलियन डॉलर यानी 30 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की डील साइन की है जिसके तहत यह कंपनी फारस की खाड़ी से गैस और तेल निकालेगी. इस दौरान ईरान ने फ्रांस की कार निर्माता कंपनी रेनॉल्ट के साथ अब तक की सबसे बड़ी 778 मिलियन डॉलर (करीब पांच हजार करोड़ रुपए) की डील पर भी हस्ताक्षर किये. साथ ही साल 2017 के अंत तक ईरान ने भवन निर्माण और उड्डयन के क्षेत्र में काम करने वाली फ़्रांस की कंपनियों से भी अरबों डॉलर के समझौते कर लिए हैं.

परमाणु समझौता होने के बाद जर्मनी की कंपनियों ने भी ईरान में बड़ा निवेश किया है. हाल ही में जारी हुई जर्मनी के ‘फेडरेशन ऑफ जर्मन इंडस्ट्रीज’ की रिपोर्ट के मुताबिक ईरान को जर्मनी का सालाना निर्यात 2017 में बढ़कर 3.5 अरब डॉलर (20 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा) हो गया है.

ऐसा ही कुछ हाल परमाणु समझौते के पक्ष में खड़े चीन और रूस का भी है. एक रिपोर्ट के मुताबिक अगस्त, 2017 में ईरान और चीन के बीच कुल सालाना आयात और निर्यात दोनों बढ़कर करीब 18 अरब डॉलर (करीब एक लाख करोड़ रुपए) तक पहुंच गया है. कुछ ऐसी ही तेजी रूस-ईरान कारोबार में भी देखी गई है.

अब जाहिर है कि अमेरिका के परमाणु समझौते से हटने और ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाने से अरबों डॉलर का यह निवेश डूबने की आशंका बन जाएगी. साथ ही इसका सीधा प्रभाव इन सभी देशों की अर्थव्यवस्था और रोजगार पर पड़ेगा. ऐसे में ये सभी देश कतई नहीं चाहते कि यह परमाणु डील खतरे में पड़े.

अमेरिका की आंतरिक राजनीति का खामियाजा यूरोप क्यों भुगते?

यूरोपीय देशों का यह भी कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका की आंतरिक राजनीति की वजह से परमाणु समझौता तोड़ना चाहते हैं. इनके मुताबिक अमेरिका 2015 में सीरिया में मिली हार को अभी तक नहीं पचा पाया है. सीरिया में सत्ताधारी बशर अल-असद की जीत को अमेरिका और इजरायल की बड़ी हार की तरह भी देखा जाता है. सीरिया से पहले अमेरिका ने जिस देश में भी दखल दिया, वहां तख्तापलट कर दिया. लेकिन, सीरिया में लाख कोशिशों के बाद भी वह असद को हटाने में सफल नहीं हो सका.

अमेरिका की यह मुराद पूरी न हो पाने की वजह रूस, ईरान और हिजबुल्लाह के गठजोड़ को माना जाता है, जिसने असद सरकार की सैन्य मदद कर अमेरिका के अरमानों पर पानी फेर दिया था. यूरोपीय देशों के कुछ जानकारों का मानना है कि अमेरिका सीरिया में हुई अपनी इस हार के चलते ईरान को सबक सिखाने के लिए परमाणु समझौता तोड़ने को आतुर है.

ईरान परमाणु डील डोनाल्ड ट्रंप के लिए निजी तौर पर भी खासा महत्व रखती है. दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने इस मुद्दे को भी जमकर भुनाया था. सीरिया में अमेरिका को मिली कूटनीतिक हार में ईरान की भूमिका और परमाणु डील में ईरान को दी गईं सहूलियतों को लेकर उन्होंने ओबामा प्रशासन पर कई बार हमला बोला था. ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान वादा किया था कि ईरान को उसकी हरकत के लिए सजा देंगे और परमाणु समझौता रद्द कर उस पर और कड़े प्रतिबंध लगायेंगे.