अमेरिका ने खुद को ईरान के साथ हुए ऐतिहासिक परमाणु समझौते से अलग कर लिया है. मंगलवार को यह घोषणा करते हुए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना था, ‘मेरे लिए यह स्पष्ट है कि हम इस समझौते के साथ रहकर ईरान के परमाणु बम को नहीं रोक सकते. ईरान समझौता मूल रूप से दोषपूर्ण है, इसलिए मैं आज ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका के हटने की घोषणा कर रहा हूं.’ इसके कुछ देर बाद उन्होंने ईरान के खिलाफ ताजा प्रतिबंधों वाले दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर दिए.

ईरान परमाणु समझौते को इस दशक के एक ऐसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तौर पर देखा जा सकता है जिससे दुनिया की सभी बड़ी ताकतों की विदेश नीति इन सालों में प्रभावित होती रही है. आइए जानते हैं कि आखिर यह समझौता अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से इतना अहम कैसे बन गया.

अमेरिका और ईरान के रिश्तों का इतिहास और गुप्त परमाणु कार्यक्रम का सामने आना

आम धारणा है कि अमेरिका के साथ ईरान के रिश्ते तब खराब हुए जब उसके दुलारे शाह रजा पहलवी को 1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति ने उखाड़ फेंका. लेकिन इस टकराव की जड़ें 1950 के दशक तक जाती हैं जब सीआईए ने लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए ईरान के लोकप्रिय प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेक की सरकार का तख्तापलट करवा दिया था. इसके बाद 25 साल तक सत्ता पहलवी के हाथ में रही. बताते हैं कि इस दौरान ईरान अमेरिका का बहुत चहेता हो गया था. इसका एक कारण यह भी था कि तब ईरान को तेल से होने वाली अकूत आमदनी का करीब आधा हिस्सा अमेरिकी और ब्रिटिश कंपनियों के एक कंसोर्टियम को मिलने लगा था. लेकिन, बाद में इसी से पैदा हुए असंतोष को अयातुल्लाह खुमैनी ने अपना हथियार बनाया और 1979 में क्रांति के जरिये शाह और अमेरिका के गठजोड़ का अंत कर दिया.

इसके बाद दोनों देशों के बीच का अविश्वास गहराता गया. अमेरिका से दुश्मनी मोल लेने का ईरान के लिए वही नतीजा हुआ जो होना था. व्यापार के मोर्चे पर वह बाकी दुनिया से कटता गया. फिर 2002 में ईरान के अघोषित परमाणु केंद्रों के खुलासे की खबरें आईं. ईरान में सरकार विरोधी एक विपक्षी गुट ने यह जानकारी उजागर की कि ईरान गुप्तरूप से यूरेनियम संवर्धन और हैवी वॉटर रिएक्टर के निर्माण में लगा हुआ है. संवर्धित यूरेनियम परमाणु रिएक्टर में ईंधन का काम तो करता ही है लेकिन, इसका उपयोग परमाणु बम बनाने में भी किया जा सकता है.

तब अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) का कहना था कि ईरान एक गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम शुरू करने की तैयारी कर रहा है जिसका लक्ष्य मिसाइलों के लिए परमाणु हथियार बनाकर उनका परीक्षण करना है. इसके बाद अमेरिका की अगुवाई में अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए. इससे तेल और गैस जैसे प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद ईरान की कमर टूट गई. इसके बाद पी5+1 कही जाने वाली छह शक्तियों (अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, रूस और चीन) के साथ उसकी बातचीत का लंबा दौर शुरू हुआ जिसकी परिणति जुलाई 2015 में वियना समझौते (ईरान परमाणु समझौते) के साथ हुई.

परमाणु समझौते की प्रमुख शर्तें

इस परमाणु समझौते के तहत ईरान ने अपने करीब नौ टन अल्प संवर्धित यूरेनियम भंडार को कम करके 300 किलोग्राम तक करने की शर्त स्वीकार की. यह तय हुआ कि ईरान अपना अल्प संवर्धित यूरेनियम रूस को देगा और सेंट्रीफ्यूजों की संख्या घटाएगा. इसके बदले में रूस ईरान को करीब 140 टन प्राकृतिक यूरेनियम येलो-केक के रूप में देगा. यूरेनियम के इस कंपाउंड का इस्तेमाल बिजलीघरों के लिए परमाणु छड़ बनाने के लिए होता है. संधि की शर्त यह भी थी कि आईएईए को अगले 10 से 25 साल तक इस बात की जांच करने की स्वतंत्रता होगी कि ईरान संधि के प्रावधानों का पालन कर रहा है या नहीं. इन सारी शर्तों के बदले में पश्चिमी देश ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध हटाने पर सहमत हुए थे.

