सात मई को आए सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले ने उत्तर प्रदेश में कुछ बड़े कहे जाने वाले लोगों की नींद हराम कर दी है. प्रदेश में कांग्रेस के जमाने में मंत्री रहे वरिष्ठ नेता सत्यदेव त्रिपाठी कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को उनके पूर्व हो जाने की हकीकत बता दी है. सूबे की सत्ता से बेदखल होने के बाद भी अपने बंगलों के अंदर उनकी सत्ता चलती ही है. बंगलों के गेट के अंदर घुसते ही वे पुनः सर्वशक्तिमान होने का आनंद लेने लगते हैं. मगर उनसे बंगले खाली कराने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उनके इस आनंद में खलल डाल दिया है.

उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए बंगलों के इंतजाम का सिलसिला 1980 से शुरू हुआ था. पहले दौर में मुख्यमंत्रियों के पूर्व हो जाने पर उनको घर देने की जो व्यवस्था थी उस पर 1997 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले ने पहली चोट की. हाईकोर्ट ने इस तरह के बंगलों का आवंटन गलत ठहराया और इसके कारण हजरतगंज के आसपास के इलाके में वीपी सिंह, हेमवती नंदन बहुगुणा, श्रीपति मिश्र और कमलापति त्रिपाठी को पूर्व मुख्यमंत्री के तौर पर मिले बंगले खाली भी हो गए. लेकिन मायावती-भाजपा की गठबंधन सरकार ने ‘एक्स चीफ मिनिस्टरर्स रेजिडेंस अलाटमेंट रूल्स 1997’ बना कर पूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए फिर से बंगलों का पक्का इंतजाम कर लिया. इसके कारण वीर बहादुर सिंह, रामनरेश यादव, नारायणदत्त तिवारी के बंगले छिनने से बच गए और बाद में इस सूची में कल्याण सिंह, मायावती, मुलायम सिंह, राजनाथ सिंह और अखिलेश यादव के नाम भी जुड़ते गये.

मायावती ने माल एवन्यू में कई बंगले जोड़कर जो अपना बंगला बनाया वह 2164 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है. लेकिन मुलायम सिंह का आशियाना क्षेत्रफल में उनसे भी बड़ा - 2436 वर्गमीटर – का है. और अपने पूरे कार्यकाल में मुलायम सिंह यादव के घर में ही रहने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री होने से कुछ महीने पहले जिस बंगले में अखिलेश यादव ने गृह प्रवेश किया वह दो बंगलों को जोड़कर - 1535 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में – बनाया गया है. एनडी तिवारी, कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह के बंगले तुलनात्मक रूप से छोटे हैं. इनमें सबसे छोटा - 750 वर्ग मीटर में बना - बंगला राजनाथ सिंह का है.

ये बंगले पूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए महज एक आवास नहीं हैं. इनके अंदर उनकी सुख-सुविधाओं के तमाम इंतजाम हैं. खास तौर पर मुलायम सिंह यादव, मायावती और अखिलेश यादव के बंगलों की तुलना तो किसी पांच सितारा होटल या राजमहल से की जा सकती है. ऐसे राजमहल जिनका निर्माण लोकतंत्र के सामंतों ने अपने अपने शासन काल में जनता के पैसे से करवाया है. 2012 में सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के अनुसार मायावती के बंगले के पुर्ननिर्माण में 86 करोड़ रूपए खर्च हुए थे. अखिलेश यादव के बंगले के बारे में यह आंकड़ा 100 करोड़ से ऊपर बताया जाता है.

नियमानुसार राज्य सम्पत्ति विभाग पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगलों के पुनर्निमाण और रखरखाव पर अधिकतम 25 लाख की रकम ही खर्च कर सकता है. इससे ऊपर की रकम के लिए कैबिनेट की स्वीकृति जरूरी है. यहां यह जानना भी जरूरी है कि इन राजमहलों का बेसिक किराया महज 4212 रूपए प्रति माह ही है और इन बंगलों में रहने वाले बिजली का बिल भी समय से भरना पसंद नहीं करते. अखिलेश यादव के सत्ता से हटने के बाद मुलायम सिंह यादव के बंगले पर लाखों रूपए का बिजली बिल बकाया होने की जानकारी सामने आई थी.

