पिछले साल हुए गुजरात विधानसभा चुनाव की तरह कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहे. इस बार उनके निशाने पर नेहरू-गांधी परिवार के साथ कांग्रेस नेतृत्व वाली सिद्धारमैया सरकार भी रही. चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में ताबड़तोड़ रैलियां कर उन्होंने राज्य सरकार के कामकाज और अलग-अलग मुद्दों को लेकर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर हमला किया. इसी सिलसिले में पिछले हफ़्ते एक रैली में उन्होंने बेंगलुरु को कचरे का शहर बताया. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ मोदी ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने बेंगलुरु जैसे शहर को ‘कचरे का शहर’ बना दिया है.

प्रधानमंत्री के इस बयान का उनके समर्थकों ने समर्थन किया तो कई लोगों ने उन्हें उनके संसदीय क्षेत्र वाराणसी की याद दिलाई. हाल में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने (2010 से 2016 के अध्ययन के आधार पर) दुनिया के 15 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में वाराणसी को तीसरा स्थान दिया है. कई लोग पूछ रहे हैं कि बेंगलुरु की कचरे की समस्या पर राज्य सरकार की आलोचना करना तो ठीक है, लेकिन इस मामले में प्रधानमंत्री के अपने संसदीय क्षेत्र का प्रदर्शन कैसा रहा है.

रिपोर्टों पर ग़ौर करें तो पता चलता है कि कचरा निस्तारण के मामले में वाराणसी में क़ाबिल-ए-तारीफ़ काम नहीं हो पाया है. इन रिपोर्टों के मुताबिक़ वाराणसी में बढ़ते प्रदूषण के पीछे वाहनों का धुआं और निर्माण कार्य के चलते उड़ने वाली धूल तो है ही, कचरे का सही निपटारा नहीं हो पाना भी इसके लिए जिम्मेदार है.

इसकी कई वजहें हैं. जैसे इस काम से संबंधित प्राधिकरणों में स्टाफ़ की कमी होना. हाल में फ़र्स्ट पोस्ट ने अपनी एक रिपोर्ट में द क्लाइमेट एजेंडा नामक ग़ैर-सरकारी संगठन के सदस्य रवि शेखर के हवाले से बताया कि वाराणसी के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में पर्याप्त कर्मी नहीं हैं. इसकी वजह से बोर्ड में काम करने वालों को ज़्यादा ज़िलों की निगरानी करनी पड़ रही है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सरकार को अपना नेशनल एयर क्वॉलिटी मॉनिटरिंग सिस्टम वाराणसी में शिफ़्ट करने की ज़रूरत है.

वहीं, दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ प्रदूषण नियंत्रण विभाग का कहना है कि शहर के विकास के लिए जो मास्टरप्लान बनाया गया है उसके तहत किए जा रहे काम ही प्रदूषण बढ़ा रहे हैं. बताया गया कि शहर में सरकारी योजनाओं के तहत सड़क की खुदाई, सीवर लाइन, गैस पाइप लाइन, फ़्लाई ओवर और रिंग रोड के निर्माण के दौरान उड़ने वाली धूल और खुले में पड़ा कई मीट्रिक टन कूड़ा शहर के प्रदूषण को बढ़ाने में योगदान दे रहा है. शहर के लोगों की शिकायत है कि बनारस में कूड़े का सही तरीक़े से निस्तारण नहीं किया जा रहा. रिपोर्ट के मुताबिक़ शहर में फैले प्रदूषण का 36 प्रतिशत शहर का अपना है. वहीं, 26 प्रतिशत प्रदूषण आसपास मौजूद उद्योगों और 24 प्रतिशत प्रदूषण कचरे और घरेलू ईंधन की वजह से है.

डब्ल्यूएचओ की सूची 2010 से 2016 के बीच किए गए अध्ययन पर तैयार की गई है. इसलिए यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि अध्ययन के आख़िरी साल और उसके बाद भी वाराणसी में कचरे की समस्या की स्थिति कैसी रही है. टाइम्स ऑफ इंडिया की अप्रैल 2016 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ वाराणसी में कचरा निपटाने की व्यवस्था की हालत बहुत ख़राब थी. रिपोर्ट में बताया गया था कि उस समय कचरा फेंकने के लिए बनाए गए केंद्रों में 5,200 मीट्रिक टन से भी ज़्यादा कचरा पड़ा था जिसका निपटारा नहीं किया गया था. हालात इतने ख़राब थे कि स्थानीय लोगों को विरोध प्रदर्शन करना पड़ा था.

साल 2017 के स्वच्छ सर्वेक्षण में वाराणसी को 32वां स्थान मिला था जो उससे पहले के सर्वेक्षण में मिले स्थान से बेहतर था. लेकिन मई, 2017 में हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट ने ज़मीनी हक़ीक़त बताई. रिपोर्ट में बताया गया कि वाराणसी के कई घाटों पर काफ़ी कचरा फैला हुआ है. यह भी, कि घाटों पर नियमित रूप से आने वाले लोग भी स्वच्छता को लेकर जागरूक नहीं हैं.

वाराणसी में 30 से ज़्यादा बड़े कूड़ा घर हैं और 40 अस्थाई कूड़ा घर हैं. जानकार सुझाव देते हैं कि शहर भर से इकट्ठा किए गए कूड़े को शहर से बाहर फेंके जाने की व्यवस्था होनी चाहिए. लेकिन तथ्य बताते हैं कि फ़िलहाल तो कूड़ा आम लोगों के घरों के सामने ही फेंका जा रहा है.

इसी साल अप्रैल में द वायर की एक रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे वाराणसी में वरुणा नदी के किनारे बसी सरैया बस्ती को स्थानीय प्रशासन ने कूड़ा घर बना कर रख दिया है. यहां के स्थानीय लोग बताते हैं कि नगर निगम के ट्रक हर रोज़ आते हैं और शहर भर का कूड़ा यहीं डाल कर निकल जाते हैं. कूड़े की वजह से बस्ती के हालात इतने ख़राब हैं कि लोगों को हैज़ा से लेकर सांस लेने संबंधी समस्याएं होने लगी हैं. कई लोगों की त्वचा पर चकत्ते निकल आए हैं.

सरैया बस्ती के लोगों की शिकायत है कि अधिकारी कूड़े की वजह से बदतर हो रहे हालात पर उनकी कुछ सुनते ही नहीं. उनके मुताबिक़ अधिकारी उनसे कहते हैं कि यह सरकारी ज़मीन है इसलिए वे इस पर जो चाहें कर सकते हैं. हालांकि दो-तीन साल में अधिकारियों ने कई बार यहां का निरीक्षण किया है, लेकिन कूड़े को लेकर कोई फ़ैसला अभी तक जानकारी में नहीं आया है.