समझौता करना सिर्फ ईरान की ही मजबूरी नहीं थी

इस परमाणु समझौते से ऐसा लगता जरूर है कि इसे करना ईरान की मजबूरी थी लेकिन ऐसा है नहीं. अमेरिका सहित बाकी ताकतों के लिए भी यह समझौता करना उतना ही जरूरी हो गया था जितना कि ईरान के लिए. इसका कारण यह था कि बीते कुछ सालों के दरम्यान मध्य-पूर्व के बदलते समीकरणों ने अमेरिका और यूरोप की नींद उड़ा दी थी. अमेरिका के दुलारे सऊदी अरब ने इस्लाम की जिस वहाबी विचारधारा को पाला-पोसा था, उससे इस्लामिक स्टेट (आईएस) का जन्म हुआ और आईएस कितना बड़ा संगठन था यह पेरिस से लेकर अमेरिका तक हुए आतंकी हमलों से साफ़ हो चुका था.

माना जाता है कि उस समय आईएस से निपटने की कोशिश में अमेरिका इस्लाम के उस शिया मत के हाथ मजबूत करना चाहता था जो न सिर्फ अपेक्षाकृत लचीला माना जाता है बल्कि आईएस के निशाने पर भी था. ईरान शिया जगत का नेतृत्व करता है. जानकारों के मुताबिक अमेरिका को उम्मीद थी कि वह मजबूत होगा तो आईएस को हराना आसान हो जाएगा.

डोनाल्ड ट्रंप की समझौते से अलग होने के पीछे की दलीलें

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि ईरान अभी भी उसे मिल रही परमाणु सामग्री का इस्तेमाल हथियार बनाने के लिए कर रहा है. ट्रंप ईरान परमाणु समझौता तोड़ने के पीछे की दूसरी वजह इसका बेहद उदार होना बताते हैं. उनके मुताबिक यह समझौता ईरान को तय सीमा से कहीं अधिक हैवी वॉटर (परमाणु रिएक्टरों के संचालन में इसका इस्तेमाल होता है) प्राप्त करने और अंतरराष्ट्रीय जांचकर्ताओं को जांच के मामले में सीमित अधिकार देता है. वे यह भी कहते हैं कि इस समझौते के बाद भी ईरान गैर परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल का निर्माण कर रहा है. साथ ही वह सीरिया, यमन और इराक में शिया लड़ाकों और हिजबुल्लाह जैसे संगठनों को लगातार हथियार सप्लाई कर रहा है. डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि ईरान की इन हरकतों को रोकने के लिए इस समझौते को रद्द कर इसे और कठोर बनाया जाना चाहिए.

डील टूटने के पीछे अमेरिका की आंतरिक राजनीति

ईरान परमाणु समझौते से जुड़े अन्य देशों का कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप द्वारा परमाणु समझौता तोड़ने की एक बड़ी वजह अमेरिका की आंतरिक राजनीति है. इनके मुताबिक अमेरिका 2015 में सीरिया में मिली हार को अभी तक नहीं पचा पाया है. सीरिया में सत्ताधारी बशर अल-असद की जीत को अमेरिका और इजरायल की बड़ी हार की तरह भी देखा जाता है. सीरिया से पहले अमेरिका ने जिस देश में भी दखल दिया, वहां तख्तापलट कर दिया. लेकिन, सीरिया में लाख कोशिशों के बाद भी वह असद को हटाने में सफल नहीं हो सका.

अमेरिका की यह मुराद पूरी न हो पाने की वजह रूस, ईरान और हिजबुल्लाह के गठजोड़ को माना जाता है, जिसने असद सरकार की सैन्य मदद कर अमेरिका के अरमानों पर पानी फेर दिया था. यूरोपीय देशों के कुछ जानकारों का मानना है कि अमेरिका सीरिया में हुई अपनी इस हार के चलते ईरान को सबक सिखाने के लिए परमाणु समझौता तोडा है.

ईरान परमाणु डील डोनाल्ड ट्रंप के लिए निजी तौर पर भी खासा महत्व रखती है. दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने इस मुद्दे को भी जमकर भुनाया था. सीरिया में अमेरिका को मिली कूटनीतिक हार में ईरान की भूमिका और परमाणु डील में ईरान को दी गईं सहूलियतों को लेकर उन्होंने ओबामा प्रशासन पर कई बार हमला बोला था. ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान वादा किया था कि ईरान को उसकी हरकत के लिए सजा देंगे और परमाणु समझौता रद्द कर उस पर और कड़े प्रतिबंध लगायेंगे. बीते मंगलवार को भी समझौता तोड़ने की घोषणा के दौरान ट्रंप ने कहा था, ‘मैं जो कहता हूं, वह करता हूं, मैं अपने सारे वादे पूरे करूंगा.’