बंगलों के लिए राज्य के नेताओं की आसक्ति का पता इस बात से भी चलता है कि अगस्त 2016 में जब सुप्रीम कोर्ट ने ‘लोक प्रहरी’ संगठन की याचिका पर मायावती के बनाये नियमों को रद्द कर दिया तो पूर्व होने से पूर्व अपना राजमहल तैयार करवा रहे अखिलेश यादव ने बंगलों के लिए नए नियम ही बना डाले. उन्होंने 30 अगस्त 2016 को उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन बंगलों पर बने रहने का अधिकार देने वाला विधेयक विधानसभा में पारित करवा दिया.

अब सुप्रीम कोर्ट ने जब इस एक्ट को भी खारिज कर दिया है तो एक बार फिर सत्ता का सुख ले रहे पूर्व मुख्यमंत्रियों की नींद उड़ रही है पूरी जिंदगी के लिए जिन सुख-सुविधाओं का इंतजाम उन्होने किया था वे हाथ से निकलती दिख रही है. जिस तरह की सुख-सुविधाओं का इंतजाम इन बंगलों में है वैसा शहर में अन्यत्र मिलना संभव नहीं है. अगर कहीं उपलब्ध हुआ भी तो उसका किराया तीन-चार लाख रूपए महीने से कम नहीं होगा. फिर अखिलेश को छोड़ कर सारे पूर्व मुख्यमंत्री इन बंगलों में 20 से ज्यादा सालों से काबिज हैं और एक तरह से इनके आदी हो चुके हैं.

बंगले खाली करने की आशंका के भय के साथ-साथ खुद को अभूतपूर्व मानने वाले इन पूर्व मुख्यमंत्रियों को एक और बात से कष्ट हो रहा है. अपने आदेश के जरिये शीर्ष अदालत ने इनसे इनकी विशिष्टता का अहसास भी छीन लिया है. अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि ‘एक मुख्यमंत्री कार्य मुक्त होने पर आम नागरिक के समान हो जाता है. उसका कोई विशेष वर्ग नहीं है. अपने पद की वजह से उसे सुरक्षा और प्रोटोकॉल दिए जा सकते हैं लेकिन जीवन भर रहने के लिए सरकारी बंगले का आवंटन नहीं किया जा सकता. यह संविधान में सभी नागरिकों को दिए गए समानता के सिद्धांत के भी खिलाफ है.’

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उत्तर प्रदेश सरकार का रूख बहुत उत्साहवर्धक नहीं दिख रहा. इससे कुछ लोगों को लग रहा है कि सरकार अब भी अपने ‘पूर्व’ हो चुके राजनीतिक बिरादरों के बंगले बचाने के लिए कोई प्रयास कर सकती है. सर्वोच्च न्यायालय में भी राज्य सरकार ने इन्हें बचाने के पक्ष में ही दलीलें दी थीं. अदालत में दिए हलफनामे में ‘लोक प्रहरी’ की याचिका का विरोध करते हुए राज्य सरकार की ओर से कहा गया था कि ‘लोकतांत्रिक देश होने के नाते उच्च पदों पर रहने वालों को पद छोड़ने के बाद भी कई सुविधाएं दी जाती हैं. सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भी पद छोड़ने के बाद कई सुविधाएं मिलती हैं, इसलिए पूर्व मुख्यमंत्रियों को उम्र भर के लिए सरकारी आवास देना गलत नहीं कहा जा सकता.’

अदालत में दिए हलफनामे और फैसले के बाद आई उसकी ठंडी प्रतिक्रिया को देखें तो यही लगता है कि योगी आदित्यनाथ की सरकार भी इस मामले में पिछली सरकारों से अलग नहीं है और वह भी जनता के पक्ष में खड़े होने के बजाय अपने पूर्ववर्तियों के राजसी ठाठ बनाए रखने के लिए ज्यादा चिंतित है. जानकार मानते हैं कि आने वाले समय में राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रति जो रूख दिखाएगी वह उसके लोकतांत्रिक चरित्र का भी प्रमाण होगा. इससे यह तय हो जाएगा वह अपनी और लोकतंत्र की साख बचाने को अधिक महत्व देती है या फिर क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों को.